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विनिवेश में सहायक

संपादकीय /  March 27, 2022

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने एक नया मशविरा पत्र (सरकारी कंपनियों में विनिवेश के मामलों में प्रस्तावित मूल्य निर्धारण की समीक्षा) पेश किया है जो सरकारी उपक्रमों के मूल्य की खुली पेशकश में बदलाव का प्रस्ताव रखता है। इस बदलाव से रणनीतिक निवेशकों के लिए सरकारी उपक्रमों का अधिग्रहण अधिक आकर्षक हो सकता है लेकिन इससे अल्पांश हिस्सेदारों के संभावित प्रतिफल में कमी भी आ सकती है। सरकारी कंपनियों में विनिवेश की प्रक्रिया पर विचार करें तो इस प्रस्ताव के पीछे की दलील समझ में आती है। सेबी सब्सटेंशियल एक्विीजिशन ऑफ शेयर्स ऐंड टेकओवर्स रेग्युलेशन, 2011 के नियमों के मुताबिक अधिग्रहण करने वाले को उस स्थिति मेंं 26 फीसदी अतिरिक्त हिस्सेदारी की खुली पेशकश करनी होगी जब वह 25 फीसदी स्वामित्व की सीमा पार कर चुका हो।

खुली पेशकश के लिए मूल्य का फॉर्मूला कई मानकों पर आधारित है। एक सूचीबद्ध कंपनी के लिए इसका निम्र मानक के तहत सर्वाधिक कीमत होना आवश्यक है: अधिग्रहण के लिए तय प्रति शेयर मूल्य, सार्वजनिक घोषणा से पहले के 52 सप्ताह में अधिग्रहण करने वाले द्वारा (यदि) चुकाया गया औसत वॉल्यूम मूल्य, अधिग्रहण करने वाले द्वारा सार्वजनिक घोषणा के पूर्व के 26 सप्ताह में चुकाया जा सकने लायक उच्चतम मूल्य, सार्वजनिक घोषणा के पहले के 50 कारोबारी दिवस में स्टॉक एक्सचेंज पर वॉल्यूम आधारित औसत बाजार मूल्य। यदि लक्षित अधिग्रहण में एक अन्य सूचीबद्ध कंपनी का अप्रत्यक्ष नियंत्रण हासिल करने की स्थिति में भी ऐसा ही मूल्य फॉर्मूला लागू होता है। यह मूल्य मौजूदा अहम अंशधारक को दिए जाने वाले मूल्य से कम नहीं होना चाहिए। 26 सप्ताह/52 सप्ताह का मानक उन स्थितियों से निपटने के लिए है जहां अधिग्रहण करने वाले ने बाजार खरीद के जरिये हिस्सेदारी मजबूत की हो।

नियामक सरकारी उपक्रमों के लिए 60 दिन का मानक समाप्त करना चाहती है। यहां बात यह है कि निजी अधिग्रहण के उलट सामरिक बिक्री या विनिवेश के पहले एक विस्तारित अवधि तक सार्वजनिक सूचनाएं जारी की जाती हैं। एक निजी कंपनी के अधिग्रहण में सार्वजनिक सूचना तब आती है जब कोई बाध्यकारी समझौता हो। इसलिए पूर्व की अवधि में श्ेायर कीमतों पर खास असर नहीं होता। किसी सरकारी कंपनी के विनिवेश में विनिवेश का इरादा अक्सर बजट के दौरान सार्वजनिक रूप से जताया जाता है या फिर इसे दूसरे आधिकारिक मंचों से सामने लाया जाता है। अधिग्रहण करने वाले को बोली लगाने वालों में से चुना जाता है। इस प्रक्रिया में कई महीने लगते हैं। ऐसे में सार्वजनिक सूचनाओं के सामने आने से प्राय: सौदे की घोषणा के पहले ही बाजार मूल्य में काफी इजाफा हो जाता है। इस संदर्भ में नियामक ने सही कहा कि संभावित खरीद को बदलती हुई पेशकश मूल्य के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि विनिवेश की घोषणा और आगे विभिन्न चरणों में बाजार मूल्य बढऩे की संभावना रहती है।

यदि 60 दिन का मानक हटा दिया जाता है तो अल्पांश हिस्सेदारोंं के लिए खुली पेशकश मूल्य सरकार को की गई पेशकश के अनुरूप ही रहेगा या थोड़ा अधिक रह सकता है। यदि संबंधित सरकारी कंपनी में परस्पर अंशधारिता है जिससे अन्य सूचीबद्ध कंपनियों में अप्रत्यक्ष नियंत्रण की स्थिति बन सकती है तो 60 दिन वाला मानक भी आकलन में उसी तरह अलग किया जा सकेगा। खुली पेशकश मूल्य फॉर्मूला में ऐसे बदलाव ऐसे रणनीतिक सौदों को अधिक बेहतर बना सकते हैं और ये अधिग्रहण करने वाले के लिए ज्यादा आकर्षक हो जाएंगे। इससे शेयर कीमतों में अस्थिरता कम होगी और सरकार को आसानी से उचित मूल्यांकन पर पहुंचने में मदद मिलेगी। सरकार को विनिवेश कार्यक्रम को आक्रामक ढंग से अंजाम देना होगा ताकि आर्थिक सुधार की मदद की जा सके।

Keyword: विनिवेश, सेबी, नया मशविरा पत्र, मूल्य निर्धारण, समीक्षा, हिस्सेदारी, अधिग्रहण,
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