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विश्वसनीयता को क्षति

संपादकीय /  May 16, 2022

केंद्र सरकार के विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने शुक्रवार को एक गजट अधिसूचना के जरिये भारत से होने वाले गेहूं निर्यात को तत्काल प्रभाव से रोक दिया। डीजीएफटी ने इस निर्णय के लिए प्रमुख वजह यह बताई कि देश की समग्र खाद्य सुरक्षा का प्रबंधन किया जाना है तथा पड़ोसी एवं अन्य संकटग्रस्त देशों की मदद करनी है। यह निर्णय उस समय लिया गया है जब उत्तर भारत में तापमान असामान्य रूप से बढ़ा हुआ है जिसकी वजह से फसल प्रभावित हुई है। कुछ इलाकों में तो उपज के आधी हो जाने का भी अनुमान है। इस बीच यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के कारण भी दुनिया भर में गेहूं की कीमतें बढ़ी हैं क्योंकि यूक्रेन गेहूं का बहुत बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। वैश्विक बाजारों में गेहूं कीमतों में इस वर्ष अब तक 40 प्रतिशत से अधिक का इजाफा हुआ है।

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की दर अप्रैल में बढ़कर सालाना आधार पर 7.8 फीसदी हो गई। इसमें खाद्य कीमतों का अहम योगदान रहा। यह भी संभव है कि आठ वर्षों के इस उच्चतम रुझान ने डीजीएफटी के निर्णय को प्रभावित किया हो। सरकार ने महामारी के दौरान खाद्यान्न वितरण भी बढ़ाया था। चूंकि वैश्विक कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक थीं इसलिए किसानों ने भी अपना अनाज निर्यातकों को बेचना बेहतर समझा। यही कारण है कि सरकार 195 लाख टन के संशोधित खरीद लक्ष्य को हासिल करने में भी संघर्ष कर रही है। यह लक्ष्य जनवरी के अनुमान से 50 फीसदी कम है। बहरहाल, भारत के पास खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार है और सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में चावल का आवंटन बढ़ाकर बेहतर किया है। गेहूं और चावल का संयुक्त भंडार मई 2020 के स्तर के करीब है।

इन बातों के बावजूद यह निर्णय न केवल खराब आर्थिकी का नतीजा है बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाएगा। प्रधानमंत्री ने हाल ही में स्वयं दुनिया को आश्वस्त किया था कि भारतीय गेहूं संकट के समय मददगार साबित होगा। डीजीएफटी ने प्रधानमंत्री के किए वादे को ही नकार दिया है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक है लेकिन निर्यात के क्षेत्र में यह यूक्रेन, अर्जेन्टीना, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोपीय संघ और रूस जैसे कई देशों से पीछे है। अमेरिकी कृषि विभाग ने अनुमान जताया है कि 2022-23 के दौरान भारत का गेहूं निर्यात एक करोड़ टन से कम रहा जबकि रूसी फेडरेशन का निर्यात 4 करोड़ टन और कनाडा तथा ऑस्ट्रेलिया का संयुक्त निर्यात 5 करोड़ टन से अधिक रहा।

बहरहाल, भारत के कमजोर गेहूं निर्यातक होने के बावजूद निर्यात पर प्रतिबंध वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर गहरा असर डालेगा। अधिसूचना में यह कह कर कुछ आशंकाओं को दूर करने का प्रयास किया गया है कि यह प्रतिबंध पूरी तरह लागू नहीं है अभी भी लेटर ऑफ क्रेडिट के आधार पर निर्यात किया जाएगा तथा उन देशों को निर्यात जारी रहेगा जिनकी खाद्य सुरक्षा संबंधी जरूरतों के चलते उनकी सरकारें अनुरोध करेंगी। निर्यात प्रतिबंध खेती की आय को प्रभावित करेगा। जब कीमतें कम होती हैं तो निर्यात की इजाजत होती है लेकिन जब कीमतें अधिक होती हैं तो निर्यात पर प्रतिबंध लग जाता है। इससे दीर्घावधि में आय प्रभावित होती है। गेहूं की दिक्कत से निपटने के लिए सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अस्थायी अधिभार जैसी व्यवस्था करनी चाहिए। बाजार आधारित उपाय भी मौजूद हैं जिनकी मदद से देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। परंतु दुख की बात है कि सरकार ने सबसे बुरा उपाय अपनाया।

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