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संपूर्ण देश में दर्शक बटोरने वाली फिल्मों का उदय

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  April 20, 2022

एस एस राजमौलि की फिल्म 'आरआरआर' ने बॉक्स ऑफिस पर 1,000 करोड़ रुपये से अधिक कमाई की है। यह फिल्म दो स्वतंत्रता सेनानियों की काल्पनिक कहानी ऌपर आधारित है। इस फिल्म में मुख्य किरदार एन टी रामाराव जूनियर और राम चरण ने निभाए हैं। यह आमिर खान की 'दंगल' (2016) और राजमौलि की ही फिल्म 'बाहुबली 2' (2017, तेलुगु और तमिल भाषा में) के बाद बॉक्स ऑफिस पर तीसरी सबसे बड़ी सफल फिल्म मानी जा रही है। विश्लेषकों का कहना है कि 'आरआरआर' दंगल की 2,200 करोड़ रुपये की अनुमानित कमाई का आंकड़ा भी पार कर सकती है। हालांकि इससे पहले भी कई फिल्मों ने भारी भरकम कमाई की है मगर तुलना के लिए उनके आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। बी सुकुमार की 'पुष्पा' (तेलुगु) के साथ 'आरआरआर' फिल्म कारोबार में आए सबसे बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रही है।

भारत में अब तक 'आरआरआर' के 800 करोड़ रुपये से अधिक कीमत के टिकट बिक चुके हैं और इनमें 230 करोड़ रुपये मूल्य के टिकट मुख्यत: मुंबई, दिल्ली सहित देश के उत्तर एवं पश्चिम के हिंदी भाषी क्षेत्रों में बिके हैं। 'मीनल मुरली' और 'जोजो' (दोनों मलयालम फिल्में) ऑनलाइन रिलीज हुईं जबकि 'पुष्पा' और 'आरआरआर' ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्मय से दिखाई जा रही हैं। बाकी टिकटों की बिक्री दक्षिण भारत में हुई है। अखिल भारतीय फिल्मों का उदय एक अच्छा संकेत है। इसका मतलब है कि अधिक से अधिक टिकटों की बिक्री होगी जिससे अधिक कमाई होगी। कोविड-19 महामारी के बाद भारतीय फिल्म कारोबार लगभग शिथिल हो गया था मगर अखिल भारतीय स्तर पर एक के बाद एक फिल्मों के प्रदर्शन से राहत मिली है और नुकसान से उबरने की प्रक्रिया तेज हो गई है।

पिछले कई वर्षों से हिंदी फिल्म उद्योग पूरे देश में दर्शक बटोरना चाहता था और दक्षिण भारतीय फिल्मों के निर्माता-निर्देशक भी दक्षिण के अलावा दूसरे भागों में कुछ इसी तरह का प्रयास कर रहे थे मगर दर्शक इसके लिए तैयार नहीं थे। 1983 में रजनीकांत और अमिताभ बच्चन अभिनीत 'अंधा कानून' तथा कमल हासन और श्रीदेवी अभिनीत 'सदमा' अपवाद थीं। मोटे तौर पर हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों ने एक दूसरे के बाजार में कदम रखने की कोशिश नहीं की। 1980 और 90 के दशकों में अगर कोई अच्छी मलयालम, तमिल या मराठी फिल्में देखना चाहता था उसे उस फिल्म की डीवीडी खरीदनी पड़ती थी, जिसमें 'सब-टाइटल' या डबिंग जैसी सहूलियत नहीं होती थी।

मगर 2000 आते-आते हिंदी मनोरंजन चैनलों ने डब की हुई तमिल और तेलुगु फिल्मों के साथ यह अंतर खत्म कर दिया। वर्ष 2016 में ओवर-द-टॉप (ओटीटी) कंपनियां आईं तो फिल्मों के अलग-अलग भाषाओं में डब होने का चलन बढ़ता ही गया। भाषा का फर्क मिटते ही पूरे देश में इन फिल्मों को दर्शक मिलने लगे। हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्में ही नहीं बल्कि भारत की कुछ बेहतरीन फिल्में मराठी, बांग्ला और असमिया भाषाओं में बनी हैं। डब हुई फिल्मों का चलन शुरू होने के एक दशक बाद और ओटीटी कंपनियों को बाजार में आए पांच वर्षों से अधिक समय बीतने के बाद दर्शकों का ऐसा समूह तैयार हो गया है, जो देश के किसी भी हिस्से में बनी फिल्मों का कद्रदान है।

मल्टीप्लेक्स आने के बाद फिल्मों को दर्शक मिलना आसान हो गया है। ऐसा भी दौर था, जब भारत में फिल्म निर्माता 1,000 दर्शकों के बैठने की क्षमता वाले सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों को ध्यान में रखकर फिल्में बनाते थे। ऐसे सिनेमाघरों में बड़े बजट और चर्चित कलाकारों वाली फिल्में ज्यादातर प्रदर्शित होती थीं, जिन्हें देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ती थी। सिनेमाघरों में सीटें जल्दी भर जाती थीं और टिकटों के दाम कम होने के बावजूद फिल्म निर्माता कमाई कर लेते थे। मगर जब बड़ी कंपनियां सिनेमाघरों के कारोबार में उतरीं तो एक से अधिक पर्दे वाले सिनेमाघरों की संख्या बढ़ती गई। मल्टीप्लेक्स आने से प्रयोगधर्मिता बढ़ी और टिकटों के दाम भी बढऩे लगे, जिससे सिनेमा कारोबार का मिजाज बदल गया। नतीजा यह हुआ कि हिंदी फिल्में मल्टीप्लेक्स के हिसाब से बनने लगीं।

दक्षिण भारतीय फिल्म बाजार अब भी काफी हद तक सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों पर निर्भर है। इस वजह से दर्शकों की पसंद-नापंसद का वे खास ध्यान रखते हैं। सिनेमाघरों में 'पुष्पा', 'आरआरआर' और ऑनलाइन माध्यम से प्रदर्शित 'दृश्यम 2' (मलयालम) तथा 'जय भीम' (तमिल) जैसी फिल्में ऐसे बाजार की ओर इशारा कर रही हैं, जिस पर लंबे समय से किसी का ध्यान नहीं गया था। हिंदी, भोजपुरी, तमिल और तेलुगु भाषाओं में डब हुई हॉलीवुड फिल्में 'अवेंजर्स' या 'स्पाइडरमैन' इस बाजार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगीं।

देश की किसी भी दूसरी भाषा की तुलना में हिंदी भाषा और इसमें तैयार सामग्री लोग 8-10 गुना अधिक बोलते और देखते हैं, इसलिए भारतीय फिल्म कारोबार में हिंदी की बड़ी हिस्सेदारी है। हालांकि दर्शकों के बड़े समूह के लिए फिल्में बनाने में पीछे रहने की वजह से हिंदी फिल्म कारोबार सभी क्षेत्रों में दर्शकों को जोडऩे में पूरी तरह सफल नहीं पाया है। द ऑर्मेक्स बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट के अनुसार यही वजह है कि तेलुगु सिनेमा 2020 और 2021 में बॉक्स ऑफिस पर आगे निकल गया। दूसरी फिल्में भी अपनी दावेदारी ठोक रही हैं इसलिए संतुलन बदलता रहेगा मगर पूरे देश में दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने वाली अखिल भारतीय फिल्में अपनी जगह से डिगने वाली नहीं हैं। अखिल भारतीय फिल्में पूरे बाजार को जोड़ कर रखती हैं और राजस्व तथा मुनाफे दोनों की संभावनाएं बढ़ा देती हैं। भारतीय सिनेमा के लिए इससे अच्छी बात और कुछ नहीं हो सकती।

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