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केंद्रीय बैंक की परिसंपत्तियों पर रोक कितनी कारगर?

अजय शाह /  March 07, 2022

यूक्रेन पर हमला करने के बाद अमेरिका के नेतृत्व में यूरोपीय देशों ने रूस पर कई आर्थिक एवं वित्तीय प्रतिबंध लगाए हैं। इनमें केंद्रीय बैंक की परिसंपत्तियों पर रोक लगाना भी शामिल है। ऐसा समझा जाता है कि परिसंपत्तियों पर लेनदेन संबंधी प्रतिबंध लगाने से केंद्रीय बैंक पर काफी प्रतिकूल असर पड़ता है मगर सच्चाई यह है कि यह असर उतना नहीं होता है जितना प्राय: समझा जाता है। प्रतिबंधों के बाद भी रूस का केंद्रीय बैंक रूबल छाप सकता है और महंगाई नियंत्रित करने के उपाय जारी रख सकता है। हां, प्रतिबंधों के कारण केंद्रीय बैंक बाजार में विनिमय दर पर किसी तरह का असर डाल पाने में असमर्थ रहता है।

जब चीन ने भारत के खिलाफ सीमा पर अतिक्रमण किया था तो उसने तर्क दिया कि सीमा पर भले ही सैनिक एक दूसरे से उलझे हैं मगर आर्थिक गतिविधियां जारी रहनी चाहिए। भारत के लिए यह असहज स्थिति थी। भारत ने चीन के साथ आर्थिक संबंधों को किनारे कर दिया और कहा कि पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक सहयोग उनके अच्छे एवं अनुकूल व्यवहार पर आधारित है। हालांकि भारत एक सीमा तक ही चीन के साथ आर्थिक गतिविधियों पर विराम लगा सकता है। इसका कारण स्पष्ट है। भारत चीन की अर्थव्यवस्था में बहुत अधिक महत्त्व नहीं रखता है। इसके विपरीत चीन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण है। चीन के साथ बिगड़े हालात का सामना भारत ने स्वयं अपने दमखम पर किया है। भारतीय विदेश नीति दशा-दिशा को देखते हुए कोई भी देश ऐसे कदम उठाने के लिए तैयार नहीं था जो चीन पर प्रभाव डाल सकता था।

यूक्रेन की विदेश नीति अलग है। यूक्रेन अलग-थलग नहीं है और वहां के राष्ट्रपति व्लोदोमिर जेलेंस्की विश्व पटल पर छा गए हैं। पूरी दुनिया में कई देश उस नए सिद्धांत का हिस्सा बन गए हैं कि वैश्वीकरण का लाभ अच्छे व्यवहार पर निर्भर करता है। अगर रूस पूर्ववर्ती सोवियत संघ की तरह व्यवहार करता है तो वह भी सोवियत संघ की तरह अलग-थलग पड़ जाएगा। इस बीच, चीन रूस के कदम पर पैनी नजर रख रहा है और संभव है कि वह भी ताइवान पर अपना आधिपत्य करने के लिए उपलब्ध विकल्पों पर विचार करेगा।

आर्थिक एवं वित्तीय प्रतिबंध लगाने में केंद्रीय बैंक की परिसंपत्तियां जब्त करना भी शामिल है। इसका आशय एवं मीडिया में जिक्र थोड़ा बढ़ा-चढ़ा कर किया गया है। इस भ्रम का कारण 'विदेशी मुद्रा भंडार' की परिभाषा है। 'विदेशी मुद्रा भंडार' का तात्पर्य प्राय: केंद्रीय बैंक के पास उपलब्ध परिसंपत्तियों के भंडार से है। ऐसा मानना उपयुक्त नहीं है। प्रत्येक केंद्रीय बैंक का अपना 'मौद्रिक बहीखाता' होता है। इस बहीखाते में रूबल देनदारी समझी जाती है और इसके बदले उसी अनुपात में परिसंपत्तियों का भी प्रावधान किया जाता है। ये परिसंपत्तियां और देनदारियां अवश्य बराबर होनी चाहिए। इसका अर्थ है कि प्रत्येक रूबल के समतुल्य परिसंपत्ति का प्रावधान होना चाहिए। रूस का केंद्रीय बैंक रूबल छापता है और इसकी मदद से नई परिसंपत्तियां खरीदता है। इन परिसंपत्तियों को सहेज कर रखा जाता है। केंद्रीय बैंक परिसंपत्तियां बेच भी सकता है और इस क्रम में रूबल जमा कर सकता है।

परिसंपत्ति के मामले में केंद्रीय बैंक घरेलू या विदेशी परिसंपत्तियां रखने का विकल्प चुन सकता है। इन विदेशी परिसंपत्तियों को ही भ्रमवश 'विदेशी मुद्रा भंडार' का नाम दे दिया जाता है। वे इस अर्थ में भंडार नहीं जानी जा सकती क्योंकि इनका इस्तेमाल इच्छानुसार नहीं किया जा सकता है। अगर केंद्रीय बैंक इस भंडार को बेचने का निर्णय लेता है तो इससे अर्थव्यवस्था में रूबल की मात्रा उसी अनुपात में कम करनी होगी। इससे अल्प अवधि की ब्याज दर बढ़ जाएगी। व्यावहारिक स्तर पर कुछ नहीं बदला है। रूसी अर्थव्यवस्था में रूबल को समर्थन देने वाले लेनदेन हो रहे हैं। ये लेनदेन कुछ उन परिसंपत्तियों से जुड़े हैं जिनका कारोबार नहीं हो सकता है। रूस सरकार की तरफ से मुद्रा जारी करने वाला बुनियादी ढांचा पहले की तरह ही काम कर रहा है। केंद्रीय बैंक रोजमर्रा की तरह बहीखाते के आकार में लगातार बदलाव (अल्प अवधि की ब्याज दरों बदलाव) ला रहा है ताकि महंगाई दर स्थिर और कम स्तर पर रहे। वे ऐसा करने में पूरी तरह सक्षम हैं।

वास्तव में केंद्रीय बैंक के बहीखाते में विदेशी परिसंपत्तियां अहम नहीं हैं। केंद्रीय बैंक के बहीखाते में केवल घरेलू परिसंपत्तियां रखकर मुद्रा छापना पूरी तरह संभव है। हां, रूस का केंद्रीय बैंक मुद्रा बाजार में अपनी गतिविधियां चलाने में स्वयं को सक्षम नहीं पा रहा है। सामान्य तौर पर आपूर्ति एवं मांग विनिमय दर करती हैं। केंद्रीय बैंक स्थानीय मुद्रा छाप कर अमेरिकी सरकारी बॉन्ड जैसी विदेशी परिसंपत्तियां खरीदने में इनका इस्तेमाल कर सकते हैं। ये बड़े आकार के सौदे मुद्रा बाजार में बाजार द्वारा तय कीमतों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं। मगर एक बार वैश्विक वित्तीय प्रणाली से रूस के केंद्रीय बैंक के अलग होने से उसके लिए ऐसे सौदे कर पाना संभव नहीं रह जाता है।

अधिकांश सुदृढ़ संरचना वाले केंद्रीय बैंक मुद्रा बाजार को हानि नहीं पहुंचाते हैं। उनका मूल उद्देश्य महंगाई दर नियंत्रित करने के इर्द-गिर्द रहता है। किसी अर्थव्यवस्था में विनिमय दर एक महत्त्वपूर्ण पक्ष होती है। जिस तरह सरकार इस्पात या पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य नियंत्रित के लिए हस्तक्षेप करती है उसी तरह विनिमय दर भी नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है। एक सुव्यवस्थित मौद्रिक नीति तब तैयार होती है जब केंद्रीय बैंक विनिमय दर तय करने से स्वयं को दूर रखता है और अपना सारा ध्यान महंगाई नियंत्रित करने केंद्रित करता है।

जब रूस का केंद्रीय बैंक विदेशी परिसंपत्तियों में कारोबार नहीं कर पाता है तो इसका असर तुलनात्मक रूप से कम होता है। इससे रूबल छापने और घरेलू स्तर पर महंगाई दर नियंत्रित करने के केंद्रीय बैंक के कार्यों पर कोई असर नहीं होता है। जब तक प्रतिबंध लगे रहते हैंं तब तक रूस का केंद्रीय बैंक मुद्रा नीति में शामिल नहीं हो सकता है।

पिछले एक सप्ताह में अमेरिका डॉलर की तुलना में रूबल 84 से 124 तक चला गया है। यूक्रेन पर आक्रमण करने के खिलाफ दुनिया के देशों की तरफ से लगाए गए प्रतिबंधों के असर वाजिब लग रहे हैं। इससे युद्ध छेडऩे के लिए रूस को वित्तीय स्तर पर कठिनाइयों का सामना करना होगा और आत्मनिर्भर बनने की राह में आने वाले प्रतिकूल असर से निपटना होगा। अगर रूसी केंद्रीय बैंक की विदेशी परिसंपत्तियों तक पहुंच होती और रूबल में आई इस कमजोरी से लडऩे की उसने कोशिश की होती तो यह रूस के लिए हानिकारक होता।

इन तमाम बातों का व्यापक संदर्भ काफी महत्त्वपूर्ण है। यूक्रेन और ताइवान जैसे देश की विदेश नीति अलग-थलग रहने के बजाय गठबंधन तैयार करने में विश्वास रखती है। इस वजह से इन पर कोई देश आक्रमण करता है तो उसे एक नए सिद्धांत से जूझना होगा। वह सिद्धांत यह है कि 'वैश्वीकरण का लाभ तभी मिल सकता है जब आपका व्यवहार अच्छा है। अगर आप गलत व्यवहार करते हैं तो दुनिया एकजुट होकर आपको दंडित करेगी जिसका असर लंबे समय तक दिखेगा।' इस समग्र ढांचे के तहत केंद्रीय बैंक को विदेशी परिसंपत्तियों में कारोबार करने से रोकना मात्र एक छोटा सा कदम है। 'विदेशी मुद्रा भंडार' को लेकर भ्रामक धारणा होने से इस बात को काफी बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता है। बस इसका असर यह होता है कि केंद्रीय बैंक मुद्रा बाजार में छेड़छाड़ नहीं कर सकता है और विनिमय दर का निर्धारण बाजार के माध्यम से होता है।

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