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हिमाचल और गुजरात में सत्ता विरोधी रुझान का सामना कर रही भाजपा

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  March 15, 2022

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की चिंता इस वक्त जरूर बढ़ रही होगी। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को राज्य में कुछ महीने पहले (अक्टूबर 2021 में) मंडी संसदीय सीट, अर्की, फतेहपुर और जुब्बल-कोटखाई विधानसभा क्षेत्रों में हुए उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

भाजपा ने आंतरिक जांच के लिए एक टीम नियुक्त की जिसका निष्कर्ष यह था कि पार्टी (मुख्यमंत्री) मंडी के मिजाज को पढऩे और छह बार के राज्य के मुख्यमंत्री और दिवंगत कांग्रेस नेता वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह के लिए जनता के समर्थन को समझने में विफल रही।

उपचुनाव के नतीजे निश्चित रूप से चौंकाने वाले थे क्योंकि ठाकुर न केवल मंडी जिले से ताल्लुक रखते हैं बल्कि मंडी संसदीय क्षेत्र से भी भाजपा के पहले मुख्यमंत्री थे, जहां मंडी, कुल्लू, लाहौल-स्पीति, किन्नौर और भरमौर (चंबा) जिलों में 17 विधानसभा सीट हैं। अर्की और फतेहपुर पर कांग्रेस का कब्जा था जबकि भाजपा के पास जुब्बल-कोटखाई और लोकसभा सीट थी। जुब्बल कोटखाई में पड़े मतों में से केवल चार प्रतिशत वोट से ही भाजपा उम्मीदवार को जीत मिली।

हार की कोई जिम्मेदारी लेने से इनकार करते हुए ठाकुर ने महंगाई और कीमतों में बढ़ोतरी को इस झटके के लिए जिम्मेदार ठहराया। एक तरह से यह केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की सीधी आलोचना थी जो नरेंद्र तोमर के साथ-साथ पर्यवेक्षक की भूमिका में भी रहीं और उन्होंने इस पद के लिए ठाकुर के नाम की सिफारिश भी की थी।

पेचीदा मामला यह है कि ठाकुर मुख्यमंत्री पद के लिए पहली पसंद नहीं थे। भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने 2017 के चुनावों से ठीक नौ दिन पहले पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पी के धूमल के नाम की घोषणा की थी। लेकिन धूमल चुनाव हार गए और इसका फायदा ठाकुर को मिला जिनके बारे में कई लोगों की निजी राय यह है कि उन्हें अपनी योग्यता से ज्यादा मिल गया।

1990 के बाद से ही इस राज्य में कांग्रेस और भाजपा के बीच द्विध्रुवीय मुकाबला देखने को मिलता रहा है। लेकिन आम आदमी पार्टी (आप) ने भी घोषणा की है कि वह इस बार हिमाचल प्रदेश विधानसभा की सभी 68 सीट पर चुनाव लड़ेगी। आम आदमी पार्टी के सबसे बड़े नेताओं में से एक और राज्य के पूर्व डीजीपी आई डी भंडारी ने कहा, 'भाजपा और कांग्रेस को लेकर लोगों में कोई उत्साह नहीं दिखता है और यही कारण है कि जनता हर पांच साल में सरकार बदलती है। लेकिन हम अपनी सदस्यता बढ़ाने के लिए दोनों दलों की ओर देख रहे हैं।'

उपचुनाव के नतीजों के बाद हिमाचल में कांग्रेस उत्साहित है लेकिन इसमें आंतरिक गुटबाजी ज्यादा है। सुखविंदर सिंह सुक्खू कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में से एक हैं लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह जिनके निधन के बाद मंडी उपचुनाव हुए उनके साथ उनकी नहीं बनती थी। शिमला के एक राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, 'राज्य में कांग्रेस की मुख्य समस्या हमेशा से गुटबाजी रही है। पार्टी के लिए विधानसभा चुनाव में किसी भी नेता को पार्टी का नेतृत्व करने के लिए पेश करना मुश्किल होगा। सुक्खू एक बड़े नेता हैं लेकिन पार्टी में आशा कुमारी और कुलदीप राठौर जैसे अन्य बड़े नेता भी हैं। ऐसे में सामूहिक नेतृत्व ही पार्टी के लिए सुरक्षित तरीका है।' हालांकि इसके खत्म होने की संभावना नहीं है।

गुजरात का मामला भी अलग है। 2017 के बाद इस राज्य में कांग्रेस की संभावनाएं तेजी से कम हो गई हैं। 2017 में पार्टी का प्रदर्शन उतना बुरा नहीं था जितना कि डर था। भाजपा ने विधानसभा की 182 सीट में से 99 जीतीं। कांग्रेस को 77 सीट पर जीत मिली। लेकिन वह सरकार नहीं बना पाई। बाद में कई विधायक भाजपा में शामिल हो गए। पार्टी हाल ही में हुए पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में बुरी तरह हार गई थी। पार्टी को बेहतर स्थिति में लाने के लिए कांग्रेस ने तेजतर्रार पाटीदार नेता हार्दिक पटेल को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया।

पटेल ने जुलाई 2015 में पाटीदारों के आरक्षण के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया था। इस आंदोलन के दौरान 14 पाटीदार युवाओं की मौत हो गई थी और उससे जुड़ी हिंसा में इस समुदाय के नेताओं के खिलाफ  438 मामले दर्ज किए गए थे। हार्दिक पटेल ने राज्य सरकार को मामलों को वापस लेने या फिर आंदोलन का सामना करने के लिए 23 मार्च तक का समय दिया है। उनका तर्क यह है कि राज्य सरकार और केंद्र ने गरीबों और पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने और आर्थिक रूप से पिछड़ी सवर्ण जातियों के लिए 10 प्रतिशत कोटा देने के लिए सहमति जताई थी। ऐसे में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की स्थिति असहज हो गई है क्योंकि अगर वह मामलों को वापस ले लेते हैं तो इसका मतलब यह हिंसा को स्वीकार करने के समान है और अगर वह इससे इनकार करते हैं तो एक और आंदोलन देखा जा सकता है।

भाजपा ने कुछ महीने पहले ही विजय रूपाणी की जगह लगभग कम मशहूर भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाया। पटेल पूर्व मुख्यमंत्री और पाटीदार समुदाय से ताल्लुक रखने वाली आनंदीबेन पटेल के दबाव के कारण शीर्ष पद पर बने हुए हैं। लेकिन एक और चुनौती है आप। हालांकि गुजरात के कांग्रेस प्रभारी रघु शर्मा आप को चुनौती के रूप में नहीं देखते हैं। लेकिन वह मानते हैं कि कांग्रेस की एक समस्या है। उन्होंने कहा, 'हमने बूथ पर संगठन को कभी मजबूत नहीं किया। हमने एक माहौल बनाया। ऐसा लगने लगा जैसे सरकार बदल जाएगी। लेकिन भाजपा ने हमसे ज्यादा बूथ पर ध्यान केंद्रित किया, यह इसकी जीत की एक प्रमुख वजह थी।' पंजाब में कई दशकों में पहली बार इस चुनाव में कई दलों के बीच मुकाबला देखने को मिला। लंबे समय बाद गुजरात में भी गंभीर रूप से बहु-आयामी मुकाबला देखने को मिलेगा क्योंकि अब आप भी मैदान में उतर चुकी है।

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