बिजनेस स्टैंडर्ड - सरकारी दूरसंचार कंपनियां
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सरकारी दूरसंचार कंपनियां

संपादकीय /  March 08, 2022

देर से ही सरकार ने हाल में कुछ कदम उठाए हैं ताकि दूरसंचार क्षेत्र में दो कंपनियों का दबदबा कायम होने से रोका जा सके। सितंबर 2021 में न चुकाए गए सांविधिक बकाये और स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क में कमी के रूप में राहत पैकेज घोषित करने के बाद सरकार 23,000 करोड़ रुपये मूल्य की बैंक गारंटी को दूरसंचार कंपनियों को लौटाने पर विचार कर रही है। इसका संबंध उनके समायोजित सकल राजस्व बकाये से है। नकदी संकट से जूझ रही वोडाफोन आइडिया समेत दूरसंचार कंपनियों ने सरकार के कदमों की प्रतिक्रिया में शुल्क दरें बढ़ाई हैं और प्रवर्तकों की भागीदारी के साथ नए सिरे से फंड जुटाने की घोषणा की है। सरकार ने राहत देकर अच्छा किया है लेकिन एक अन्य क्षेत्र है जहां ध्यान देने की आवश्यकता है। इसका संबंध सरकारी कंपनियों भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) और महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) से है जिसे सन 1997 में धूमधाम से नवरत्न कंपनी का दर्जा दिया गया था और उसे न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध किया गया था। बीएसएनएल दिल्ली और मुंबई के अलावा पूरे देश में सेवा देती है। जबकि ये दोनों शहर एमटीएनएल के हवाले हैं।

ऐसा नहीं है कि सरकार ने बीएसएनएल और एमटीएनएल की सहायता नहीं की लेकिन अब ऐसा समय नहीं रहा कि इन सरकारी कंपनियों को और सहायता प्रदान की जाए क्योंकि ये पहले ही भारी भरकम कर्ज में हैं। सन 2020-21 तक बीएसएनएल और एमटीएनएल की समेकित हानि क्रमश: 95,701 तथा 35,348 करोड़ रुपये हो चुकी थी। फिलहाल सरकार शायद बीएसएनएल या एमटीएनएल को बेचने पर विचार न करे क्योंकि ये रणनीतिक क्षेत्र में आती हैं। सरकार ने दूरसंचार क्षेत्र को रणनीतिक क्षेत्र माना है जिनमें सरकारी क्षेत्र की न्यूनतम उपस्थिति आवश्यक है। हालांकि इस रुख पर विचार किया जाना चाहिए क्योंकि सरकारी दूरसंचार कंपनियों में काम करने वालों की बड़ी तादाद और वेतन के भारी भरकम बिल को देखते हुए परिसंपत्तियों की थोड़ी-थोड़ी बिक्री करके काम नहीं बन सकता। खासकर 2019-20 की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना के बाद वेतन बिल में काफी इजाफा हुआ। इस योजना के बाद बीएसएनएल के कर्मचारी 1.53 लाख से घटकर 78,569 और एमटीएनएल के 18,000 से घटकर 14,400 रह गए। इससे राजकोष पर करीब 70,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ा।

सरकार ने हाल में बीएसएनएल और एमटीएनएल की कुछ संपत्ति नीलामी के माध्यम से बेचने का प्रयास किया लेकिन किसी ने रुचि नहीं दिखाई। सरकार इसे और आकर्षक बनाने का प्रयास कर सकती है लेकिन यह इन कंपनियों की जटिल चुनौतियों को हल करने का सही तरीका नहीं है। इसमें दो राय नहीं है कि सरकारी क्षेत्र की कंपनियों ने दशकों तक अनदेखी सही है और एक के बाद एक सरकारों ने कई तरह से उनका दुरुपयोग किया है। सुधार की प्रक्रिया में बीएसएनएल और एमटीएनएल का विलय लंबे समय से सबसे वांछित प्रस्ताव रहा है। ऐसी चर्चा फिर सुनने को मिल रही है लेकिन इसकी सफलता के लिए यह आवश्यक है कि एक व्यवस्थित बदलाव किया जाए।

इस वक्त जब निजी दूरसंचार कंपनियां 5जी स्पेक्ट्रम नीलामी के लिए नीतियां बना रही हैं, बीएसएनएल 4जी के उपकरणों के ऑर्डर देने की तैयारी में है। यानी वह बाकियों से एक पीढ़ी पीछे है। एक समय लैंडलाइन फोन क्षेत्र में दबदबा रखने वाली सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी अब गिरकर 43.5 फीसदी रह गई है। वायरलेस में जहां बीएसएनएल एक दशक पहले तक सबसे अव्वल थी, वहां भी अब निजी कंपनियों की हिस्सेदारी 89.81 फीसदी है। सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी सिमटकर 10.19 फीसदी रह गई है। ब्रॉडबैंड में भी वह निजी कंपनियों से काफी पीछे है। ऐसे हालात में बीएसएनएल और एमटीएनएल की स्थिति में सुधार करना आसान काम नहीं है।

Keyword: सरकारी दूरसंचार कंपनियां, स्पेक्ट्रम शुल्क, बैंक गारंटी, बीएसएनएल, एमटीएनएल, नीलामी,
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