बिजनेस स्टैंडर्ड - सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी का बोझ
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सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी का बोझ

ए के भट्टाचार्य /  March 09, 2022

मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में केंद्रीय सरकारी उपक्रमों के साथ किस तरह का व्यवहार किया? क्या इन उपक्रमों के साथ उसकी संबद्धता पहले कार्यकाल या पिछली सरकारों के कार्यकाल की तुलना में अलग रही? इस संबद्धता को आंकने का एक तरीका है कि यह देखा जाए कि केंद्र सरकार ने सरकारी उपक्रमों के इक्विटी आधार में किस प्रकार योगदान किया है या उनमें अपनी हिस्सेदारी किस तरह बेची। अतीत के साथ तुलना काफी जानकारीपरक हो सकती है।  

उदाहरण के लिए मनमोहन सिंह सरकार ने 2009-10 और 2013-14 के बीच सरकारी उपक्रमों में करीब 2.34 लाख करोड़ रुपये की इक्विटी डाली। यह मनमोहन सरकार के पहले कार्यकाल यानी 2004-05 से 2008-09 के दौरान डाली गई 80,000 करोड़ रुपये की राशि से करीब तीन गुनी थी। सरकारी उपक्रमों के विनिवेश का किस्सा भी अलग नहीं था। यह याद रहे कि वह सरकार निजीकरण को लेकर शंकालु थी और सरकारी उपक्रमों में विनिवेश को लेकर वह आत्मविश्वास से भरी नहीं थी। इसके बावजूद मनमोहन सिंह सरकार की विनिवेश प्राप्तियां 2004-09 के 46,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2009-14 में 1.2 लाख करोड़ रुपये हो गईं।

इसके उलट मोदी सरकार के पहले कार्यकाल यानी 2014-19 में विनिवेश पर ज्यादा ध्यान दिया गया, हालांकि निजीकरण को लेकर सतर्कता बरती गई और उस मोर्चे पर सकारात्मक नतीजे हासिल नहीं हुए। एयर इंडिया के निजीकरण की शुरुआत हुई लेकिन इरादा त्यागना पड़ा और आईडीबीआई बैंक के निजीकरण का प्रस्ताव रखा गया लेकिन लक्ष्य हासिल नहीं हुआ। मोदी सरकार के पास निजीकरण के नाम पर कुछ नहीं था लेकिन पहले कार्यकाल में उसने विनिवेश से 3.2 लाख करोड़ रुपये हासिल किए।

पहले कार्यकाल में मोदी सरकार ने विनिवेश पर जोर दिया लेकिन सरकारी उपक्रमों में इक्विटी में और इजाफा हुआ। मनमोहन सिंह के 2009-14 के कार्यकाल में जहां यह राशि 2.34 लाख करोड़ रुपये थी, वहीं 2014-19 के बीच यह राशि बढ़कर 6.26 लाख करोड़ रुपये हो गयी। यह चौंकाता है। आखिर सैद्धांतिक तौर पर निजीकरण में भरोसा करने वाली सरकार, शासकीय उपक्रमों में इक्विटी डालने में इतनी राशि क्यों इस्तेमाल करेगी? परंतु ऐसा लगता है कि यह एक रणनीति के तहत किया गया। शायद माना जा रहा था कि सरकार को पूंजी डालकर बैंकों की गड़बड़ी ठीक करनी होगी तथा चुनिंदा सरकारी उपक्रमों द्वारा नियंत्रित अहम बुनियादी क्षेत्रों में निवेश करना था।

जाहिर है अधिकांश इजाफा बैंकिंग, रेलवे तथा राजमार्ग निर्माण जैसे क्षेत्रों में हुआ। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में एयर इंडिया में 17,000 करोड़ रुपये की पूंजी डाली गई जो मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल की 15,000 करोड़ रुपये की राशि से बहुत अलग नहीं था। परंतु सरकारी बैंकों के मामले में ऐसा नहीं था। उन्हेें मनमोहन सिंह की सरकार में जहां 45,000 करोड़ रुपये की राशि दी गई थी  वहीं 2014-19  के बीच इन बैंकों में 2.52 लाख करोड़ रुपये की राशि डाली गई। ऐसा इसलिए कि सरकारी बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता में गिरावट आई थी और उन्हें पूंजी की आवश्यकता थी।

इसी प्रकार भारतीय रेल और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) में डाली गई इक्विटी भी 2009-14 के क्रमश: एक लाख करोड़ रुपये तथा 46,000 करोड़ रुपये से बढ़कर दो लाख करोड़ रुपये तथा 1.14 लाख करोड़ रुपये हो गई। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि मोदी सरकार उस समय अधोसंरचना में निवेश को लेकर प्रतिबद्ध थी जब निजी क्षेत्र के निवेश में धीमापन आ रहा था तथा वृद्धि बनाए रखने के लिए उच्च सरकारी निवेश की आवश्यकता थी।

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान भी यह सिलसिला जारी रहा। सन 2019-20 से 2022-23 में चार वर्षों के दौरान तथा अगले वर्ष के बजट अनुमान के अनुसार सरकारी उपक्रमों में डाली जाने वाली राशि बढ़कर 9.5 लाख करोड़ रुपये हो सकती है। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के चार वर्षों में ही पहले कार्यकाल की तुलना में इसमें 52 फीसदी का इजाफा हो चुका है।

सबसे अधिक वृद्धि एनएचएआई में हुई जो करीब 2.77 लाख करोड़ रुपये है जबकि भारतीय रेल में 2.48 लाख करोड़ रुपये का इजाफा हुआ। सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण में एक लाख करोड़ रुपये की कमी आएगी तथा घटते फंसे हुए कर्ज के साथ उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है। एयर इंडिया के लिए कोई प्रावधान नहीं है। एयर इंडिया ऐसेट होल्डिंग लिमिटेड के लिए करीब 62,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया ताकि वह निजीकरण के बाद विमानन कंपनी के कर्ज को बट्टे खाते में डालने की औपचारिकताएं पूरी कर सके। परंतु यह एकबारगी आवंटन है और इस मद में कोई अन्य प्रावधान नहीं होगा।

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में विनिवेश की गति में आए धीमेपन को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इसे कोविड महामारी के कारण बाजार में आई अस्थिरता की वजह भी माना जा सकता है। यूक्रेन-रूस सैन्य संघर्ष के बीच यह अस्थिरता जारी रह सकती है और मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की बाकी बची अवधि में भी यह विनिवेश पर विपरीत प्रभाव डालेगी।

बीते दो दशक में विभिन्न सरकारों द्वारा सरकारी उपक्रमों में निवेश पर नजर डालें तो यही नतीजा निकलता है कि कुल सरकारी व्यय में उनकी हिस्सेदारी मोदी सरकार के कार्यकाल में तेजी से बढ़ी है। मनमोहन सिंह सरकार के दो कार्यकालों के 2.5 प्रतिशत और 3.6 प्रतिशत के मुकाबले मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सरकारी उपक्रमों पर व्यय 6.3 फीसदी और दूसरे कार्यकाल के चार वर्षों में 6.8 फीसदी बढ़ा है।

इसकी कई वजह प्रतीत होती हैं। पहली बात, सरकारी उपक्रमों की वित्तीय सेहत समय के साथ और खराब हुई है तथा उन्हें बार-बार नकदी की आवश्यकता पड़ी। दूसरा, देश के परिवहन क्षेत्र  के लिए बढ़ते निवेश की जरूरत पूरी करनी थी जिस पर सरकारी उपक्रमों का नियंत्रण है। इसका अर्थ यह भी है कि बीते कई वर्षों से चल रहे निजीकरण के बावजूद परिवहन अधोसंरचना अभी भी सरकारी क्षेत्र से संचालित है और निवेश में कमी दूर करने के लिए सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा। बैंकिंग क्षेत्र की वित्तीय सेहत अब ऐसी नहीं है कि वे सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल करें। सरकारी उपक्रमों में डाली जाने वाली इक्विटी पूंजी में अधोसंरचना क्षेत्र भी बड़ा हिस्सेदार है। यह भी दर्शाता है कि मोदी सरकार निजी क्षेत्र को अधोसंरचना निर्माण के लिए आकर्षित करने में विफल रही है। यदि सरकारी उपक्रमों में ज्यादा इक्विटी की मांग का प्रबंधन नहीं किया गया तो यह भी एक बड़ा वित्तीय बोझ बन सकता है।

Keyword: सरकारी कंपनी, हिस्सेदारी, ढांचागत आवंटन, मनमोहन सिंह, सरकारी उपक्रम,
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