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पश्चिम बंगाल का आर्थिक पराभव लगातार जारी

अशोक के लाहिड़ी /  March 29, 2022

पश्चिम बंगाल की वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने 2022-23 का आम बजट पेश कर दिया है और यह उपयुक्त समय है जब हम राज्य की अर्थव्यवस्था की स्थिति, वित्तीय सेहत तथा सरकार के नीतिगत रुझान पर नजर डालें।

प्रति व्यक्ति आय की रैंकिंग के हिसाब से देखें तो पश्चिम बंगाल सन 1980 में 25 राज्यों के बीच सातवें स्थान से फिसलकर 2018-19 में 29 राज्यों में 21वें स्थान पर आ गया था। सन 1950 और 1960 के दशक में पश्चिम बंगाल की तुलना महाराष्ट्र और तमिलनाडु से होती थी, अब आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्य उसके समतुल्य हैं। पश्चिम बंगाल की तट रेखा लंबी है और उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमा भूटान और बांग्लादेश से मिलती है। यह राज्य देश के पूर्वोत्तर हिस्से का प्रवेश द्वार है। एक औद्योगिक और कारोबारी केंद्र के रूप में भी उसका समृद्ध इतिहास रहा है। वह कई लौह एवं इस्पात कारखानों के करीब है। जाहिर है अपना अतीत का गौरव हासिल करने के लिए राज्य को सही नीतियां बनाने की आवश्यकता है ताकि वह शेष मुल्क से अधिक तेज गति से उस दिशा में बढ़ सके।

ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल की सरकार तात्कालिक खपत की वस्तुओं के लिए खरीद और व्यय की नीति को जारी रखे हुए है। मार्च के अंत में उसका बकाया कर्ज 2021 के 4.82 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2022 में  5.29 लाख करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है। 2023 में यह और अधिक बढ़कर 5.86 लाख करोड़ रुपये हो सकता है। राज्य का कर्ज-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात भी राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम में उल्लिखित 25 फीसदी की सीमा से काफी अधिक है। पंजाब के साथ-साथ राजस्व व्यय में उसकी ब्याज भुगतान की हिस्सेदारी भी उच्चतम में है। सन 2022-23 के बजट अनुमान में अपनी 48 फीसदी प्राप्तियों के लिए पश्चिम बंगाल केंद्र सरकार से मिलने वाली कर अंतरण राशि तथा अनुदान पर निर्भर रहेगा। शेष 33 फीसदी हिस्सा उधारी से आएगा। यह अनुपात बहुत ज्यादा है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में कर अंतरण तथा अनुदान पर निर्भरता केवल 21 फीसदी है जबकि उधारी 27 फीसदी है।

व्यय के मोर्चे पर महामारी के साथ राज्य सरकार ने पूंजीगत आवंटन पर सब्सिडी और हस्तांतरण को तरजीह दी। सरकार ने इस सब्सिडी और हस्तांतरण को यह कहते हुए उचित ठहराया कि इससे मांग बढ़ी और जरूरतमंदों और वंचितों की मदद की गई। 2022-23 (बजट अनुमान) में महामारी के धीमा पडऩे के साथ व्यय के हिस्से के रूप में सब्सिडी के गति वर्ष के 2021-22 (संशोधित अनुमान) के सात फीसदी से घटकर चार फीसदी रह जाने का अनुमान है। जबकि पूंजीगत व्यय में ऐसा ही इजाफा होगा। सब्सिडी 2021-22 में 10,955 करोड़ रुपये (बजट अनुमान) से बढ़कर 2021-22 में 18,720 करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान) तक पहुंच गई थी। उसके भी 2022-23 में घटकर 10,935 करोड़ रुपये (बजट अनुमान) रहने का अनुमान है। सरकार ने रूपश्री, शिल्पसाथी और आनंदधारा आदि नामों से करीब 50 सब्सिडी और हस्तांतरण योजनाएं शुरू की हैं। यह जानना उपयोगी होगा कि सरकार कौन सी योजनाओं को बंद करना या संक्षिप्त करना चाहती है ताकि 2021-22 का अनुभव दोहराने से बचा जा सके। उस वक्त सब्सिडी आवंटन में बजट अनुमान और संशोधित अनुमान में 70 फीसदी से अधिक इजाफा हुआ था।

सरकार के पूंजीगत व्यय में अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता बढ़ाने वाले आवंटन तथा कर्ज को दोबारा चुकाना शामिल है। आर्थिक नजरिये से देखें तो पूंजीगत आवंटन एक अहम चर है। 2021-22 में बजट अनुमान तथाा संशोधित अनुमान के बीच के चरण में सब्सिडी में इजाफे के बीच पूंजीगत आवंटन में कमी आई और यह 32,774 करोड़ रुपये के बजट अनुमान से घटकर संशोधित अनुमान मेंं 19,355 करोड़ रुपये रह गया। पूंजीगत आवंटन के बजट अनुमान और संशोधित अनुमान में कटौती की बात करें तो इसमें भारी कमी आई और सामाजिक सेवाओं के लिए यह 12,818 करोड़ रुपये से कम होकर 8,245 करोड़ रुपये रह गया।  जबकि कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों तथा ग्रामीण विकास एवं विशेष क्षेत्रों के कार्यक्रम में यह 6,183 करोड़ रुपये से कम होकर 1,744 करोड़ रुपये रह गया। इतने कम पूंजीगत आवंटन के साथ इस बात में संदेह ही है कि सरकार के पास भौतिक और सामाजिक अधोसंरचना के लिए जरूरी पूंजी है भी या नहीं।

सन 2012-13 और 2018-19 के बीच 2013-14 और 2015-16 को छोड़ दिया जाए तो हर वर्ष प्रदेश का जीएसडीपी देश की तुलना मेंं धीमी गति से बढ़ा। मंत्री ने हमारा उत्साह बढ़ाने के लिए बताया कि कैसे पश्चिम बंगाल ने कोविड के बाद सुधार अर्जित किया है और मांग बढ़ाने में कामयाबी पाई। यह भी कि 2021-22 में उसका जीएसडीपी 12.8 फीसदी बढऩे की आशा है जबकि शेष देश का जीडीपी केवल 9.2 फीसदी बढ़ रहा है। यहां तीन बुनियादी प्रश्न हैं। पहला, विकसित देशों के उलट क्या पश्चिम बंगाल मांग की बाधा या आपूर्ति की दिक्कतों से जूझ रहा है? दूसरा, मांग में इजाफे का कितना हिस्सा देश के अन्य राज्यों को जाता है और कितना राज्य के लिए लाभदायक होता है? तीसरा, राज्य में आबादी केे उच्च घनत्त्व को देखते हुए जीएसडीपी तेजी से कैसे बढ़ रहा है जबकि औद्योगिक गतिविधियों में कोई बढ़ोतरी नहीं दिख रही?

जरूरतमंदों और वंचितों की मदद की बात करें तो ऐसी राहत तो बिना मांग में इजाफे के भी उचित है। समस्या तब पैदा होती है जब ऐसी राहत राजनीतिक लाभ और वोट खरीदने के लिए गैर जरूरतमंद लोगों को दी जाती है। यह काम दीर्घावधि के विकास की लागत पर तथा राज्य के सामाजिक और भौतिक ढांचे की अनदेखी करके किया जाता है। सब्सिडी और हस्तांतरण के नाकाबिल लोगों के पास जाने की समस्या पर नियंत्रण केवल तभी आ सकता है जब लाभार्थी चयन में पारदर्शिता बरती जाए।

सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचे में अहम निवेश किया जाना चाहिए ताकि औद्योगीकरण की गति बढ़ाई जा सके। केवल उसके माध्यम से ही राज्य में लोगों को सार्थक रोजगार दिलाया जा सकेगा। ध्यान रहे देश के प्रति वर्ग किलोमीटर 382 के जनसंख्या घनत्व की तुलना में पश्चिम बंगाल में प्रति वर्ग किलोमीटर 1,082 लोग रहते हैं। औद्योगीकरण के लिए किफायती बुनियादी ढांचे की जरूरत है और सन 1990 के दशक में प्रदेश की वाम मोर्चा सरकार के नई आर्थिक नीति पेश करने के बाद एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मशविरा कंपनी ने इस विषय में संकेत किया था। परंतु हस्तांतरण और सब्सिडी की नीतियों के साथ और तेज औद्योगीकरण की बुनियाद के बिना स्थायित्व नहीं हासिल होगा और अनचुकता बिलों और अधूरे वादों के साथ राजकोषीय संकट ही सामने आएगा।

(लेखक केंद्रीय वित्त मंत्रालय के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार एवं पश्चिम बंगाल में भाजपा विधायक हैं)

Keyword: पश्चिम बंगाल, आर्थिक पराभव, बकाया कर्ज, आम बजट, प्रति व्यक्ति आय,
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