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भारतीय मध्य वर्ग की अजीब दास्तान
असली बात यह है कि मध्य वर्ग का महत्व नहीं है क्योंकि वह मतदान नहीं करता है। मध्य वर्ग की आबादी 2 फीसदी से बढ़कर 40 फीसदी हो गई है और उसके द्वारा मतदान का प्रतिशत अभी भी जस का तस बना हुआ है। विस्तार से बता रहे हैं
सुरजीत एस. भल्ला /  May 14, 2009

एक मशहूर वाक्यांश में अमेरिकी समाजशास्त्री बैरिंगटन मूर ने घोषणा की है, 'पूंजीपति वर्ग नहीं होगा- तो लोकतंत्र भी नहीं होगा'।

अपने आशय को समझाते हुए उन्होंने कहा कि मध्य वर्ग की एक अनिवार्य विशेषता यह है कि वह लोकतंत्र की मांग करता है। राजनीति विज्ञानी काफी रोचकता के साथ भारत के रहस्य की चर्चा करते हैं- एक गरीब देश, फिर भी सफल लोकतंत्र।

आज आजादी के 62 साल बाद भारत एक पूर्ण लोकतंत्र है और उसकी कुल आबादी में मध्य वर्ग की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत है। (मध्य वर्ग की मेरी परिभाषा के मुताबिक पांच सदस्यों का एक परिवार जिसकी वार्षिक आय 1.65 लाख रुपये से अधिक हो)।

इसके अलावा अगर मध्य वर्ग में शामिल होने के लिए तैयार 10 से 20 प्रतिशत लोगों को जोड़ लिया जाए तो मध्य वर्ग काफी प्रभावशाली हो जाता है। अब इसके असर की चर्चा करते हैं। मध्य वर्ग क्या चाहता है, और क्या नहीं चाहता है? यह आरक्षण की जगह सकारात्मक कार्रवाई चाहता है। यह मेरिट में यकीन करता है, और सभी के लिए समान अवसर चाहता है।

उसका मानना है कि गरीबी को महिमामंडित करना (जैसा कि अक्सर भारत में राजनीतिक दल करते हैं) हमारे नेतृत्व के विरोधाभास का प्रतीक है। राजनीतिक उद्देश्यों से भारतीय नेताओं ने इसका विरोध किया है और पिछले 40 वर्षों के भारत, उसके नागरिकों और उसके गरीबों की हालत में कोई बदलाव नहीं आया है।

उदाहरण के लिए आज गरीबी रेखा की परिभाषा वही है जो 1973 में थी। क्या गरीबी रेखा को फिर से तय नहीं किया जाना चाहिए? मध्य वर्ग मुकाबले के लिए समान अवसर चाहता है और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि अगर नतीजे असमान रहते हैं। वह असमानता के अध्ययन को ईष्या का अर्थशास्त्र मानता है, लेकिन मजबूती के साथ समान शुरुआत की बात को भी मानता है।

और अपने निहित स्वार्थों के बावजूद और मूल्यों पर जोर के बावजूद वह मानता है कि राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों और नौकरशाहों की सांठगांठ आर्थिक विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा है। साथ ही वह पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और बेहतर प्रशासन (और नतीजतन कम भ्रष्टाचार) में यकीन रखता है। मध्य वर्ग की मांगों के अपने निहितार्थ भी हैं।

इस चुनावों में मध्य वर्ग के कई सुप्रसिद्ध चेहरे देखने को मिले। चुनाव मैदान में स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर कई पेशेवर भी उतरे। यह मायने नहीं रखता है कि वे हारते हैं या जीतते हैं। उन्होंने प्रमुख राजनीतिक दलों को एक बात साफ तौर पर जता दी है- पहले सुधार कीजिए और उसके बाद ही परिणाम मिलेंगे। नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के चुनाव घोषणा पत्र पर गौर कीजिए।

दोनों ने 'गरीबों के नाम पर चलाए जाने वाले' परंपरागत सरकारी सब्सिडी कार्यक्रमों में व्यापक बदलाव लाने की बात कही है। जैसा कि सभी को पता है, मौजूदा कार्यक्रमों को इस तरह तैयार किया गया है ताकि अधिकतम लूट-खसोट हो सके, इन्हें इस तरह तैयार किया गया है ताकि गरीबों को छोड़कर सभी को इसका फायदा मिले।

इन कार्यक्रमों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें बनाया तो गरीबों की मदद के लिए गया है लेकिन ये राजनीतिज्ञों और सभ्रांत नौकरशाही (और बिचौलियों) की मदद करते हैं, जिन पर इन कार्यक्रमों को लागू करने का दायित्व है। इसका एक उदाहरण भारत का खाद्य सब्सिडी कार्यक्रम है।

गरीबों को सीधे नकद सब्सिडी या खाद्य कूपन (इस बारे में एक मुख्य कार्यक्रम को तीन साल पहले पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने खारिज कर दिया था) के बजाए हमारे पास एक ऐसी प्रणाली है जो अमीरों का पेट भरती है। जैसे कि चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार जैसे मध्य वर्ग के नेताओं ने स्पष्ट किया है गरीबों के लिए मौजूदा खाद्य सब्सिडी कार्यक्रम की जगह नकद हस्तांतरण योजना को लागू किया जाएगा।

यह धन किसी एक व्यक्ति को नहीं मिलेगा। यह धन सीधे लाभान्वित व्यक्ति के खाते में जमा कराया जाएगा और यह खाता उस परिवार की महिला के नाम पर होगा। आने वाले दिनों में इस योजना का दूसरे क्षेत्रों में विस्तार हो सकता है। बच्चों को स्कूल भेजने की जरूरत है, उन्हें समय पर टीका लगना चाहिए।

कई देशों का अतीत भारत का वर्तमान और भविष्य है। मध्य वर्ग इस बात में यकीन नहीं रखता है कि उसे हमेशा पहिए का आविष्कार करना पड़ेगा या बैलगाड़ी की सवारी करनी होगी। जबकि ऐसा कहना हमारे नेताओं के बीच फैशन बन गया है। अगर पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ अच्छे विचार आते हैं तो वह उन्हें स्वीकार करेगा।

नीतीश और चंद्रबाबू के नकद हस्तांतरण की तरह ही सूचना का अधिकार कानून भी मध्य वर्ग के विश्वासों को दर्शाता है। काम के बदले अनाज कार्यक्रम में भ्रष्टाचार व्याप्त है और पारदर्शिता का अभाव है। दूसरी ओर कम्युनिस्टों का मानना है कि गरीब सीधे मिलने वाले धन को शराब में नष्ट कर देंगे, इसलिए हमें उन्हें घुमा फिराकर धन देना चाहिए।

और इस धन को इतना घुमाया-फिराया जाता है कि बेचारा गरीब कभी इस धन को देख ही नहीं पाता है। राजीव गांधी ने 25 साल पहले इस ओर ध्यान दिलाया था। उन्होंने कहा कि गरीबों के लिए केंद्र से भेजे जाने वाले 1 रुपये में से उन्हें केवल 15 पैसे ही मिलते हैं। हालांकि राजीव गांधी काफी आशावादी थे। दरअसल गरीबों को 15 पैसे से भी काफी कम मिल पाता है, कई बार सिर्फ 10 पैसे।

लेकिन असली बात यह है कि मध्यवर्ग का महत्त्व नहीं है क्योंकि वह मतदान नहीं करता है। मध्य वर्ग की आबादी आज 2 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत हो गई है, और उनके द्वारा मतदान का प्रतिशत अभी भी जस का तस बना हुआ है। पप्पू द्वारा वोट नहीं देने के तर्क को हजम कर पाना मुश्किल है।

दक्षिणी मुंबई की अलग कहानी है, और इस कारण चुनाव प्रशासन में सुधार के बारे में सोचा जा सकता है या शायद सोचना चाहिए। जर्मनी की तरह भारत में भी चुनाव रविवार को क्यों नहीं कराए जाते हैं? हम वोट देने के लिए अलग से एक छुट्टी क्यों देते हैं? इस पर चुनाव आयोग को सोचना चाहिए।

और यह शायद सिर्फ मैं सोचता हूं या ज्यादातर लोगों का ऐसा ही मानना है कि चुनाव आयोग नियंत्रण से बाहर हो गया है। एग्जिट पोल पर प्रतिबंध (उनका क्या अर्थ है जबकि सभी मानते हैं कि वे गलत हैं) और सबसे बुरी स्थिति थी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक जैसे आधिकारिक आंकड़ों को जारी करने से रोकना। इससे लगता है कि आयोग अपनी सीमाओं को लांघ रहा है।

मध्य वर्ग की एक विशेषता यह है कि वह अनेकता में एकता के सिद्धांत में भरोसा रखता है। ऐसे में मध्य वर्ग के उदय का एक अर्थ यह है हम जल्द ही क्षेत्रीय राजनीति के दौर को खत्म होते हुए देखेंगे। क्या लालू, मुलायम, मायावती या वाम दलों की तरह विभाजनकारी नेताओं का कोई भविष्य है?

ऐसे में जल्द ही भारतीय राजनीति एक बड़े बदलाव से रूबरू होने वाली है, बशर्ते मध्य वर्ग छुट्टी मनाने की मानसिकता से निकल कर पोलिंग बूथ तक पहुंचने लग जाए।

(लेखक ऑक्सिस इनवेस्टमेंट के अध्यक्ष हैं और एनडीटीवी प्रॉफिट पर टॉक शो टफ टॉक के प्रस्तोता हैं)

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