बिजनेस स्टैंडर्ड - आयातित ऊर्जा की बढ़ती कीमत का जोखिम
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आयातित ऊर्जा की बढ़ती कीमत का जोखिम

नीलकंठ मिश्रा /  March 08, 2022

हमने नवंबर में आशा जताई थी कि ईंधन कीमतों में तेजी अस्थायी रहेगी और भारत की कोविड के पश्चात की सुधार प्रक्रिया इससे प्रभावित नहीं होगी। परंतु ईंधन कीमतें तेजी से बढ़ीं क्योंकि रूस पर प्रतिबंध लगने से आपूर्ति बाधित हुई। भारत अपनी जरूरत के कुल ईंधन का 36 प्रतिशत आयात करता है। सकल घरेलू उत्पाद में देश के ईंधन आयात की हिस्सेदारी अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सर्वाधिक है। एक दशक पहले यह अनुपात 8 फीसदी के उच्चतम स्तर पर पहुंचा था लेकिन उसके बाद यह घटा और कोविड के पहले केवल चार फीसदी तथा महामारी के दौरान तीन फीसदी से भी कम रह गया।

यदि मौजूदा कीमतें बरकरार रहती हैं तो यह अनुपात पुन: बढ़कर सात प्रतिशत हो सकता है। देश में 12 महीने का शुद्ध तेल आयात फिलहाल 1.25 अरब बैरल है जो कोविड के कारण मांग घटने के पहले 1.4 अरब बैरल था। यदि आगामी वित्त वर्ष में आर्थिक उत्पादन कोविड के पहले वाले वर्ष से 10 फीसदी अधिक रहता है तो शुद्ध तेल आयात 1.5 अरब बैरल पहुंच सकता है। तेल कीमतें भी दिसंबर 2021 के स्तर से 40 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ चुकी हैं। यानी इस मोर्चे पर भी करीब 60 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पडऩा तय है।

हालांकि यह तो प्रभाव का केवल एक हिस्सा है। गैस, कोयला, खाद्य तेल तथा उर्वरक जैसे घनीभूत ऊर्जा के अन्य स्वरूपों की कीमत भी बढ़ी है। ऐसा इसलिए भी है कि रूस और यूक्रेन इन जिंसों के विशुद्ध आपूर्तिकर्ता भी हैं। मौजूदा मूल्य पर भारत का इन जिंसों का आयात 40 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। यानी कुल ईंधन आयात का बोझ 100 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है जो जीडीपी के तीन फीसदी के बराबर है।

ईंधन से जुड़ी ज्यादातर चर्चा मुद्रास्फीति तथा नकदी पर प्रभाव पर आधारित रहती है जबकि उत्पादन पर भी इसका बुरा असर होता है। ऐसा तीन तरह से होता है।

पहली बात, ऊर्जा की ऊंची लागत एक बार उपभोक्ताओं पर डाले जाने के बाद स्थानीय उत्पादन वाली वस्तुओं और सेवाओं की खपत को प्रतिस्थापित करेगी जिससे जीडीपी प्रभावित होगी। घरेलू आपूर्तिकर्ता के साथ वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि के उलट यहां लाभार्थी देश के बाहर है। सरकार ईंधन करों में कटौती, आयात शुल्क पर दरें कम करके तथा उर्वरक सब्सिडी बढ़ाकर राहत दे सकती है लेकिन वह पूरे प्रभाव के एक चौथाई से अधिक मदद शायद ही दे पाए।

दूसरा, सरकार के हस्तक्षेप के बावजूद ईंधन की लागत में करीब 30 फीसदी इजाफा इस्तेमाल पर असर डालेगा: पेट्रोल, डीजल, घरेलू गैस तथा प्लास्टिक उत्पादों की कीमत बढऩे का अर्थ होगा इस्तेमाल में कमी। दुनिया भर में आर्थिक गतिविधियां इनके इस्तेमाल से संबद्ध हैं। मसलन तेज आवागमन, विनिर्माण, उच्च गुणवत्ता वाले पदार्थ आदि के निर्माण में इनकी भूमिका है। ईंधन के इस्तेमाल में कमी का अर्थ है जीडीपी में कमी।

तीसरा, ईंधन की ऊंची कीमतें तथा भूराजनीतिक अनिश्चितता के कारण वैश्विक मांग प्रभावित हो सकती है। कच्चे तेल का वैश्विक बाजार उस समय 2.6 लाख करोड़ डॉलर का था जब कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल थी। 120 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से बाजार का आकार बढ़कर 4.4 लाख करोड़ डॉलर हो जाएगा और तेल उपभोक्ता उत्पादकों को 1.8 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि चुकाएंगे। तेल कीमतों में अचानक इजाफा और भविष्य की अनिश्चितता को देखते हुए लगता नहीं कि उत्पादक इस अप्रत्याशित लाभ को नए निवेश पर खर्च करेंगे। तेल कीमतों का झटका वैश्विक मांग पर असर होगा। अमेरिका जैसी अर्थव्यवस्था जो तेल के मामले में आत्मनिर्भर है वहां भी उपभोक्ताओं पर असर होगा जबकि उत्पादक बचत करेंगे। वैश्विक विनिर्माण निर्यात में भारत की कम हिस्सेदारी को देखते हुए हिस्सेदारी में इजाफा वृद्धि को सकारात्मक रखेगा लेकिन हालात वाकई मुश्किल हैं।

हमारा मानना है कि ईंधन कीमतें काफी ऊंचे स्तर पर जाने वाली हैं। आपूर्ति अल्पावधि में प्रतिक्रिया नहीं दे सकती और नए ऊर्जा माध्यमों से प्रतिस्थापन कठिन होगा। एक दो माह तक मांग भी प्रभावित रहेगी क्योंकि उपभोक्ताओं को ऊंची कीमत को अपनाने में वक्त लगेगा। इससे मांग में लाजिमी तौर पर कमी आएगी। बहरहाल, आपूर्ति की बाधा को लेकर अनिश्चितता लंबी खिंचने से समायोजन भी मुश्किल होगा। कंपनियां इस बढ़ोतरी का बोझ ग्राहकों में डालने से हिचकिचा सकती हैं क्योंकि इससे वे दूर हो सकते हैं। आपूर्तिकर्ता इस बात को लेकर आशंकित रह सकते हैं कि नई क्षमताओं में कैसे निवेश किया जाए। कीमतों में इतनी बढ़ोतरी नवीकरणीय ऊर्जा को गति दे सकती है लेकिन इस प्रक्रिया में कई वर्ष लगेंगे।

नीति निर्माताओं के लिए भी यह बड़ी चिंता है कि वर्तमान अनिश्चितता कितने लंबे समय तक चलेगी। ये बदलाव भारत के भुगतान संतुलन को तार्किक अधिशेष से बड़े घाटे की ओर धकेलने वाले हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का बाहर जाना इस संकट को रेखांकित करने वाला है लेकिन चालू खाते का घाटा इतना बड़ा है कि अगर ईंधन कीमतें एक वर्ष तक ऊंची बनी रहीं तो केंद्रीय बैंक डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर होने दे सकता है। दूसरी ओर अगर यह इजाफा अल्पकालिक साबित होता है और कुछ सप्ताह में हालात बदल जाते हैं तो यह विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करके विनिमय दर को स्थिर रख सकता है।

सरकार की बात करें तो उर्वरक कीमतों पर शायद तत्काल कोई सक्रिय निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं हो लेकिन ईंधन करों में कटौती या सब्सिडी बढ़ाने के मामले में अहम अनिश्चितता यही है कि कीमतें कब तक ऊंची रहेंगी। यदि कीमतें एक वर्ष या उससे अधिक समय तक ऊंची बनी रहीं तो सरकार पेट्रोल या डीजल कीमतों को बढऩे और अर्थव्यवस्था को धीमे पडऩे दे सकती है तथ इस बीच कम आयात निर्भरता वाले ईंधन की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा सकती है। दूसरी ओर अगर बढ़ोतरी कुछ सप्ताह में समाप्त हो गई तो सरकार ईंधन कीमतों की अस्थिरता को सीमित रखना चाहेगी ताकि उत्पादकता पर बुरा असर न पड़े। इसके लिए कुछ राजकोषीय संसाधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

चाहे जो भी हो वृद्धि में तीन फीसदी गिरावट का जोखिम, मुद्रास्फीति में तेज इजाफा और अपेक्षाकृत कमजोर रुपया, नीति निर्माताओं की इस बात में सहायता कर सकता है कि वे मध्यम अवधि में ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में बढ़ें।

(लेखक एपैक स्ट्रैटजी के सह-प्रमुख एवं क्रेडिट सुइस के इंडिया स्ट्रैटजिस्ट हैं)

Keyword: आयातित ऊर्जा, कीमत जोखिम, ईंधन, सुधार प्रक्रिया, रूस, प्रतिबंध, सकल घरेलू उत्पाद,
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