बिजनेस स्टैंडर्ड - रूस-चीन संबंध और यूक्रेन युद्ध का असर
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रूस-चीन संबंध और यूक्रेन युद्ध का असर

श्याम सरन /  March 21, 2022

यूक्रेन में छिड़ी जंग की परिणति चाहे जो हो लेकिन रूस पहले ही एक पराजित देश बन चुका है। उसका शत्रु यूक्रेन नहीं बल्कि पश्चिमी देश हैं जिनका नेतृत्व अमेरिका के पास है। रूस को लग रहा था कि यूक्रेन पर जीत उसे एक नयी विश्व व्यवस्था में प्रवेश करने में मदद करेगी जहां रूस एक अहम हिस्सेदार होगा। उसका मानना था कि उसके सुरक्षा हितों को स्वीकार किया जाएगा और उनका मान रखा जाएगा। इस युद्ध का लक्ष्य यूक्रेन के मलबे के ढेर में बदल जाने पर भी नहीं निकलेगा। रूस यह समझने मेंं नाकाम रहा कि हम एक ऐसे विश्व में रहते हैं जो आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है और जहां आपसी संबद्धता के विविध आयामों के बीच आर्थिक व्यवहार्यता इस बात पर निर्भर करती है कि आपसी जुड़ाव तक कितनी पहुंच और भागीदारी मिल पाती है। यह संभव है कि एक सुरक्षित और तयशुदा दायरे मेंं रहा जाए लेकिन ऐसा बहुत सीमित ढंग से ही किया जा सकता है। विभिन्न देशों को पहले भी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है लेकिन ऐसे व्यापक और एकतरफा प्रतिबंध कभी किसी देश पर नहीं लगे जैसे कि रूस पर लगाये गए हैं। रूस वैश्विक नेटवर्क से पूरी तरह कट गया है और यह समझ पाना मुश्किल है कि ये कटे हुए संपर्क दोबारा कैसे कायम होंगे। यूक्रेन अगर आत्मसमर्पण करके रूस की सभी मांगें मान लेता है तब भी यह सवाल बना रहेगा। अमेरिका और यूरोप की बात करें तो पूरी संभावना है कि रूस के खिलाफ उनके प्रतिबंध जारी रहेंगे। रूस और यूरोप के बीच की खासकर जर्मनी के साथ उसकी आर्थिक परस्पर निर्भरता अतीत की बात हो चुकी है। ऊर्जा और ईंधन आपूर्तिकर्ता के रूप में रूस की भूमिका दोबारा पहले जैसी होती नहीं दिखती। युद्ध लगभग हर देश को प्रभावित कर रहा है लेकिन रूस की दिक्कतें सबसे अधिक हैं।  

वैश्विक नेटवर्क में शामिल होने का एक फायदा तो यह है कि इससे जहां व्यवस्था को लगने वाले झटके जल्दी सहन हो जाते हैं, वहीं समायोजन भी अपेक्षाकृत तेज गति से होता है। तकनीकी बढ़त इसमें मदद करती है। महामारी के दौरान हुई जूम क्रांति इसका उदाहरण है। यानी नेटवर्क से संबद्ध देश बदलाव को दूसरे देशों की तुलना में जल्दी अपना सकते हैं। बाधित आपूर्ति शृंखलाओं की जगह लेने के लिए नई शृंखलाएं तैयार हो जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में रूस की क्षमता कमजोर होगी। पश्चिम और रूस के बीच की दूरी बढ़ कर गहरी खाई में बदल गई है और निकट भविष्य में हालात सुधरते नहीं दिखते। रूस के यूरोपीय खेमे में शामिल होने के बजाय इस बात की संभावना अधिक है कि वह उसकी सीमा पर एक कमजोर मूकदर्शक बनकर रह जाए।

अमेरिका को कुछ ज्यादा कीमत नहीं चुकानी पड़ी और वह बेहतर स्थिति में नजर आ रहा है। उसके यूरोपीय भागीदारों को जरूर बड़ा बलिदान करना पड़ा। अमेरिका चीन का सामना ज्यादा आत्मविश्वास से करता है जबकि चीन अपेक्षाकृत रक्षात्मक नजर आता है। अमेरिका की बढ़त उन वक्तव्यों में भी महसूस की जा सकती है जो अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलीवन और चीन के पोलित ब्यूरो सदस्य तथा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के विदेश मामलों के आयोग के अध्यक्ष यांग जिएची के बीच रोम में हुई अहम बैठक के पहले जारी किए गए। बैठक से पहले जानबूझकर सीमित जानकारी बाहर लाई गई जिससे संकेत मिला कि रूस ने चीन से कहा कि वह युद्ध में हथियारों और आर्थिक मदद के साथ उसकी सहायता करे। चीन ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। हालांकि इस खुलासे के बाद चीन के लिए रूस की मदद करना और मुश्किल हो गया है, भले ही उसकी ऐसी इच्छा रही हो। इसके बाद सुलीवन ने चीन को चेतावनी देते हुए एक समाचार चैनल से कहा, 'हम चीन से सीधे बात कर रहे हैं कि प्रतिबंधों को धता बताने की कोशिश की कीमत चुकानी होगी। हम दुनिया में कहीं भी किसी भी देश को रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को धता बताने नहीं देंगे।' चीन को धमकी एकदम स्पष्ट है: अगर उसने रूस को किसी तरह की मदद का प्रयास किया तो उसे भी वैसे ही प्रतिबंधों का सामना करना होगा।

हालांकि लगता नहीं कि चीन के खिलाफ वैसे कदम उठाए जाएंगे जैसे रूस के खिलाफ उठाए गए। चीन न केवल दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है बल्कि यह बड़ा कारोबारी देश भी है। दुनिया भर के कई देश इसके प्रमुख कारोबारी साझेदार हैं। इन देशों को चीन के साथ कारोबार सीमित करने के लिए मनाना मुश्किल है।

अतीत में चीन ने रूस और ईरान पर लगे प्रतिबंधों को खामोशी से देखा जहां उसके व्यापक आर्थिक और वाणिज्यिक हित दांव पर थे। वह एक बार फिर ऐसा कर सकता है और इसके साथ ही अमेरिका पर लगातार हमले जारी रख सकता है।

चीन वैश्विक नेटवर्क में बहुत गहरायी से जुड़ा हुआ है और संभव है कि वह जोखिमों से बचाव कम करने के लिए समय लेने का प्रयास करे। उसकी समृद्धि अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण की देन है। ऐसे में वह चीन के नेतृत्व वाला व्यापारिक, वित्तीय और तकनीकी विकल्प तैयार करने के प्रयास दोगुने कर देगा। लेकिन इन सब बातों में समय लगेगा। अमेरिका और चीन के रिश्ते और अधिक विवादित होते जाएंगे क्योंकि अमेरिका अपनी बढ़त बरकरार रखने की कोशिश करेगा।

बीसवीं पार्टी कांग्रेस महज कुछ महीने बाद होने वाली है और ऐसे में चीन शायद कोई अनचाहा जोखिम उठाना नहीं चाहेगा। खासतौर पर यह देखते हुए कि चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के कार्यकाल को पांच वर्ष का और विस्तार दिया जाना है। ऐसे में कह सकते हैं कि चीन का सुर जरूर रूस के समर्थन का रहेगा लेकिन शायद वह भौतिक रूप से उसकी मदद न करे। वह रूस के खिलाफ लगे प्रतिबंधों पर खामोशी से नजर रखेगा। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में चीन के लिए सबक यह है कि उसे किसी भी हालत में उन परिस्थितियों में नहीं पडऩा है जिनका सामना आज रूस को करना पड़ रहा है।

यह आशा भी की जानी चाहिए कि भारत पर भी पश्चिमी दबाव बढ़ेगा कि वह भी अनुसरण करे। भारत ने रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली खरीदी है। इसके लिए उस पर लगने वाले प्रतिबंधों में रियायत की संभावना कम होगी। जाहिर है हमारे सामने अप्रिय विकल्प होंगे।

(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं)

Keyword: रूस-चीन संबंध, यूक्रेन युद्ध, जंग, अमेरिका, प्रतिबंध, वैश्विक नेटवर्क, आत्मसमर्पण,
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