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दोबारा संतुलन आवश्यक

संपादकीय /  May 02, 2022

गत सप्ताह जारी हुई भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मुद्रा एवं वित्त संबंधी नयी रिपोर्ट (आरसीएफ) में वृहद आर्थिक प्रबंधन का एक काबिलेतारीफ विश्लेषण आधारित आकलन पेश किया गया है जिसमें नीतिगत हस्तक्षेप का मध्यम अवधि का खाका मौजूद है। हालांकि यह रिपोर्ट केंद्रीय बैंक का आधिकारिक रुख प्रकट नहीं करती लेकिन फिर भी नीति निर्माताओं को इसे ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए। आरबीआई के आर्थिक एवं नीतिगत शोध विभाग के अर्थशास्त्रियों ने इस बात पर जोर दिया है कि अब जबकि अर्थव्यवस्था महामारी के कारण मची उथलपुथल से उबर रही है, तब मौद्रिक और राजकोषीय दोनों नीतियों को नये सिरे से संतुलित किया जाए। इसमें देरी होने से वृहद आर्थिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं। उदाहरण के लिए आरबीआई ने महामारी के शुरुआती दौर में नुकसान को कम करने के लिए आक्रामक प्रतिक्रिया दी और नीतिगत दरों में कटौती के अलावा व्यवस्था में भरपूर नकदी मुहैया कराई। सरकारी व्यय में भी इजाफा किया गया ताकि लोगों की जान और आजीविका दोनों को बचाया जाए। बहरहाल, सरकार और आरबीआई दोनों नीतिगत समायोजन समाप्त करने के अनिच्छुक नजर आ रहे हैं जबकि अर्थव्यवस्था झटके से उबर रही है।

इस अनिच्छा को समझना मुश्किल नहीं है। राजकोषीय और मौद्रिक दोनों प्राधिकार आर्थिक सुधार को सहारा देना चाहते हैं। लेकिन यह समझना अहम है कि लंबे समय तक अतिशय नीतिगत समायोजन वृहद आर्थिक असंतुलन कायम कर सकता है और इससे मूल उद्देश्य को पाने में दिक्कत हो सकती है। भारत ने वैश्विक वित्तीय संकट के बाद नीतिगत संतुलन कायम करने में देरी की और उसे इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। इस बार वह गलती दोहरानी नहीं चाहिए और जल्दी सुधार किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए मुद्रास्फीति की दर तय दायरे से ऊपर है। निजी क्षेत्र का अनुमान बताता है कि दरें लगातार तीसरी तिमाही तक 6 फीसदी के स्तर से ऊपर रहेंगी। कानून के मुताबिक इसे मुद्रास्फीति लक्ष्य प्राप्त करने में विफलता माना जाएगा। ऐसे में कानूनी अनिवार्यताएं केंद्रीय बैंक पर बहुत दबाव डालेंगी ताकि वह अपनी विश्वसनीयता की रक्षा कर सके। आरबीआई काफी समय से मुद्रास्फीति के दबाव को कम करके आंक रहा है जिसके चलते नीतिगत समायोजन को वापस लेने में देर हुई है। जैसा कि आरसीएफ में कहा गया है यदि अधिशेष नकदी शुद्ध मांग के 1.5 फीसदी से अधिक पर बनी रहती है और नकदी में हर एक फीसदी का इजाफा मुद्रास्फीति को एक साल में 60 आधार अंक तक बढ़ा सकती है। आरबीआई नकदी का ऊंचा स्तर बरकरार रखे हुए है।

राजकोषीय नीति के संदर्भ में रिपोर्ट में कहा गया है कि सुदृढ़ीकरण के जरिेये वृद्धि को थामे रहने की संभावना कम है। राजकोषीय गुणक मेंं बदलाव अर्थव्यवस्था की स्थिति के मुताबिक बदलता है। हालांकि यह संकट के समय से अधिक है लेकिन विस्तार के दौरान यह एक से कम या ऋणात्मक भी रह सकता है। भारत में अब अतिशय सार्वजनिक ऋण की भी समस्या है। रिपोर्ट में कहा गया  है कि डेट और सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में 66 फीसदी के बाद हर एक प्रतिशत इजाफा वृद्धि पर बुरा असर डालता है। 2020-21 में हमारे देश में यह 89.4 फीसदी था और अगले पांच वर्ष में उसके 75 फीसदी से कम होने की संभावना नहीं है। उच्च सार्वजनिक ऋण वृद्धि पर असर डालेगा। अनुमान बताते हैं कि भारत को मध्यम अवधि के लिए ठोस राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता है ताकि वह वृद्धि का बचाव कर सके।

ऐसे में राजकोषीय नीति और मौद्रिक नीति दोनों को समायोजित करना आवश्यक है ताकि मध्यम अवधि में वृद्धि का बचाव हो सके। आर्थिक सुधार के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्यम अवधि में हमारी वृद्धि 8.6 फीसदी से 6.5 फीसदी के बीच रह सकती है। वैश्विक अनिश्चितता और घरेलू कर्ज को देखते हुए इस दायरे के निचले स्तर की वृद्धि हासिल करना भी एक उपलब्धि होगा। 2012-13 और 2019-20 में वृद्धि दर का रुझान 6.6 फीसदी था।

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