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स्वयं आरोपित प्रतिबंध दूर करने से बनेगी बात

श्याम पोनप्पा /  04 11, 2022

आने वाले महीनों में अगर भूराजनीतिक तनाव कम भी होता है तो भी वैश्विक आपूर्ति शृंखला की अनिश्चितता बरकरार रहने की आशा है। भारत तेल, गैस, परमाणु ईंधन और सोलर सेल तथा संचार उपकरणों, सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े उपकरणों तथा इलेक्ट्रिक वाहन में काम आने वाली बैटरियों के लिए कोबाल्ट, लिथियम और निकल जैसे उत्पादों के आयात पर निर्भर है। ऐसे में हमें दीर्घावधि में अपने लिए और अधिक गंभीर प्रयास करने होंगे।

रणनीति निर्माण, क्रियान्वयन और संसाधन आवंटन की वर्तमान प्रक्रिया में अनिवार्य तौर पर यह तय करना होता है कि कहां और कैसे समय, पूंजी और मानव संसाधन का आवंटन किया जाए। इस संदर्भ में विनिर्माण पर सेवा को तरजीह देने की हिमायत हो या अवसरों के हिसाब से खुली नीति अपनायी जाए या फिर विनिर्माण के लिए प्रदर्शन संबद्ध प्रोत्साहन का विरोध करने वाले हों, वे शायद इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि हमारा आकार और हमारी परिस्थितियां ऐसी स्थितियां बनाती हैं जो तब अलग होतीं जबकि हमारा देश छोटा होता या विकास के अलग चरण में होता लेकिन अंतत: ऐसा तभी होता जब हम अधिक दयालु और साफ सुथरी दुनिया में होते। एक खास स्तर की स्वायत्तता के लिए एक स्तर की सुरक्षा अनिवार्य है जिसमें रक्षा, भोजन तथा अन्य बातें शामिल हैं। हम विकास के जिस चरण में हैं उसकी उस स्थिति में अनदेखी हो जाती है जब टीकाकार उपायों को इस प्रकार नहीं तैयार करते जो हमारे तथ्यों के संदर्भों के अनुरूप हों। मिसाल के तौर पर संस्कृति, प्रक्रियाएं एवं संस्थान या उनका अभाव।

सामाजिक समरसता के अतिरिक्त दो परिस्थितियां खासतौर पर हमारी उद्यमिता और उत्पादकता को प्रभावित करती हैं जिनका समाधान करना आवश्यक है। एक तो अव्यवस्थित रुख, जहां कोई लक्ष्य तय न हो, एकीकृत योजना न हो तथा पूर्ण क्रियान्वयन की व्यवस्था न हो। दूसरी समस्या है नियामकीय बाधाएं जो अक्सर विरासती दिक्कतों के रूप में सामने आती हैं जहां उन्हें हमारी वर्तमान और अनुमानित जरूरतों के मुताबिक तैयार न किया गया हो। अव्यवस्थित व्यवहार का एक उदाहरण है बिजली उत्पादन परियोजनाओं का यूं ही पड़ा होना जबकि संभावित उपभोक्ताओं को पर्याप्त बिजली नहीं मिल पा रही है क्योंकि पारेषण और वितरण को परियोजना निर्माण की पूर्व शर्त नहीं बनाया गया। एक अन्य उदाहरण है कि ब्रॉडबैंड और दूरसंचार सेवाओं की स्थिति जहां कई उपयोगकर्ताओं को विश्वसनीय और समुचित पहुंच नहीं मिल पा रही है क्योंकि अंतिम आपूर्ति को सफलतापूर्वक सुनिश्चित नहीं किया गया। तीसरा उदाहरण हमारे राजमार्ग हैं जिनसे जुड़े प्रभावशाली आंकड़ों और उनमें से कुछ के इस्तेमाल से जुड़े अनुभवों में जबरदस्त विरोधाभास है। सबसे दिक्कत वाली बात है समर्पित और पूर्ण नियोजन वाली परियोजनाएं तैयार करना जिनका संपूर्ण क्रियान्वयन संभव हो तथा जो नयी परिघटनाओं से अप्रभावित रह सकें।

तकनीकी लिंकेज का जिस प्रकार विकास हुआ है उसे देखते हुए संचार और सूचना प्रौद्योगिकी सभी तकनीकों और बुनियादी ढांचे के वाहक हैं। हमें विश्वसनीय और बेहतर ढंग से काम करने वाले नेटवर्क की बेहद जरूरत है। अच्छी आपूर्ति और किफायत के लिए नीतिगत सुधारों की आवश्यकता है। खासकर स्पेक्ट्रम आवंटन, उसके इस्तेमाल आदि को लेकर। परिचालक की पहुंच के नियमन को लेकर भी सुधार की गुंजाइश है तथा सभी नेटवर्क संसाधनों के अधिकतम उपयोग के साथ कैसे बात बन सकती है यह भी देखने की जरूरत है। यह एक अहम काम है।

अधिकतम सेवा आपूर्ति के लिए हमें दूरसंचार जरूरतों के तीन पहलुओं पर ध्यान देना होगा:

  • कोर नेटवर्क या आधारभूत संरचना तथा ढांचा
  • उपयोग करने वाले क्लस्टर तक तथा उससे परे वितरण
  • क्लस्टर के भीतर अंतिम उपयोग संचार।

पहले स्तर पर अधिकांश शहरी या अद्र्धशहरी इलाकों में फाइबर नेटवर्क उपलब्ध हैं लेकिन आधी से भी कम ग्रामसभाओं या ग्रामीण केंद्रों में इनकी उपलब्धता है। इसका मानक यही है कि सेवाओं की आपूर्ति के लिहाज से नेटवर्क की गुणवत्ता अच्छी हो और केवल सांकेतिक कनेक्शन न हों। ग्रामीण कवरेज की समस्या को छोटे-छोटे हिस्सों में निपटाना होगा। इसके लिए बजट और समय सीमा दोनों तय करने होंगे।

दूसरे स्तर पर मौजूदा फाइबर नेटवर्क के विस्तार और लिंक वितरण की बात आती है जिन्हें हर क्लस्टर के शहरों और गांवों में साझा किया जाना हो। भारतनेट फाइबर नेटवर्क को गांव-गांव तक पहुंचाने में लगातार सामने आ रही कठिनाइयों को देखते हुए एक संभावित तरीका यह हो सकता है कि उच्च क्षमता वाले बेतार लिंक का इस्तेमाल किया जाए।

उपयुक्त बदलाव के साथ स्पेक्ट्रम बैंड मसलन 60 गीगाहट्र्ज और 70-80 गीगाहट्र्ज के बैंड को इस्तेमाल किया जा सकता है। छह गीगाहट्र्ज की मदद से उच्च गति वाले वाई-फाई को सक्षम बनाया जा सकता है। वित्तीय व्यवहार्यता का आकलन मॉडलिंग और अनुकरण के आधार पर किया जा सकता है। इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि कुछ किलोमीटर दूर स्थित ग्राम सभाओं तक फाइबर के स्थान पर बेतार लिंक पहुंचाये जाएं। ऐसा इसलिए कि कई वर्षों बाद भी फाइबर का उपयुक्त प्रसार नहीं हो सका है। ज्यादा दूरवर्ती मामलों में सैटेलाइट लिंक का इस्तेमाल जरूरी हो सकता है। नीतियों में हालिया बदलाव के बाद ऐसे लिंक उपलब्ध हो सकते हैं। तीसरे स्तर पर तयशुदा और बेतार और मध्यवर्ती दूरी के लिंक का मिश्रण इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें सेल्युलर या वाई-फाई उपयोगकर्ता पहुंच उपलब्ध हो।

औपनिवेशिक कानूनों की विरासत के चलते एक सचेत, कल्पनाशील प्रयास कामयाब हो सकता है। उदाहरण के लिए व्यापार समझौतों में प्रतिबंधित वस्तुओं की नकारात्मक सूची जहां शेष वस्तुएं उचित प्रक्रिया के साथ सेवा प्रदाताओं के विचारार्थ खुली रहती हैं। उदाहरण के लिए इससे उद्योग जगत के प्रतिनिधियों को यह अवसर मिलेगा कि वे 12 गीगाहट्र्ज पर वाई-फाई के लिए विचार करें ठीक वैसे ही जैसे कि अमेरिका, यूरोपीय संघ और यूनाइटेड किंगडम में किया गया।

उपकरणों और उपायों के लिए वैश्विक और स्थानीय दोनों तरह के बाजारों के लिए उत्पाद एवं सेवा का पहलू है जो काफी बड़ा है और जिसमें विनिर्माण तथा एकीकृत सेवाओं की बदौलत हल उपलब्ध कराना आवश्यक है। हमारे नियमन की वजह से हमारी प्रतिभाओं और उद्यमों को पल्लवित होने का अवसर नहीं मिल रहा है। ये नियमन हमें अनावश्यक रूप से प्रभावित करते हैं और हमें विवश करते हैं कि खुद को इस तरह सीमित करें जिस तरह अन्य राष्ट्र अपने लोगों को नहीं करते। राजनीति को सक्षम बनाने से ये बाधाएं दूर हो सकती हैं ताकि देश के प्रतिभाशाली युवाओं को शोध, विकास तथा प्रयोग आदि की सुविधा दी जा सके। ऐसा कोई अन्य मार्ग नहीं है जिसके माध्यम से यह आशा की जा सके कि स्थानीय बाजारों के लिए घरेलू उत्पादन किया जा सकेगा।

यदि हमारे यहां नियंत्रित परीक्षणों को तेज गति से अंजाम देने की सुविधा होती और अधिकृत औद्योगिक एवं अकादमिक संस्थानों में जांच की व्यवस्था होती तो हमारे यहां उपकरण निर्माण एवं प्रसार संभव होता। इससे डिजाइन, विकास तथा स्थानीय इस्तेमाल तथा वैश्विक बाजारों के लिए उत्पादन संबंधी हल तलाशना आसान होता। 5जी उपकरण इसका उदाहरण हैं जिनके लिए अब तक कोई घरेलू बाजार नहीं है।

(लेखक प्रस्तावित वायरलेस से संबद्ध हैं)

Keyword: प्रतिबंध, ब्रॉडबैंड, भूराजनीतिक तनाव, आपूर्ति शृंखला, भारत, तेल, गैस, परमाणु ईंधन,
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