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अपनी दृढ़ता से भारत में टिकी हैं कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियां

निवेदिता मुखर्जी /  April 10, 2022

सिटीग्रुप, हार्ली डेविडसन, फोर्ड, जनरल मोटर्स, वोडाफोन और वॉलमार्ट में एक मिलती-जुलती बात क्या हैïï? ये सभी ऐसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं जिन्होंने भारत से अपना कारोबार समेटने की घोषणा की है या उस स्थिति तक पहुंच गई हैं जहां इनके लिए परिचालन करना मुश्किल हो गया है। सिटी, हार्ली और जनरल मोटर्स भारत से अपना कारोबार समेट चुकी हैं जबकि वोडाफोन और वॉलमार्ट चुनौतियों के बावजूद डटी हुई हैं।

इन कंपनियों की कारोबारी यात्रा भारत में नीतिगत एवं नियामकीय माहौल को लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कठिनाइयों की ओर ध्यान दिलाती है। इसके साथ ही इन ब्रांडों की अलग कारोबारी जरूरतों और अनुकूल बाजारों की तरफ उनके रुझान का भी पता चलता है। 

इन कंपनियों ने कुछ खास कारणों से भारत से कारोबार समेटने का निर्णय लिया है। ये सभी अधिक आकर्षक परियोजनाओं और कारोबारी सुगमता के लिहाज से सहज बाजारों में अपनी ऊर्जा केंद्रित करना चाहती हैं। सिटी समूह ने कहा है कि वह अपनी पूंजी संचित करने के लिए दुनिया के 13 बाजारों से अपना कारोबार समेट रहा है और अधिक राजस्व देने वाले विकल्पों पर ध्यान दे रहा है। कुछ दिनों पहले ही ऐक्सिस बैंक ने सिटी के उपभोक्ता कारोबार का 12,335 करोड़ रुपये में अधिग्रहण कर लिया है। सिटीग्रुप की मुख्य कार्याधिकारी जेन फ्रेजर ने एक बयान जारी कर कहा कि समूह दुनिया के चार अग्रणी बाजार सिंगापुर, हॉन्गकॉन्ग, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और लंदन पर ध्यान केंद्रित करेगा। फ्रेजर का मानना है कि जिन 13 बाजारों से सिटी समूह कारोबार समेट रहा है वहां प्रतिस्पद्र्धा में बने रहने के लिए परिस्थितियों के साथ वह आवश्यक तालमेल नहीं स्थापित कर पा रहा है। 

जनरल मोटर्स, फोर्ड और हार्ली डेविडसन भी एक सोची-समझी रणनीति के साथ भारत से निकलना चाहती थीं मगर ऊंची कर प्रणाली से उन्हें यह फैसला जल्दी लेना पड़ा। हार्ली ने कोविड-19 महामारी के प्रसार के कुछ महीनों बाद भारत से कारोबार समेटने की घोषणा की थी। कंपनी ने 2009 में भारतीय बाजार में कदम रखा था और इसके करीब एक दशक बाद उसने यहां कारोबार बंद करने का निर्णय लिया। बाद में अमेरिका और भारत के बीच यह एक कटु व्यापारिक मुद्दा भी बन गया। अमेरिका के तत्कालीन राष्टï्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने हार्ली डेविडसन पर अधिक आयात शुल्क लगाने के लिए भारत की सार्वजनिक आलोचना की थी।

हालांकि जब कंपनी ने दुनिया के सबसे बड़े मोटरसाइकिल कारोबार से 2020 में निकलने का निर्णय लिया तो उसने कहा कि यह उसकी एक तय रणनीति का हिस्सा है। उसने कहा कि वह मुनाफा कमाने के लिहाज से सर्वाधिक अनुकूल 50 बाजारों विशेषकर यूरोप, चीन और अमेरिका के बाजारों पर ध्यान देना चाहती है। भारत से निकलते समय कंपनी ने अपने उत्पादों की सूची का आकार करीब 30 प्रतिशत तक कम कर लिया था। जनरल मोटर्स ने करीब दो दशकों तक भारत में कारोबार करने के बाद जब यहां से निकलने की घोषणा की थी तो उसका भी लक्ष्य कम मुनाफा देने वाले बाजारों से निकल कर दूसरी माकूल जगहों में कारोबार पर ध्यान देना था।

कंपनी का इशारा भारत, रूस और कुछ यूरोपीय देशों में कारोबार समेटने पर था। अमेरिका की एक दूसरी वाहन कंपनी फोर्ड ने कहा कि भारत में लगातार हो रहे नुकसान, वाहन क्षेत्र में जरूरत से अधिक उत्पादन और कारोबारी संभावनाओं के अभाव की वजह से वह कारोबार समेट रही है। कंपनी जब भारत में दोबारा कारोबार करने आई तो वह ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाई। करीब 25 वर्षों के बाद अंतत: कारोबार समेटने का निर्णय ले लिया। जापानी और कोरियाई कार कंपनियों का दबदबा अक्सर दूसरी बड़ी वाहन कंपनियों की भारत से निकलने की प्रमुख वजह रही है।

कुछ अन्य कंपनियों ने भारत में कारोबार बनाए रखने का निर्णय लिया है। वॉलमार्ट ऐसी ही एक कंपनी है। वॉलमार्ट ने भारत में बहु-ब्रांड स्टोर स्थापित करने के लिए 2007 में भारतीय बाजार में कदम रखा था। हालांकि बाद में नीतिगत बाधाओं के कारण यह कैश ऐंड कैरी (थोक) प्रारूप में उतर गई और इसके लिए भारती समूह के साथ एक संयुक्त समूह उद्यम की स्थापना की। बाद में जब 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी गई तो कंपनी को यह नीतिगत शर्त अनुकूल नहीं लगी। बाद में जब बहु-ब्रांड खुदरा के लिए इंतजार निरर्थक लगने लगा तो संयुक्त उद्यम टूट गया। हालांकि इसके बावजूद वॉलमार्ट कैश-ऐंड-कैरी कारोबार में अपने दम पर डटी रही जहां 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति है।

वॉलमार्ट की तरफ से पहला बड़ा कदम तब सामने आया जब 2018 में उसने ई-वाणिज्य कंपनी फ्लिपकार्ट में बहुलांश हिस्सेदारी 16 अरब डॉलर में खरीद ली। अमेरिका की यह कंपनी पिछले कुछ वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों से निकल चुकी है। इनमें जापान, ब्रिटेन, अर्जेंटीना और दक्षिण कोरिया आदि शामिल हैं। मगर भारत में कंपनी ने इंतजार करना उचित समझा और अपनी रणनीति बदल कर बड़ा निवेश बनाए रखा। वॉलमार्ट के साथ ही भारत में कदम रखने वाली दूसरी विदेशी कंपनियां भारत से निकल चुकी हैं।

फ्रांस की कंपनी कार्फू और ब्रिटेन की टेस्को की भारत में मामूली उपस्थिति है। दूरसंचार कंपनी वोडाफोन उन नवीनतम कंपनियों की फेहरिस्त में शामिल हो गई है जिन्हें उद्योग जगत पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है। वोडाफोन के प्रवर्तक लगातार कहते रहे हैं कि वे तब तक कंपनी में नया निवेश नहीं करेंगे जब तक सरकार राहत के उपाय नहीं करती है। हालांकि सरकार ने देश के दूरसंचार बाजार में दो कंपनियों के दबदबे की बनती स्थिति को देखते हुए राहत उपायों की घोषणा की। वोडाफोन को भारत को कई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा था।

पिछली तारीख से कर की मांग और समायोजित सकल राजस्व के मद में बकाया रकम की वजह से कंपनी लगभग दिवालिया हो गई थी। वोडाफोन जापान, अमेरिका, मिस्र और न्यूजीलैंड देशों से पहले ही बाहर निकल चुकी थी मगर भारत में इंतजार कर रही थी क्योंकि उसे यहां अच्छी संभावनाएं दिखी थीं।

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