बिजनेस स्टैंडर्ड - पीएलआई में शामिल करें सरकार के लिए प्रतिफल
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पीएलआई में शामिल करें सरकार के लिए प्रतिफल

गुरबचन सिंह /  April 21, 2022

सरकार की महत्त्वाकांक्षी उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना को न केवल देश में उच्च लागत के नुकसान से पार पाना है बल्कि उसे कुछ चुनिंदा उद्योगों में बहुत बड़े पैमाने पर उत्पादन को प्रोत्साहन भी देना है। इस योजना का लक्ष्य उत्पादन की हर इकाई की लागत कम करना और अर्थव्यवस्था की नहीं बल्कि देश की भी मदद करना है। बहरहाल जैसा कि हम जानते हैं इससे कई चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं जिन्हें हल करना आवश्यक है।

कॉर्पोरेट जगत को इससे पहले भी कई प्रकार के लाभ मुहैया कराए जा चुके हैं। उनके लिए कॉर्पोरेट कर दरों में खासी कटौती की गई है, वास्तविक ब्याज लागत को बहुत कम स्तर पर रखा गया है, सीमा शुल्क में महत्त्वपूर्ण बढ़ोतरी की गई है और डॉलर की कीमत ऊंची बनाए रखी गई है। ऐसा विदेशी मुद्रा भंडार के स्तर में निरंतर इजाफा करके किया गया है। जाहिर है ऐसे कदमों से घरेलू कारोबारों को मदद मिलती है।

इन सब बातों को बीएसई सेंसेक्स के ऊंचे स्तर में भी साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार को पीएलआई जैसा एक और वित्तीय प्रोत्साहन मुहैया कराना चाहिए अथवा नहीं।

पीएलआई योजना के प्रति हिचकिचाहट उस समय और ज्यादा नजर आती है जब हम देखते हैं कि इस योजना पर 1.93 लाख करोड़ रुपये से 3.47 लाख करोड़ रुपये के बीच राशि खर्च होने का अनुमान है। यह बहुत अधिक धनराशि है। खासकर ऐसे समय में जब सरकार वित्तीय दबाव में है और उसे तेल पर भारी भरकम कर का सहारा लेना पड़ रहा है जो अपने आप में प्रतिगामी कदम है और जो मुद्रास्फीति को बढ़ावा देने वाला है।

पीएलआई योजना की भारी भरकम अवसर लागत के बावजूद, योजना के समर्थकों में इसे लेकर भारी उत्साह है। हालांकि इसके साथ-साथ कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनके मन में इसे लेकर विभिन्न प्रकार के संदेह भी हैं। ये संदेह उस स्थिति में खास तौर पर सिर उठा रहे हैं जहां सरकारी बजट पर नकारात्मक असर डाले बगैर भी वांछित लक्ष्यों को हासिल करने के लिए वैकल्पिक नीतियां उपलब्ध हो सकती हैं। पीएलआई योजनाओं को अपनाया जाना चाहिए अथवा नहीं, इस बहस में गहराई से गए बिना मैं वास्तव में एक अलग ही मुद्दे पर बात करना चाहता हूं।

चलिए हम मान लेते हैं कि वास्तव में पीएलआई योजना लागू होनी चाहिए। अब सवाल यह उठता है कि इस योजना की रूपरेखा दरअसल क्या होनी चाहिए? इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि इसका डिजाइन किस तरह का होगा। एक और जरूरी बात जिस पर तवज्जो देनी होगी वह यह है कि इन योजनाओं से पूरा देश लाभान्वित हो सकता है, लेकिन वास्तविक लाभ उन कंपनियों को होगा जिन्हें प्रोत्साहन दिया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में सरकार, करदाताओं या आम जनता को कोई लाभ होता नहीं दिखता है। ऐसे में एक सुझाव यह भी है कि इस योजना में कुछ बदलाव करके ऐसी व्यवस्था की जाए कि सरकार को भी कुछ प्रतिफल हासिल हो सके। सरकार को मिलने वाले प्रतिफल को कंपनी के प्रदर्शन और उसे हासिल होने वाले प्रोत्साहन से जोड़ा जा सकता है।

हम जानते हैं कि किसी कंपनी के प्रदर्शन को कई संकेतकों के आधार पर आंका जा सकता है। पहला संकेतक तो यही हो सकता है कि कंपनी का मुद्रास्फीति के समायोजन के पश्चात भुगतान (लाभांश तथा शेयर पुनर्खरीद) की समयावधि के एक तयशुदा ढर्रे के ऊपर हो। एक अन्य संकेतक यह भी हो सकता है कि प्राप्तकर्ता कंपनी के कर्मचारियों का वेतन तथा उन्हें मिलने वाला बोनस आदि एक तय स्तर से अधिक हों। इसके अलावा एक संकेतक यह हो सकता है कि प्राप्तकर्ता कंपनी के शेयर का बाजार में वास्तविक बाजार मूल्य तीन वर्ष के औसत से अधिक हो और वह भी एक तय ढर्रे पर ही हो।

पीएलआई योजना में यदि उक्त संशोधन किए जाएं तो इससे व्यापक उत्पादन या उच्च मुनाफे पर कोई असर नहीं होगा, एक छोटी सी शर्त बस यह है कि उन्हें बहुत मामूली हिस्सा, उदाहरण के लिए अतिरिक्त अर्जित आय का पांचवां हिस्सा सरकार को चुकता करने को कहा जाए। पीएलआई योजना में उपरोक्त संशोधन करके ही सरकार को वित्तीय प्रोत्साहन के बदले उचित प्रतिफल मिलना सुनिश्चित किया जा सकता है। बहरहाल, यदि उपरोक्त संशोधन जटिल प्रतीत होते हैं या माना जाता है कि इससे प्राप्तकर्ता कंपनी के प्रबंधन के समक्ष नैतिक दुविधा उत्पन्न हो सकती है तो हम इसका ढांचा सहज भी बना सकते हैं। वित्तीय प्रोत्साहन देते समय ही सरकार को प्राप्तकर्ता कंपनी के कुछ शेयर नि:शुल्क प्रदान किए जा सकते हैं। पीएलआई योजना के लिए सुझाए गये दो अलग-अलग संशोधन आपस में भिन्न कैसे हैं? दूसरे मामले में सभी प्राप्तकर्ता कंपनियों को सरकार को प्रतिफल मुहैया कराना होगा भले ही वे कितनी भी सफल क्यों न हों। इतना ही नहीं प्राप्तकर्ता कंपनी को हर उस वर्ष सरकार को प्रतिफल देना होगा, जब वह अंशधारकों को भुगतान करेगी। भले ही भुगतान की राशि कम हो या ज्यादा। इससे पहले जिस संशोधन पर विचार किया उसमें ये बातें शामिल नहीं थीं।

निश्चित तौर पर कानून, आर्थिकी, लोक प्रशासन और राजनीति को लेकर काफी काम करने की आवश्यकता है ताकि पीएलआई योजना में अबाध और सार्थक संशोधन किए जा सकें। यह आलेख यहां शामिल बुनियादी सिद्धांत पर आधारित है। यह भविष्य की प्रोत्साहन योजनाओं के लिए एक नजीर के रूप में भी बेहतर होगा। निष्कर्ष की बात करें तो यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार को महंगी पीएलआई योजना चलानी चाहिए या नहीं लेकिन अगर अभी वित्तीय प्रोत्साहन उपलब्ध कराया जाता है तो भविष्य में सरकार को कुछ संभावित प्रतिफल मिलना चाहिए।

Keyword: प्रतिफल, पीएलआई योजना, उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना, उच्च लागत, ब्याज, बीएसई सेंसेक्स,
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