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सांस्कृतिक बहिष्कार सही कदम नहीं

अतनु दास /  March 28, 2022

भारतीय उप-महाद्वीप में सांस्कृतिक बहिष्कार कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में क्रिकेट से लेकर बॉलीवुड में सांस्कृतिक बहिष्कार के कई उदाहरण मामले आए हैं। हालांकि इनमें ज्यादातर मामले विशुद्ध रूप से सांस्कृतिक नहीं हैं और उनमें काफी हद तक आर्थिक पहलू शामिल हैं। यह कई लोगों की जिंदगी पर गहरा असर छोड़ सकता है।

इस तरह का सांस्कृतिक बहिष्कार केवल दुनिया के इसी हिस्से तक सीमित नहीं है। वर्ष 2017 में अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच मिसाइल रक्षा सौदे की घोषणा के बाद चीन बौखला गया था। चीन दक्षिण कोरिया के साथ वाशिंगटन के थाड मिसाइल समझौते से खुश नहीं था। उत्तर कोरिया से किसी हमले की आशंका से बचाव के लिए दक्षिण कोरिया ने अमेरिका के साथ यह समझौता किया था। कोरियाई टीवी कार्यक्रम और पॉप संगीत चीन में युवा लोगों के बीच खासा लोकप्रिय है। मगर चीन ने मिसाइल रक्षा सौदे पर अपनी भड़ास निकालने के लिए चीन में कोरियाई टीवी कार्यक्रम और पॉप संगीत के प्रसारण पर रोक लगा दी।

यूक्रेन पर आक्रमण होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और दुनिया के अन्य देश रूस पर रोज नए प्रतिबंध लगा रहे हैं। इन प्रतिबंधों के साथ कुछ दिलचस्प किस्म के मामले भी सामने आए हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के करीबी धनाढ्य लोगों पर आर्थिक एवं अन्य प्रतिबंधों के अलावा रूस के कई लोगों के कारोबारों का बहिष्कार हो रहा है। ग्रीन डे, निक केव और बैड सीड्स, द किलर्स, लुइस टॉमिल्सन और जोर्क जैसे संगीतकारों एवं कलाकारों ने रूस में अपना कार्यक्रम आयोजित करने की योजना टाल दी है। अंतरराष्ट्रीय खेल संगठनों ने रूस और बेलारूस के खेल संगठनों पर पाबंदी लगा दी है और इन दोनों देशों में खेल-कूद आदि से संबंधित कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं। यूक्रेन के खिलाफ रूसी राष्ट्रपति के 'विशेष सैन्य अभियान' शुरू करने की एक बड़ी कीमत रूस के लोगों को चुकानी पड़ रही है।

फ्रांस के एक संगठन फेडरेशन इंटरनैशनल फेलाइन (एफआईएफई) ने कहा कि यूक्रेन में हो रही ज्यादतियों को देखकर वह मूकदर्शक बन कर नहीं रह सकता। एफआईएफई स्वयं को 'द यूनाइटेड नेशंस ऑफ कैट फेडरेशंस' मानता है। इस संगठन ने रूस की बिल्ली प्रजातियों को तीन महीनों के लिए अपने कार्यक्रम में भाग लेने से रोक दिया है। इस संगठन ने कहा है, 'रूसी नस्ल की बिल्लियों का आयात नहीं हो सकता है और न ही ये रूस के बाहर किसी एफआईएफई पेडिग्री बुक में पंजीकृत हो सकती हैं।'

प्रतिबंधों एवं बहिष्कारों का सिलसिला यही खत्म नहीं होता। यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद उत्पन्न रोष के बीच इटली के मिलान में यूनिवर्सिटी ऑफ मिलानो-बिकोका ने रूस के महान उपन्यासकार एवं सांस्कृतिक हस्ती फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की पर इतालवी लेखक पाउलो नोरी द्वारा चार दिनों का पाठ्यक्रम टाल दिया है। यूनिवर्सिटी ने कहा है कि वर्तमान हालात के बीच देश के अंतर किसी तरह के विवाद से बचने के लिए उसने यह कदम उठाया है। रूस के साहित्य का इतालवी भाषा में अनुवाद करने वाले नूरी रूस में काफी लोकप्रिय हैं। जाहिर है वह यह कार्यक्रम टलने से खुश नहीं थे। उन्होंने कहा, 'इस समय इटली में रूस के जीवित नागरिक ही दोषी नहीं समझे जा रहे हैं बल्कि जो अब नहीं रहे उनसे भी बदला लिया जा रहा है।' इटली के पूर्व प्रधानमंत्री मातियो रैंजी ने सोशल मीडिया ट्विटर पर कहा, 'आज के समय में हमें अधिक अध्ययन करने की जरूरत है। कम अध्ययन से बात नहीं बनने वाली है। हमें शिक्षकों की जरूरत है, न कि अक्षम अधिकारियों की।' इटली में यूक्रेन पर हमले के बाद रूस की काफी आलोचना हो रही है।

लेखक एलेसेंड्रो रॉबेची ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी, '150 वर्ष पूर्व दुनिया को अलविदा कह गए लेखक की निंदा करना और उन पर व्याख्यान देने से एक जीवित लेखक को रोकना बेहद शर्मनाक बात है। यूनिवर्सिटी के इतिहास में यह प्रकरण सदैव एक काला धब्बा माना जाएगा।' संभव है कि अगली बार पाउलो नोरी दोस्तोयेव्स्की की किताब 'द ईडियट' से उन्हें उद्धृत करते हुए दोहराएंगे, 'आप सतर्क और गंभीर होने के बावजूद भी बेवकूफ बन सकते हैं। इसे संयोग कही कह लें कि दोस्तोयेेव्स्की को स्वयं पाबंदी से गुजरना पड़ा था! वर्ष 1849 में 27 वर्ष की उम्र में दोस्तोयेेव्स्की को जार के शासन के दौरान प्रतिबंधित किताबें पढऩे और अतिवादी शिक्षित परिचर्चा समूह' के साथ गतिविधियां चलाने के लिए मृत्यु दंड दिया गया था। हालांकि अंतिम क्षणों में उनकी सजा पर रोक लगा दी गई मगर उन्हें साइबेरिया के श्रम समूह में चार वर्षों के लिए काम करने के लिए भेज दिया गया। उसके बाद कई वर्षों तक उन्हें जार की सशस्त्र सेना में अनिवार्य सैन्य सेवा करनी पड़ी। करीब 40 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना लेखन कार्य दोबारा शुरू किया।

रूसी लोगों और पुतिन का विरोध एवं बहिष्कार केवल यूरोप में ही नहीं हो रहा है। अमेरिका भी इसमें पीछे नहीं है। रू स के महान अंतरिक्ष यात्री यूरी गागरिन भी इस बहिष्कार से बच नहीं पाए हैं। उन्होंने 1961 में अंतरिक्ष में सबसे पहले कदम रखने वाले पहले मानव के रूप में उन्होंने इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया था। उनका निधन 54 वर्ष पूर्व हो चुका है। अंतरिक्ष अनुसंधान में नए आयाम को याद करने के लिए अमेरिकी गैर-लाभकारी संस्था स्पेस फाउंडेशन वर्ष 2000 से धन जुटाने का कार्यक्रम चला रही है। मौजूदा घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए इस कार्यक्रम का नाम इसके स्पेस सिंपोसियम सम्मेलन में 'यूरीज नाइट' से बदलकर 'ए सेलिब्रेशन ऑफ स्पेस: डिस्कवर व्हाट्स नेक्स्ट' रखा गया है। क्या यह इतिहास पर पाबंदी लगाने जैसा नहीं है? क्या केवल पुतिन की वजह से हम उन महान बातों को याद नहीं रखना चाहते हैं जो रूस की कई विभूतियों से जुड़ी हैं।

किसी न किसी रूप में सांस्कृतिक बहिष्कार जारी रहेगा मगर यह इतिहास में एक अच्छी पहल के रूप में दर्ज नहीं हो पाएगा। अब सवाल है कि रूस के किन लोगों पर पाबंदी लगने की बारी है? क्या इस कड़ी में अब चैकोव्स्की, आंतोन चेखव या लियो तोलस्तोय का नाम होगा? एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब अगली बार अमेरिका या उत्तर अटलांटिक सैन्य संगठन (नाटो) वियतनाम या इराक जैसे देशों पर हमला करेगा तो क्या रूस एवं उसके सहयोगी देश विक्टरह्यूगो या होनरे डी बल्जाक पर प्रतिबंध लगाकर बदला लेंगे या लिओनार्दो दा विंची या माइकल एंजेलो की चर्चा कला कक्षाओं से खत्म कर दी जाएगी? या फिर अंतरिक्ष कार्यक्रम से नील आम्र्सस्ट्रांग का नाम हटा दिया जाएगा। उम्मीद तो यही की जाएगी कि वे ऐसा नहीं करेंगे।

(लेखक भारतीय सांख्यिकीय संस्थान, कोलकाता में प्राध्यापक हैं)

Keyword: सांस्कृतिक बहिष्कार, क्रिकेट, बॉलीवुड, अमेरिका, यूक्रेन, प्रतिबंध, व्लादीमिर पुतिन,
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