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किसी भी देश के लिए अपने हित सर्वोपरि

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  March 27, 2022

बात की शुरुआत एक उलझाऊ प्रश्न से करते हैं। हां, जवाब तलाशने के लिए गूगल मत कीजिएगा। ऑपरेशन सर्चलाइट क्या था, उसे कब और क्यों अंजाम दिया गया? जो लोग इसका जवाब जानते हैं वे यह समझ जाएंगे कि मैं रूस पर यूक्रेन के आक्रमण और उस पर भारत की स्थिति के बीच इसका जिक्र क्यों कर रहा हूं।

संयुक्त राष्ट्र में मतदान में भारत की बार-बार अनुपस्थिति (बांग्लादेश ने भी रूस के खिलाफ मतदान कर दिया) के बाद पश्चिमी देशों ने आलोचना की है और अनैतिकता का ताना दिया है। अरे भारत! आप तो विश्वगुरु होने का दम भरते हैं। नहीं? एक सैन्य महाशक्ति द्वारा एक छोटे देश को नष्ट करने पर ऐसा पाखंड? आप कब तक खामोश रहेंगे? आपकी नैतिकता आखिर कहां चली गई? इन तानों का जवाब आसान है। विश्वगुरु होना या न होना एक वैचारिक प्रस्ताव है और ज्यादातर भारतीय इसके लिए वोट नहीं देते। यह एक ऐसा काम है जो विकास के दौर में है। इसके हिमायतियों यानी भाजपा/ आरएसएस के लिए यह विचार करने का वक्त तब नहीं है जब चीन की सेना लद्दाख तथा अन्य स्थानों पर निगाहें गड़ाए है। दूसरे सवाल के लिए हम समीकरण को पलटेंगे। भारत के लिए तब तक खामोश रहना समझदारी थी जब तक कि वह बोल सकता है। नैतिकता की बात करें तो हमें इस बहस को विस्तार देने और ऑपरेशन सर्चलाइट का जिक्र करने की जरूरत है।

जब मैं यह आलेख लिख रहा था संयोगवश उसी दिन उस घटना की 51वीं वर्षगांठ थी जब पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान पर भीषण हमला किया था। उसने अगले 250 दिनों तक जो हमला किया उसे दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया के सबसे बड़े सामूहिक अत्याचारों में गिना जाता है। इसकी तुलना केवल खमेर रूज से ही की जा सकती है। उस दौरान लाखों लोग मारे गए, अपंग हुए, बलात्कार हुए और एक करोड़ से अधिक लोगों को भारत में शरण लेनी पड़ी। यह संख्या पड़ोसी देशों में शरण लेने वाले यूक्रेनी नागरिकों से तीन गुना ज्यादा है।

जाहिर है बहुत बड़ी तादाद में लोग इसलिए दुखी हैं कि यह यूरोप के बीचोबीच हो रहा है, न कि अफ्रीका, एशिया या लैटिन अमेरिका में। यह एक देश की ओर से दूसरे पर थोपी गई जंग है। पूर्वी पाकिस्तान में सन 1971 के उन आठ महीनों के दौरान आम जनता पर एक ऐसी सेना ने कहर ढाया जिस पर दरअसल उसकी रक्षा का दायित्व था। आज बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय पाकिस्तान से अधिक है लेकिन फिर भी वह यूक्रेन की प्रति व्यक्ति आय से करीब आधी ही है। पाकिस्तानी सेना ने हत्या, बलात्कार और लूटपाट के उस अभियान को ऑपरेशन सर्च लाइट का नाम दिया था।

चूंकि यूक्रेन मसले पर भारत की खामोशी पर नैतिकता के सवाल किए जा रहे हैं इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि उस जनसंहार के दौरान पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका का मतदान का रिकॉर्ड कैसा रहा है।

दरअसल कोई भी देश चाहे वह अमीर हो या गरीब, मजबूत हो या कमजोर, अपनी विदेश तथा सामरिक नीति नैतिकता के आधार पर तय नहीं करता। स्विटजरलैंड का उदाहरण लें वह तटस्थ है लेकिन दुनिया भर के चोरों, ठगों, हत्यारों और तानाशाहों की अवैध कमाई संग्रहीत करने का ठेका मानो उसे खुद ईश्वर ने दिया है। अत्यधिक उच्च नैतिकता वाला स्वीडन दुनिया भर में कार्यकर्ताओं और हर प्रकार के अधिकारों का समर्थक है लेकिन उसने गरीब भारत में अपनी तोप (बोफोर्स) बेचने के लिए रिश्वत दी और 35 वर्षों में किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया। इसी तरह अफगानिस्तान पर रूसी आक्रमण के समय पवित्रता का ढोंग रचने वाला अमेरिका आगे चलकर खुद उस पर काबिज रहा और उसे खंडहर कर दिया। अंतत: वहां तालिबान का कब्जा हुआ। रूस ने कम से कम उसे व्यवस्थित ढंग से छोड़ा था और देश में एक सरकार थी। या केवल यूक्रेन की ही चिंता है? वह भी सद्दाम हुसैन के पास परमाणु हथियार होने का झूठा दावा करके इराक को बरबाद कर देने के बाद?

चीन की बात करें तो भारत, जो चीन पीडि़त समाज का प्रमुख हिस्सा है, के नागरिक के रूप में मुझे यह कहने का पूरा अधिकार है कि भाड़ में जाइए। ब्रिटेन की बात करें तो वह कुछ विवादित द्वीपों के लिए अर्जेन्टीना से लडऩे फॉकलैंड तक पहुंच गया और प्रतिरोध के अक्षम पुराने क्रूजर जनरल बेलग्रानो को डुबाने में भी नहीं हिचका। हमने इन देशों का आकलन कभी नैतिकता के पैमाने पर नहीं किया। किसी देश से यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वे अपनी रणनीतियां नैतिकता के आधार पर तय करेंगे। देश केवल अपने हित में काम करते हैं। बाकी चीजें बाद में आती हैं। इस्लामिक देश दूसरे विश्वयुद्ध के उनसे संबंधित सबसे पुराने मसले यानी फिलीस्तीन पर जो रुख रखते हैं वह हमें कुछ सबक सिखाता है। खाड़ी के ज्यादातर ताकतवर देशों मसलन सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, सूडान और यहां तक कि कतर ने भी फिलीस्तीन के मसले को त्याग दिया है। अति इस्लामिक बनने वाले एर्दोआन शासित तुर्की ने इजरायल के राष्ट्रपति का ऐसा स्वागत किया जैसा प्राय: जिगरी दोस्त या मजबूत साझेदार का किया जाता है। जबकि ईरान ने फिलीस्तीन के लिए छद्म युद्ध छेड़ रखा है। वह ऐसा सीरिया और लेबनान की कीमत पर कर रहा है। ईरान को इस बात का फायदा है कि इजरायल के मन में उसके परमाणु हथियारों और मिसाइलों को लेकर भय है।

चीन के विदेश मंत्री वांग यी इस्लामाबाद में ओआईसी शिखर बैठक में मुख्य अतिथि हो सकते हैं और कश्मीर मसले पर भारत को खरी-खोटी सुना सकते हैं। इस बीच उनकी सरकार उइगर मुस्लिमों का उत्पीडऩ जारी रखे है और ओआईसी के प्रमुख देश खासकर पाकिस्तान जिसके प्रधानमंत्री (जब तक वे पद पर हैं) संयुक्त राष्ट्र द्वारा एक दिन को इस्लामोफोबिया के खिलाफ वार्षिक दिन घोषित करने का श्रेय लेते हैं लेकिन उइगरों के उत्पीडऩ पर कुछ नहीं कहते। वे स्वार्थी हैं लेकिन अनैतिक नहीं क्योंकि सभी अपने राष्ट्रीय हित में काम कर रहे हैं।

उइगर मसले पर चीन से सवाल करने के लिए पाकिस्तान को अपने राष्ट्रीय हित नये सिरे से तय करने होंगे जो कश्मीर और भारत से दुश्मनी से अलग हों। चीन शिनच्यांग को लेकर जितना असुरक्षित होगा अपने सबसे बड़े इस्लामिक पड़ोसी पाकिस्तान पर उसका नियंत्रण उतना ही कसेगा। राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर हैं। भारत लंबे समय तक नैतिकता का बोझ सहन करता रहा है। सन 1991 तक भारतीय विदेश नीति गुट निरपेक्षता समर्थक, सोवियत समर्थक, फिलीस्तीन समर्थक और नस्लभेद विरोध की थी। एक लंबा दौर ऐसा भी रहा जब वह पूरी तरह भारत समर्थक भी नहीं थी। मैं सन 1991 को चुनूंगा क्योंकि तब पीवी नरसिंह राव ने पहली बार शीतयुद्ध के दौर की सोवियत समर्थक गुटनिरपेक्षता को त्यागा और इजरायल से पूर्ण कूटनयिक संबंध कायम किए।

उसके पहले दशकों तक भारत ने फिलीस्तीन के लिए इजरायल और पश्चिम के खिलाफ आवाज उठाई, मतदान किया। अब आप यह देखिए कि भारत में आतंकी हमलों के समय अरब देशों और ओआईसी का रुख क्या था। सन 1971 में जॉर्डन द्वारा पाकिस्तान को एफ-104 स्टारफाइटर विमान सौंपने की घटना तो सबको पता है। आज अगर उन्हीं अरब देशों ने भारत के मामले में अपना रुख बदल लिया है तो इसकी वजह उनका अनैतिक या गैर इस्लामिक होना नहीं है। यह तर्क मोदी सरकार के पक्ष में या उसके खिलाफ नहीं है। इस समय कोई भी भारतीय सरकार ऐसा ही करती। यहां बात केवल रूसी हथियारों पर निर्भरता की नहीं बल्कि भरोसे की भी है।

पोकरण में सन 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत को करीब तीन दशक तक कई गंभीर प्रतिबंध झेलने पड़े। इस बीच अमेरिका चीन के समर्थन से चल रहे पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम की अनदेखी करके उसे एफ-16 विमान तथा और बहुत कुछ देता रहा। ऐसा इसलिए क्योंकि उसे अफगानिस्तान में जिहाद को जीतना था। क्या भारत बिना परमाणु हथियार के अपना बचाव कर सकता था जब पड़ोस में दो देश मान लें 'बड़ा' पुतिन और 'छोटा' पुतिन उसके लिए खतरा बने हों। लेकिन जब भारत ने प्रतिरोध किया तो प्रतिबंध झेलने पड़े। ये कुछ वजह हैं जिनके चलते हम भारत की यूक्रेन नीति को नैतिकता के खांचे पर नहीं आंक सकते। यदि आप ऐसा करते हैं तो आपको अपने भीतर भी झांकना होगा।

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