बिजनेस स्टैंडर्ड - रुपये का प्रबंधन
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रुपये का प्रबंधन

संपादकीय /  March 09, 2022

रूस पर और अधिक आर्थिक दबाव डालने के उद्देश्य से अमेरिका ने मंगलवार को उससे होने वाले ऊर्जा आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। अमेरिका उससे बहुत सीमित मात्रा में ईंधन आयात करता है लेकिन यह एक बड़ा संकेत है तथा और अधिक साझेदार इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। ऊर्जा क्षेत्र की बड़ी पश्चिमी कंपनियां रूस से दूरी बना रही हैं जिससे आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और निकट भविष्य में ईंधन कीमतें बढ़ी हुई रह सकती हैं। भले ही आने वाले दिनों में यूक्रेन-रूस विवाद का कोई कूटनीतिक हल निकल आए लेकिन कीमतों में तेजी जारी रह सकती है। चूंकि भारत बड़े पैमाने पर कच्चे तेल तथा कई अन्य जिंसों का आयात करता है, ऐसे में जिंसों की बढ़ी हुई कीमतों के साथ जुड़ी वृहद आर्थिक जटिलता कुछ समय तक जारी रह सकती है। इस वर्ष के आरंभ से अब तक तेल कीमतों में 70 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। बढ़ी हुई जिंस कीमतें देश को जिन रूपों में प्रभावित करेंगी उनमें एक रुपये का बाह्य मूल्य भी है। हालांकि रुपया इस सप्ताह अपने अब तक के निम्र स्तर पर पहुंचने के बाद कुछ हद तक सुधरा है लेकिन दबाव जारी रह सकता है और रुपया अंतत: निचले स्तर पर ही स्थिर होगा।

रुपये के निकट भविष्य में कमजोर बने रहने की तमाम वजह हैं। उच्च जिंस कीमतों के कारण अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ेगी और उसकी कीमत में तेजी आएगी। चूंकि उच्च तेल कीमतों का देश में वृहद आर्थिक निष्कर्षों पर अहम प्रभाव है इसलिए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भी भारतीय बाजार से बाहर हो रहे हैं। इसके कारण डॉलर की मांग और बढ़ रही है। उदाहरण के लिए विदेशी निवेशकों ने इस महीने में अब तक 26,000 करोड़ रुपये मूल्य के भारतीय शेयर बेचे हैं। ऐसे में चालू खाता और पूंजी खाता दोनों ओर से दबाव है। ज्यादा व्यापक ढंग से देखें तो वैश्विक बाजार में जोखिम से बचने का अर्थ है फंड की अमेरिका वापसी जिसके चलते सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में गिरावट आई और डॉलर में तेजी। इसके अतिरिक्त फेडरल रिजर्व भी जल्दी ही ब्याज दरों में इजाफा शुरू कर सकता है। फेड भू-राजनीतिक तनावों के संदर्भ में वृद्धि पर होने वाले असर को लेकर भी सतर्क होगा। ऐसे में दरें बढ़ेंगी और आने वाले महीनों में वित्तीय परिस्थितियां तंग होंगी। बल्कि जोखिम से बचने की कवायद यूक्रेन संकट के बहुत पहले शुरू हो गई थी जब बाजार ने फेड की ओर से दरों में अनुमान से अधिक इजाफे की संभावना पर समायोजन शुरू कर दिया था।

इस वैश्विक परिदृश्य में यह स्पष्ट है कि रुपये पर दबाव रहेगा। कुछ लोगों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक अगर इसका बचाव न करे तो बेहतर होगा। मुद्रा भंडार का इस्तेमाल बेवजह अस्थिरता को थामने के लिए किया जाना चाहिए, न कि मुद्रा के स्तर का बचाव करने के लिए। मुद्रा का व्यवस्थित समायोजन चालू खाते को स्थिर करने में मदद करेगा। चालू खाते के घाटे का स्थिर और प्रबंधन लायक स्तर मुद्रा को अधिक स्थिर बनाता है। कमजोर रुपया मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ाएगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि रिजर्व बैंक को रुपये का अवमूल्यन नहीं होने देना चाहिए। उच्च मुद्रास्फीति क्रय शक्ति कम करती है और यह मुद्रा के बाह्य मूल्य में भी झलकेगी। इस समायोजन को बाधित करने से बड़ा असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। ऐसे में रिजर्व बैंक को मुद्रास्फीति संबंधी पूर्वानुमान का नये सिरे से आकलन करना चाहिए और उसके अनुरूप काम करना चाहिए। अगले वित्त वर्ष के उसके पहले के पूर्वानुमान शायद बरकरार न रह सकें और अब उसे नीतिगत सामान्यीकरण की प्रक्रिया तेज करनी होगी। मुद्रास्फीति की अनदेखी करने से जोखिम बढ़ सकते हैं। इनमें बाहरी जोखिम भी शामिल हैं।

Keyword: आर्थिक दबाव, अमेरिका, ऊर्जा आयात, प्रतिबंध, ईंधन, यूक्रेन-रूस विवाद, रुपया,
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