बिजनेस स्टैंडर्ड - अध्यात्म और कारोबार के मिश्रण का असर
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अध्यात्म और कारोबार के मिश्रण का असर

आर गोपालकृष्णन /  April 14, 2022

कारोबारी संचालन को अपनाने वालों को उस समय चुनौती का सामना करना पड़ता है जब आध्यात्मिक और भौतिक चीजें मिल जाती हैं। एक आस्था पर आधारित है और दूसरा संपत्ति पर। आध्यात्मिक और भौतिक चीजों में तब भी टकराव उत्पन्न होता है जबकि हर कोई भगवान, पैसा, राजनीति और सेक्स को पसंद करता है। आश्चर्य नहीं कि गॉडमैन (बाबा आदि ) के बारे में कई किताबें लिखी गई हैं- खुशवंत सिंह (2003), भवदीप कांग (2016) और प्रियंका पाठक नारायण (2017) ने उनके बारे में लिखा है।

रुचि सोया इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरएसआईएल) ने हाल ही में पूंजी जुटाई। सन 1980 के दशक में जब आरएसआईएल की शुरुआत हुई थी उस समय मैंने सोया पर एक व्यवहार्यता अध्ययन पूरा किया था। बाद में आरएसआईएल दिवालिया हो गई। सन 2017 में योग गुरु बाबा रामदेव के सहयोगियों ने इसका अधिग्रहण कर लिया। भारत में योग और कारोबार के संबंध काफी रहस्यमय हैं। बाबा आदि अध्यात्म और भौतिक सुविधाओं का मिश्रण होते हैं और इसलिए वे सत्ता के दलाल के रूप में काम करने की क्षमता रखते हैं।  आज जब देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है तब श्रद्धा माता, चंद्रास्वामी और कई अन्य लोगों को याद कीजिए।

जिस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, उस समय धीरेंद्र ब्रह्मचारी नामक हठ योग विशेषज्ञ बेहद शक्तिशाली थे। उन्होंने एक संदेहास्पद साम्राज्य खड़ा किया। महर्षि महेश योगी और ओशो रजनीश ने भी यही किया। स्वामी प्रभुपाद के नाम से प्रसिद्ध अभय देे, सन 1965 में खाली हाथ न्यूयॉर्क पहुंचे थे। सन 1976 तक उनके पास 12 देशों में संगमरमर और सोने से सुसज्जित इस्कॉन मंदिरों का स्वामित्व था जिनकी कुल संपत्ति एक अरब डॉलर से अधिक थी। महत्त्वपूर्ण लोगों के मन में बाबाओं को लेकर गोपनीय सराहना का भाव रहता है। फिलहाल तो एक ऐसी प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश सामने आई है जो योग को कारोबार से जोड़ती है।

बाबा रामदेव को योग गुरु कहा जाता है जो कि वह हैं भी। उन्हें एक उद्यमी के रूप में भी पेश किया जाता है। उनकी गैरसूचीबद्ध कंपनी पतंजलि आयुर्वेद के पास प्रभावशाली टेलीविजन चैनलों का स्वामित्व है तथा वह आयुर्वेदिक एवं उपभोक्ता उत्पाद बाजार में हैं। कंपनी बड़े-बड़े दावे करती है जिन्हें चुनौती देने पर वह पीछे भी हट जाती है लेकिन इस बीच वह जरूरी प्रचार तो हासिल कर ही लेती है। पतंजलि के उत्पादों का प्रचार तमाम बड़े लोग करते हैं। मसलन कोविड के लिए उनकी औषधि कोरोनिल का समर्थन स्वास्थ्य मंत्री ने भी किया था। पतंजलि की हालिया सार्वजनिक पेशकश को लेकर भी अनुचित प्रचार तरीके अपनाने जैसी कुछ विवादित बातें सुनने में आईं।

सन 2015 में पतंजलि आयुर्वेद तेज प्रगति कर रही थी कि 2020 तक उसका अनुमानित कारोबार स्थापित उपभोक्ता उत्पाद कंपनियों की बिक्री से आगे निकलने और 2025 तक उसके राजस्व के 1.2 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान जताया जा रहा था। पेशेवर इक्विटी एनालिस्टों ने भावुक होकर खबरें लिखीं। आज यह आंकड़ा दूर की कौड़ी लगता है लेकिन भला चमत्कार से कौन इनकार कर सकता है?

सन 2019 में गैर सूचीबद्ध पतंजलि ने स्टॉक मार्केट में उस समय अपनी जगह बनाई जब उसने प्रभावशाली अदाणी विल्मर को पीछे छोड़कर कर्जग्रस्त आरएसआईएल को खरीदा। हालांकि अदाणी विल्मर ने 5,474 करोड़ रुपये (आउटलुक बिजनेस, 5 जून, 2020) की ऊंची बोली लगाई थी लेकिन पतंजलि कानूनी आपत्तियां उठाने में सफल रही। रहस्यमय ढंग से अदाणी विल्मर ने अपनी बोली वापस ले ली। पतंजलि की 4,350 करोड़ रुपये की बोली को जीत हासिल हुई। यहां दिलचस्प यह था कि पतंजलि इसकी फंडिंग उन्हीं सरकारी बैंकों से कर्ज लेकर करने वाली थी जिन्होंने आरएसआईएल में फंसे हुए कर्ज में 52 फीसदी नुकसान सहने का तय किया था।

कुछ कारोबारियों ने नियमों के अधीन भी ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के साथ छेड़छाड़ की है। ऐसे में प्रक्रिया और निष्कर्षों में काफी और किया जा सकता है। एक भूतपूर्व बैंकर के मुताबिक सरकारी बैंकों ने समायोजन लेनदेन के जरिये सहयोग किया। सरकारी बैंक किसी कंपनी को दिए भारी भरकम ऋण को बट्टे खाते में क्यों डालेंगे और फिर उसी कंपनी को खरीदने वाले व्यक्ति को नया ऋण क्यों देंगे?

ऐसा लगता है कि अक्टूबर 2019 में वित्त मंत्री ने एक विस्मित करने वाली घोषणा की और कहा कि बैंकों को आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा संचालित कंपनियों एवं स्वयं सहायता समूहों को ऋण देने से पीछे नहीं हटना चाहिए। एक देश के वित्त मंत्री का ऐसा बयान देना अजीब था।

रूसी कुलीनों की तरह बाबाओं का भी मजबूत ऋण सिद्धांतों एवं स्थायी उद्यमिता निर्माण पर रोचक प्रभाव होता है। सभी नहीं लेकिन उनमें से कई संदेहास्पद तरीकों से अधिकारियों की नाक के नीचे भारी संपत्ति जुटा लेते हैं। कुलीनों की तरह उन्हें भी भारी राजनीतिक संरक्षण हासिल होता है और व्यवस्था उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती है। जब यह बुलबुला फूटता है तो अचानक कुछ टीकाकार सामने आते हैं और कहने लगते हैं कि उन्होंने तो इस विषय में पहले ही चेतावनी दी थी।

यूक्रेन संकट रूसी कुलीन रोमन अब्रामोविच के मामले को रेखांकित करता है जो एक अनाथ गरीब से अरबपति बने। अब्रामोविच ने अपनी शुरुआत वाहन क्षेत्र से की थी। इसके बाद उन्होंने बोरिस बेरेजोवस्की से मित्रता और साझेदारी कर ली जो अच्छे संपर्क वाले स्थापित कुलीन थे। बोरिस येल्तसिन के साथ बेरेजोवस्की के शक्तिशाली संबंधों का इस्तेमाल करके इस जोड़ी ने यह प्रस्ताव रखा कि रूसी सरकार पहले कच्चे तेल का उत्पादन करने वाली एक सरकारी कंपनी और एक सरकारी रिफाइनरी का विलय करे और बाद में उसे उन्हें सौंप दे। बदले में उन्होंने येल्तसिन समर्थक टेलीविजन चैनल को फंड देने और चलाने की पेशकश की। सन 1995 में 29 वर्षीय अब्रामोविच ने 1.9 करोड़ डॉलर की इक्विटी और 22 करोड़ डॉलर के ऋण के साथ विलय के बाद बनी कंपनी में 90 फीसदी हिस्सेदारी हासिल कर ली। दिलचस्प यह है कि उन्होंने 10 अरब डॉलर के मुनाफे के साथ यह कंपनी एक सरकारी कंपनी गैजप्रॉम को बेच दी। ऐसे ही हथकंडे अपनाकर उन्होंने एल्युमीनियम और स्टील में कारोबार किया।

अब्रामोविच का साम्राज्य और पतंजलि में कुछ बातें समान हैं। दोनों का नेतृत्व एक ही उम्र के लोगों के पास है जिनके सत्ताधारी लोगों से करीबी रिश्ते हैं। दोनों के पास प्रभावशाली टीवी चैनल हैं, दोनों सूचीबद्ध कंपनियों में भारी हिस्सेदारी उस समय खरीदते हैं जब ऐसी कंपनियां संकट में हों। वे भारी मुनाफे पर उन्हें बेच देते हैं।  दोनों को कुछ लोग सराहते हैं तो कई उन पर शंका करते हैं। एलिस इन वंडरलैंड से शब्द उधार लें तो ऐसे मामले और अधिक जिज्ञासा से भरे होते जाते हैं। इससे पहले कि हमारे देश में ऑक्युपाई वाल स्ट्रीट जैसा कुछ हो, कर्जदाताओं, निवेशकों और नियामकों को कोशिश करनी चाहिए कि कारोबार और अध्यात्म का मिश्रण न तैयार हो।

Keyword: अध्यात्म, कारोबार, आध्यात्मिक बाबा, भौतिक चीज, गॉडमैन, आरएसआईएल, अधिग्रहण,
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