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यूक्रेन पर रूस का आक्रमण और वैश्वीकरण के सबक

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  March 30, 2022

दो दशक पहले दुनिया के तमाम देश वैश्वीकरण की मजबूत जंजीरों से आपस में मजबूती से बंधे नजर आते थे। आज वे जंजीरें पूरी तरह टूट चुकी हैं। वित्तीय संकट के बाद लोकलुभावन संरक्षणवाद में इजाफे ने उन्हें और नुकसान पहुंचाया। इसके बाद महामारी और अब रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण किए जाने के बाद वह बंधन स्थायी रूप से भंग हो चुका है।

यूक्रेन युद्ध में अमेरिका और यूरोपीय संघ की ओर से सबसे सक्षम हस्तक्षेप के रूप में कुछ रूसी बैंकों को स्विफ्ट इंटर-बैंक मेसेजिंग सिस्टम से बाहर करके तथा कुछ रूसी कंपनियों पर व्यक्तिगत प्रतिबंध लगाकर किया गया। इसके बाद रूस के केंद्रीय बैंक को डॉलर भंडार के कुछ हिस्से तक पहुंच बनाने से रोका गया। संभव है कि ये प्रतिबंध इतने प्रभावी न रहे हों कि रूस को यूक्रेन हमले से रोक सकें। परंतु उन्होंने रूस की एकीकृत अर्थव्यवस्था को अलग-थलग करने में अवश्य कामयाबी पाई।

पश्चिमी देशों ने यूरोप और अमेरिका के साथ रूस की आर्थिक परस्परनिर्भरता को जिस तरह हथियार बनाकर इस्तेमाल किया उससे भारत और चीन समेत दुनिया भर में खतरे की घंटी बजी होगी। चीन के नेताओं ने तो पहले ही दोहरे प्रचलन वाली अर्थव्यवस्था की बात शुरू कर दी है, यानी अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा पश्चिम के साथ वृद्धि बढ़ाने वाले संबंधों पर ध्यान देगा जबकि दूसरा ऐसा घरेलू नेटवर्क तैयार करेगा जो उसे बाहरी झटकों से पूरी तरह सुरक्षित रखे। इस बात के प्रचुर प्रमाण हैं कि वैश्वीकृत व्यापार दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए लाभप्रद रहा है लेकिन विभिन्न देशों में लोक लुभावन राजनीति करने वाले नेताओं ने उन छोटे समूहों और क्षेत्रों के गुस्से का लाभ उठाया जिन्हें व्यापार में इजाफे से खास फायदा नहीं पहुंचा। इन सब बातों के बीच बड़े पैमाने पर निवेश की आवक के वैश्वीकरण पर उतना विवाद नहीं हुआ। ऐसे निवेश का आमतौर पर स्वागत किया गया। लेकिन अब वह भी असुरक्षित है।

किसी देश द्वारा अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों मेंं निवेश भी अब उसे बाहरी मोर्चे पर मची अफरातफरी से बचाने में सक्षम नहीं है। इसके लिए लोग रूसी केंद्रीय बैंक का उदाहरण देंगे। रूसी कुलीनों ने विदेशों में संपत्ति और अन्य परिसंपत्तियों में भारी निवेश किया है जो अनुपलब्ध है। रूसी बैंकों को स्विफ्ट प्र्रणाली से अलग करने से एकीकृत वित्तीय तंत्र का बाल्कनीकरण एक अहम संभावना बनकर उभरा है। जॉन मिक्लेथवेट और एड्रिन वुलरिज ने ब्लूमबर्ग में लिखा कि पूंजीवाद का सबसे बड़ा भ्रम था कि परस्पर संबद्धता हमेशा बरकरार रहेगी, उसे गहरा झटका लगा है। फिर भी यह संभावना है अत्यधिक असुरक्षा और हल्की आपूर्ति शृंखला आदि बढ़ती आर्थिक निर्भरता के केंद्र में नहीं हैं जबकि वह वैश्वीकरण की बुनियाद है। अंत में अमेरिका भी समूची आपूर्ति शृंखला (उदाहरण के लिए आई फोन)  को अपने देश में नहीं ला सकता क्योंकि यह बहुत महंगा और अव्यवहार्य होगा। ज्यादा से ज्यादा कुछ हिस्सों को दूसरे देशों में स्थानांतरित किया जा सकता है और अपने देश में कुछ अतिरिक्त क्षमता बनाई जा सकती है ताकि उसे भविष्य में महामारी या आक्रमण की स्थितियों में बचाया जा सके। यह भी सही है कि पश्चिमी प्रतिक्रिया की एकपक्षीयता का निर्णय सही नहीं था। बहरहाल, इसे आर्थिक अंत:संबंधता में निहित असुरक्षा का संकेत मानना भी अदूरदर्शी हो सकता है। कुल मिलाकर देखें तो वास्तविक सह निर्भरता की स्थिति वह होती है जहां दोनों पक्षों को एक दूसरे से कुछ न कुछ चाहिए। पश्चिम को रूस का तेल और गैस चाहिए तथा वे उसे नहीं रोक सकते क्योंकि जैसा कि जर्मन चांसलर ने कहा भी ऐसा करने से पूरे यूरोप में मंदी जैसे हालात बन सकते हैं।

यह समझना आवश्यक है कि वैश्वीकरण ने रूस के खिलाफ उठाए जाने वाले आर्थिक कदमों को बहुत सीमित किया है। ऐसे में अगर कल चीन ताइवान पर इसी तरह हमला करता है तो चीन के खिलाफ उठाए जाने वाले समन्वित आर्थिक कदमों का प्रभाव और भी कम होगा। चीन के बैंकों को स्विफ्ट से बाहर करने से युआन में सौदे होने लगेंगे और चीन इसका स्वागत करेगा। रूस को भले ही तेल निर्यात के सौदे रूबल में करने की मांग पूरी करने में संघर्ष करना पड़ रहा हो क्योंकि रूबल से बहुत कम वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं लेकिन चीन के साथ ऐसी समस्या नहीं है। जो लोग इस उदाहरण के सहारे यह दलील देते हैं कि आत्मनिर्भरता की नीतियां बेहतर हैं उन्हें ऐसा दो वजहों से नहीं सोचना चाहिए। पहली बात, अगर रूस वास्तव में आत्मनिर्भर होता और उसके पास चीन और भारत को पेशकश करने के लिए कुछ नहीं होता तो आज हालात क्या होते? क्या वह पूरी तरह अलग-थलग नहीं पड़ गया होता? अगर रूस को इस बात की आश्वस्ति नहीं होती कि उसके पास बेचने के लिए तेल एवं गैस तथा हथियार हैं तो क्या वह ऐसी जंग छेड़ता जिसने उसे अलग-थलग कर दिया? रूस की अंत: निर्भरता का स्तर ही उसे बचाता है। इस युद्ध तथा उस पर आई प्रतिक्रियाओं से यह भी स्पष्ट हुआ है कि आर्थिक उपायों का तभी तक इस्तेमाल किया जाता है जब तक कि वे उन्हें प्रयोग करने वाले देशों के लिए मुश्किल न पैदा करते हों। रूसी बैंकों या कुलीनों को अलग-थलग करना पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं पर फर्क नहीं डालता। दूसरे शब्दों में कहें तो केंद्रीय बैंकों का सॉवरिन ऋण में निवेश या कुलीनों का अचल संपत्ति में निवेश परस्पर निर्भरता नहीं तैयार करता। न ही यूरोपीय या अमेरिकी कंपनियों को यह चिंता है कि रूस में उनके निवेश को नुकसान होगा। इसलिए वे अपनी सरकारों से प्रतिबंध कम करने को लेकर लॉबीइंग भी नहीं कर रहीं। अगर चीन की तरह उन्हें रूस में ज्यादा कुछ गंवाने की आशंका होती तो वहां भी आर्थिक प्रतिबंध लागू करना मुश्किल होता। दूसरे शब्दों में रूस को प्रतिबंध इसलिए थोड़ा बहुत प्रभावित कर रहे हैं क्योंकि वह पर्याप्त परस्परसंबद्ध नहीं है।

ऐसे में बीते कुछ महीनों से निकला सबक यही है कि परस्पर संबद्धता और परस्पर निर्भरता ही सामरिक स्वायत्तता बचाने में मदद करते हैं। साथ ही अगर आप अपने छोटे पड़ोसी देश पर आक्रमण नहीं करते तो आप प्रतिबंधों से भी सुरक्षित हैं।

Keyword: यूक्रेन, रूस, आक्रमण, वैश्वीकरण, वित्तीय संकट, अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन,
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