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बेहतर विपणन से पनपेगा औषधीय पौधों का कारोबार

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  April 21, 2022

साधारण बीमारियों तथा तकलीफों के इलाज में अपेक्षाकृत सस्ती तथा पौधों आदि से बनने वाली दवाओं के बढ़ते इस्तेमाल के कारण देश में औषधीय पौधों की खेती आकर्षक कृषि कारोबार बन गया है। वनों में मिलने वाली जड़ी बूटियां जो विभिन्न प्रकार के उपचारों में काम आती थीं, वे तेजी से कम हो रही हैं। ऐसे में अब आवश्यक हो गया है कि इन औषधीय पौधों को खेतों में उगाया जाए ताकि औषधि, सौंदर्य प्रसाधन तथा अन्य उद्योगों में इनकी बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके। इन पौधों की खेती में आम तौर पर बहुत अधिक निवेश की आवश्यकता नहीं होती, बहुत अधिक जमीन की जरूरत भी नहीं होती मगर ये बहुत अच्छी कीमत पर बिकते हैं। पौधों से संबंधित कृषि-आर्थिकी का कुछ ज्ञान अच्छा प्रतिफल पाने में अवश्य मददगार होता है। अब ऐसे विभिन्न मंच हैं जहां यह जानकारी तत्काल हासिल की जा सकती है। कई सरकारी और निजी संस्थान औषधीय पौधों की खेती का प्रशिक्षण देते हैं। जड़ी बूटियों से बनने वाली औषधियों तथा अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों के अधिकांश बड़े निर्माता अनुबंधित कृषि पसंद करते हैं जहां वे उत्पादकों को साझी सहमति वाली कीमत पर पूरी उपज खरीदने की गारंटी देते हैं।

कई किसान उत्पादक संगठन और स्टार्ट अप भी इस क्षेत्र में आ गये हैं। उनमें से कई ने अपने ब्रांड भी बना लिए हैं। सबसे अहम बात यह है कि औषधीय जड़ी बूटियों, उनके सत्व तथा अन्य उत्पादों का निर्यात भी जोर पकड़ रहा है। वर्ष 2019-20 में भारत ने 53.9 करोड़ डॉलर की आयुर्वेदिक औषधियों, त्वचा की देखभाल से जुड़े उत्पादों तथा अन्य औषधीय उत्पादों का निर्यात किया। इसमें से ज्यादातर निर्यात यूरोप तथा अन्य विकसित देशों को किया गया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक दुनिया भर में 80 फीसदी से अधिक लोग मामूली स्वास्थ्य समस्याओं के लिए पौधों से बनी घरेलू दवाओं पर भरोसा करते हैं। आम तौर पर लोग प्राथमिक चिकित्सा के लिए देसी तरीकों पर ही भरोसा करते हैं। इससे भी अहम बात यह है कि फिलहाल इस्तेमाल हो रही करीब 40 फीसदी औषधीय सामग्री पौधों तथा अन्य प्राकृतिक चीजों से बनती हैं। भारत में पारंपरिक स्वास्थ्य प्रबंधन प्रणाली की जड़ें अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक गहरी हैं। आयुर्वेद के अलावा प्राचीन चिकित्सा प्रणाली का भी तेजी से आधुनिकीकरण हो रहा है। सिद्ध और यूनानी जैसी कई चिकित्सा पद्धतियां अब भारतीय स्वास्थ्य सेवा जगत का नियमित हिस्सा बन चुकी हैं। यहां तक कि होमियोपैथी जिसमें बड़ी तादाद में पौधों के सत्व का इस्तेमाल किया जाता है, वह भी देश में चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थापित है। हाल ही में डब्ल्यूएचओ ने भारत के साथ एक समझौता किया, जिसके तहत गुजरात के जामनगर में पारंपरिक औषधियों का वैश्विक केंद्र स्थापित किया जाएगा। यह संस्थान आधुनिक विज्ञान और प्राद्योगिकी की मदद से दुनिया भर की पारंपरिक औषधि संबंधी ज्ञान जुटाने के लिए काम करेगा।

अच्छी बात यह है कि भारत में औषधीय और उपचारात्मक गुणों वाले पौधे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। देश के 15 अच्छी तरह परिभाषित कृषि-जलवायु क्षेत्रों में करीब 18,000 तरह के पौधे पाये गए, जिनमें से आधे में चिकित्सकीय गुण हैं। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण ने करीब 8,000 चिकित्सकीय पौधों का रिकॉर्ड तैयार किया है। उनमें से कई हिमालय, पश्चिमी घाट और उन क्षेत्रों में पाये जाते हैं जो इंसानी हस्तक्षेप से बचे रहे मसलन अंडमान- निकोबार द्वीप समूह के कुछ हिस्से। उनमें से कई पौधों को देश के अलग-अलग हिस्सों में संरक्षित किया गया है। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के अलावा कुछ अन्य संगठन मसलन नैशनल मेडिसिनल प्लांट बोर्ड (एनएमपीबी) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का नैशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज आदि भी औषधीय पौधों के संरक्षण में लगे हैं। औषधीय पौधों की इस बड़ी तादाद में से करीब 2,800 प्रजातियां ऐसी हैं, जिनका भारतीय चिकित्सा व्यवस्था में व्यापक प्रयोग होता है। इनमें से करीब 1,000 की बाजार में काफी खरीद बिक्री की जाती है जबकि 200 पौधे ऐसे हैं जिनकी सालाना खरीद बिक्री 100 टन से अधिक है। तुलसी, एलो वेरा, ब्राह्मी, अश्वगंधा, इसबगोल और सेना जैसे व्यापक खपत वाले औषधीय पौधों की खेती से सालाना प्रति हेक्टेयर एक लाख रुपये तक का मुनाफा कमाया जा सकता है। शंखपुष्पी, अतीस, करंज, गुग्गल, बेल, सतावरी, कालमेघ, अशोक, गिलोय, सफेद मूसली और आंवला आदि वाणिज्यिक मूल्य वाले अन्य औषधीय पौधे हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग है।

राजस्थान में सबसे अधिक रकबे में औषधीय पौधों की खेती होती है जबकि मध्य प्रदेश उत्पादन में सबसे आगे है। उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और बिहार में भी इन पौधों की अच्छी मात्रा में खेती और उत्पादन होता है। कई अन्य राज्यों में भी औषधीय पौधों की खेती की संभावनायें छिपी हैं, जिनका दोहन अब तक नहीं किया गया है। बहरहाल औषधीय पौधों की खेती में विपणन का काम अब तक कमजोर रहा है क्योंकि बिचौलिये हावी रहे हैं। वे उत्पादकों तथा जंगल से इन जड़ी बूटियां बीनने वालों का शोषण करते हैं। कीमतों मेें पारदर्शिता नहीं है। अब आयुष (आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होमियोपैथी) मंत्रालय यह समस्या हल करने की कोशिश कर रहा है। इस दिशा में ताजा पहल है ई-चरक की शुरुआत। यह इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म है जहां चिकित्सकीय पौधों से संबंधित हितधारक आपस में बातचीत कर सकते हैं। यह पोर्टल आयुष मंत्रालय के एनएमपीबी और सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस कंप्यूटिंग (सी-डैक) ने मिलकर बनाया है। यहां विभिन्न उत्पादों की खरीद, बिक्री, उन्हें साझा करने का काम होता है और विभिन्न पक्ष जानकारी भी साझा करते हैं। चिकित्सकीय पौधा क्षेत्र के भरपूर विकास में मदद करने के लिए सुधारोन्मुखी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

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