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देश के सूक्ष्म वित्त संस्थानों के समक्ष बड़ी चुनौतियां

बैंकिंग साख
तमाल बंद्योपाध्याय /  May 05, 2022

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वर्ष 2011 में बचत बैंक खातों पर ब्याज दरों को विनियंत्रित कर दिया था। इसके बाद कुछ निजी बैंकों ने ग्राहकों को आकर्षित करने में पूरी ताकत झोंक दी थी। अब करीब एक दशक से अधिक समय बीतने के बाद जब बैंङ्क्षकग नियामक ने पिछले महीने सूक्ष्म ऋण के  लिए उधारी दर विनियंत्रित करने का निर्णय लिया तो सूक्ष्म वित्त संस्थानों (एमएफआई) ने पहले दिन से ही अपनी ब्याज दरें बढ़ानी शुरू कर दीं। बैंकों के मामले में उपभोक्ताओं को लाभ हुआ तो दूसरी तरफ बैंकों ने भी एक अवधि के दौरान बचत जमा के रूप में काफी रकम एकत्र कर ली। सूक्ष्म ऋण के मामलों में उपभोक्ताओं को नुकसान हुआ क्योंकि उनके लिए ब्याज का बोझ बढ़ गया।

कोविड-19 महामारी के बाद कुछ बैंकों ने अपनी ब्याज आय बढ़ाने के लिए ब्याज दरें बढ़ा दी हैं। अधिक आय प्राप्त होने से वे फंसे ऋण के लिए अधिक मात्रा में प्रावधान कर पाएंगे। दूसरी तरफ कुछ सूक्ष्म वित्त संस्थानों में फंसे ऋण का अनुपात उनके ऋण खातों का 20 प्रतिशत हिस्से से अधिक हो गया है।

मार्च मध्य में आरबीआई ने सूक्ष्म वित्त संस्थानों के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए जो अप्रैल से लागू हो गए हैं। नए दिशानिर्देशों के तहत सूक्ष्म वित्त संस्थानों को ब्याज दरें तय करने का अधिकार तो मिल गया मगर उन्हें निदेशकमंडल द्वारा स्वीकृत पारदर्शी नीति का पालन करना होगा। ग्राहकों के पिछले रिकॉर्ड एवं उनकी जोखिम लेने की क्षमता के आधार पर वे अलग-अलग ब्याज दर तय कर सकते हैं। नए दिशानिर्देशों में सूक्ष्म कर्जदार की भी परिभाषा तय की गई है। सालाना 3 लाख रुपये आय वाले परिवारों को उनकी आधी कमाई के  अनुपात में सूक्ष्म ऋण दिया जा सकता है। एनबीएफसी-एमएफआई के लिए असुरक्षित ऋण की हिस्सेदारी उनकी ऋण सूची (पोर्टफोलियो) का 85 प्रतिशत से कम कर 75 प्रतिशत कर दी गई है।

ज्यादातर लोगों को ब्याज दरें नीचे आने की उम्मीद थी। खासकर, जिन बैंकों को पूंजी जुटाने में अधिक लागत नहीं आती है उनके बारे में लग रहा था कि वे ब्याज दरें घटाएंगे। एमएफआई के मुकाबले बैंकों को रकम जुटाने में लगभग आधी लागत आती है। बैंक इस आधार पर ऊंची ब्याज दरों को वाजिब ठहरा सकते हैं कि सूक्ष्म ऋण असुरक्षित समझे जाते हैं। अधिकांश छोटे ग्राहकों के लिए ऋण पर लगने वाले ब्याज की तुलना में ऋण की उपलब्धता अधिक मायने रखती है। ऊंची ब्याज दर वसूलने के बाद भी बैंक ग्राहकों के लिए रकम के अन्य स्रोतों की तुलना में अधिक सहज होते हैं। बैंकों को ब्याज दरें कम करने में थोड़ा समय लगेगा। इस बीच सूक्ष्म ग्राहकों के समक्ष थोड़ी असहज स्थिति पैदा हो गई है। कुछ सूक्ष्म वित्त संस्थानों की वेबसाइटों पर ब्याज दरों में बहुत अंतर दिख रहा है। पहली बार कर्ज लेने वाले को शुरू में मौजूदा ग्राहकों की तुलना में दोगुना ब्याज का भुगतान करना पड़ सकता है।

सूक्ष्म ऋण की ब्याज दर तय करने में बीमा खर्च शामिल करने से भी उलझन बढ़ रही है। ज्यादातर सूक्ष्म ऋण बीमित होते हैं। बीमा प्रीमियम शामिल होने की वजह से ब्याज दरें अधिक होंगी मगर प्रीमियम बैंकों के पास नहीं जाते हैं। कर्जदाता संस्थानों को इस पर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट करनी चाहिए मगर इतना तो तय है कि ब्याज दरें तय करने के लिए बीमा प्रीमियम शामिल करना ब्याज दर संरचना को बिगाड़ सकती है। नए दिशानिर्देशों के परिणाम देखने के लिए हमें एक से दो वर्षों तक इंतजार करना पड़ सकता है। सूक्ष्म ऋणों के जिला स्तर से लेकर छोटी जगहों तक पहुंचने में भी इतना समय लग सकता है। समय बीतने के साथ ही कुछ नई चुनौतियां भी सामने आएंगी। उदाहरण के लिए सूक्ष्म उधारी के लिए दशकों पुराना संयुक्त उत्तदायित्व समूह या जेएलटी प्रारूप धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। इसकी वजह यह है कि समूह के सभी सदस्यों की साख एक जैसी नहीं होती है। लिहाजा जोखिम लेने की क्षमता के आधार पर अलग-अलग लोगों को अलग-अलग ब्याज दर का भुगतान करना होगा। मगर समूह आधारित उधारी अब लंबे समय तक टिकती नजर नहीं आ रही है।

कर्जदाता संस्थान अब कर्जदाता के कर्ज-पूंजी अनुपात पर ध्यान देंगे क्योंकि सालाना 3 लाख रुपये सालाना आय वाले परिवार उतना ऋण पा सकेंगे जितना वे अपनी आधी कमाई से भुगतान कर पाएंगे। इस आधार पर अगर कोई परिवार 12,500 रुपये मासिक किस्त चुकाने में सक्षम है तो उसे 2.45 से 3.45 लाख रुपये के बीच ऋण मिल सकता है। ऐसे ऋण पर ब्याज दर 18-20 प्रतिशत और इसकी परिपक्वता अवधि दो से तीन वर्षों के बीच रह सकती है। यह गणना सरल जरूर लगती है मगर इसका क्रियान्वयन उतना आसान बिल्कुल नहीं है। उदाहरण के लिए जिस परिवार ने कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं-बीज, उर्वरक, कीटनाशक आदि-खरीदने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड योजना के तहत ऋण लिया है वह हरेक महीने इस ऋण का भुगतान नहीं करता है। ऐसे परिवार द्वारा मासिक ब्याज भुगतान की गणना कैसे हो पाएगी?

किसी परिवार की सालाना आय की गणना किस आधार पर होगी? कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में बाल मजदूरी खूब दिख जाती है। चाय दुकानों पर रोजाना 100-100 रुपये कमाने वाले किशोर लड़कों की आय उनकी पारिवारिक आय में जोड़ी जा सकती है। इसी तरह विवाह के बाद किसी स्कूल में पढ़ाने वाली महिला शिक्षिका का वेतन उसके माता-पिता और उसके पति के परिवार दोनों में गिना जा रहा है। यह दोहरी गणना कैसे रोकी जा सकती है? आने वाले वर्षों में नए उत्पाद, प्रक्रिया एवं डिजिटलीकरण के पहलू सामने आएंगे और ब्याज दरें कम हो जाएंगी। सूक्ष्म वित्त उद्योग में भी बदलाव आएगा क्योंकि कुछ छोटे सूक्ष्म वित्त संस्थानों पर बंद होने या बड़े संस्थानों में विलय का दबाव बढ़ रहा है। सूक्ष्म वित्त संस्थानों की पहुंच बढ़ेगी और ग्राहकों को कम ब्याज दरों का लाभ मिलेगा। इससे 3 लाख रुपये सालाना आय का प्रावधान समाप्त हो जाएगा और ऐसे परिवार नियमित ग्राहक बन जाएंगे। इसके साथ ही सूक्ष्म वित्त खंड में नए ग्राहक जुड़ते जाएंगे।

Keyword: सूक्ष्म वित्त संस्थान, बड़ी चुनौतियां, आरबीआई, बचत बैंक खाते, ब्याज दर, एमएफआई,
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