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उप्र में गाय, बैल, रोजगार और जाति हैं अहम

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  March 06, 2022

दीवारों पर लिखी इबारत एक ऐसा रूपक है जो मेरी यात्राओं के साथ विकसित होता गया है। यह खासतौर पर बीते 15 वर्षों के दौरान देश के चुनावी हिस्सों और उनके इर्दगिर्द की यात्राओं से उपजा है। क्योंकि हमारे देश में चुनावों से भी अधिक उत्सव का माहौल चुनावों के दौरान होता है। दीवारों पर लिखी इन इबारतों की बदौलत आप समझ सकते हैं कि लोगों के दिलोदिमाग में क्या चल रहा है, उनकी आकांक्षाएं, खुशियां, चिंताएं और भय क्या हैं। ये इबारतें चित्रों, विज्ञापनों और यहां तक कि मलबों के रूप में हो सकती हैं।

या फिर काले-सफेद रंग में उकेरे गए एक भव्य सांड के रूप में भी। सन 2022 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के प्रचार और राजनीति की बात करें तो सबसे पहले जिस इबारत ने हमारा ध्यान खींचा कोई रूपक नहीं बल्कि सचमुच का सांड जो करीब 100 फुट की ऊंचाई से हमें देख रहा था। उसकी पीठ का उभार दूर से नजर आ रहा था मानो हफीज कॉन्ट्रैक्टर की बनाई किसी गगनचुंबी इमारत के ऊपर लगी कनात हो। सांड पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर खड़ा था जहां से बांये मुड़कर हम बलिया जिले की ओर जा रहे थे। वह उत्सुक लगा, हालांकि उसे अहसास भी नहीं होगा कि वह प्रदेश के चुनाव प्रचार में अहम कारक हो चुका है।

छुट्टा सांड या छुट्टा पशु हर राजनीतिक बातचीत का हिस्सा हैं। गोकुशी को उत्तर प्रदेश में 1955 में ही अवैध बना दिया गया था लेकिन बीते पांच वर्ष में इस कानून के कड़ाई से पालन ने तस्वीर बदल दी है। आवार पशुओं की बढ़ती तादाद के अनचाहे परिणाम दिख रहे हैं। राजनीति हमेशा बदलती रहती है। यहां तक हिंदी प्रदेश में भी जहां भारतीय जनता पार्टी को 2014, 2017 और 2019 में लगातार जीत मिली वहां भी अब पशुओं से जुड़ी राजनीति की दिशा बदल रही है। छुट्टा गाय अब इतना बड़ा मुद्दा बन गई हैं कि प्रचार अभियान के दौरान योगी आदित्यनाथ को गैर दुधारू गाय पालने वालों को नकद राशि देने का वादा करना पड़ा। यह बड़ा परिवर्तन लाने वाला मुद्दा नहीं है। परंतु यह उन कई कारकों में से एक है जो हिंदी प्रदेश में मायने रखते हैं। क्या जाति के आधार पर हुए विभाजन को धर्म पाट सकता है या धार्मिक एकता को जाति दोबारा बांट सकती है?

सोनभद्र उत्तर प्रदेश का सबसे गरीब जिला नहीं है, भले ही आपको लगे कि भला इससे गरीब जिला कैसा नजर आएगा। श्रावस्ती न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश का सबसे निर्धन जिला है।

रॉबट्र्सगंज जिला मुख्यालय के बाहर इंजीनियरिंग कॉलेज में एक रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में हकीकत का ध्यान रखा और कारखानोंं, वृद्धि और रोजगार के बजाय नि:शुल्क अनाज की बातें कीं। उन्होंने कहा कि महामारी में उन्होंने लोगों को भूखे नहीं मरने दिया और यह सुनिश्चित किया कि देश के 80 करोड़ लोगों को खाद्यान्न पहुंचे।

वाराणसी जाने वाले राजमार्ग से कुछ किलोमीटर दूर गेंदुरिया गांव की दलित बस्ती से शायद हमें कुछ संकेत मिलें। करीब 50 परिवारों के इस गांव में लगभग सभी बेरोजगार हैं। ज्यादातर लोग शिक्षित हैं और कई ने कक्षा 12 तक की पढ़ाई की है। कुछ लोग दशकों से यानी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद से ही बेरोजगार हैं। सरकार रोजगार दे नहीं रही, उद्योगों का विस्तार नहीं हो रहा है, कई को काम की तलाश में दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है। मसलन 30 वर्ष के पंचमुखी सोनकर ने पहले गोवा में एक टूथपेस्ट फैक्टरी में काम किया और फिर एक पंचर बनाने की दुकान पर। उन्होंने कुल्चे और चाय की दुकान भी लगाई लेकिन ग्राहक नहीं आते क्योंकि लोगों के पास काम नहीं हैं। दूसरों की तरह वे भी ईंट भट्ठों या इमारतों में मजदूर का काम करते हैं।

पंचमुखी ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए सब्जियां बेचीं। एक अन्य दलित जाटव चंदन कुमार ने भी पैथलॉजी लैब टेक्नीशियन का डिप्लोमा पूरा करने के लिए इधर-उधर काम किया लेकिन अब सरकार उस डिप्लोमा को मान्यता ही नहीं देती। वह खुश हैं कि उन्हें एक स्थानीय अस्पताल में कम वेतन वाला ही सही काम मिल गया है। वह अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए अस्पताल में आठ-आठ घंटे की दो पालियों में काम करते हैं।

इसी राजमार्ग पर 20 किलोमीटर आगे हम जूरी गांव में रुके जहां कच्ची-पक्की दीवारों वाले कुछ घर दिखे। इन्हें स्थानीय भाषा में आवास कहा जाता है जो प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के लिए बनाए गए हैं। पास में ही एक मौर्य परिवार रहता है। इस गांव में कुशवाहा, कोइरी और कुर्मी आदि पिछड़े समुदाय रहते हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने पिछली बार भाजपा को वोट दिया था लेकिन इस बार पुनर्विचार कर रहे हैं।

यह नमूना गैर यादव पिछड़ा वर्ग से है। बीते तीन चुनावों में भाजपा ने उनका वोट हासिल किया है। लेकिन अब तस्वीर उतनी सहज नहीं है। उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी नयी जाति है।

बलिया के निकट नगरा में अखिलेश यादव की रैली में युवाओं के हाथों में मौजूद तख्तियों पर एक ही बात लिखी है रोजगार...रोजगार और रोजगार। कुछ युवा ऐसे भी हैं जो 2017 में पुलिस भर्ती के बाद नियुक्ति पत्र चाहते हैं। वहीं कुछ शिक्षक भर्ती परीक्षा और पैरा मेडिकल परीक्षाएं चाहते हैं।

शिक्षित युवाओं में रोजगार की कमी का संकट है। हालांकि इसमें भी वे हास्यबोध दिखाने से नहीं चूकते। मसलन एक जगह यह लिखा दिखा कि बीपीएड की अगली परीक्षा सन 3202 में होगी। ऐसे दृश्य आजकल चुनावी रैलियों में नहीं दिखते। हां, मोदी की मौजूदगी में जरूर ऐसा होता है। मोदी ने अखिलेश पर परिवारवाद के बहाने हमले किए हैं। इस पर अखिलेश कहते हैं कि अगर योगी आदित्यनाथ अपने मामा के उत्तराधिकारी नहीं होते तो क्या कभी उनकी जगह संप्रदाय के मुखिया बन पाते? अखिलेश कहते हैं कि तब वे भी औरों की तरह बेरोजगार घूमते।

मऊ कई बाहुबलियों की कर्मभूमि रहा है। मुख्तार अंसारी (जेल में बंद) उनमें प्रमुख हैं। वहां उनके बेटे अब्बास से हमारी मुलाकात होती है जो निशानेबाजी के पूर्व राष्ट्रीय चैंपियन हैं और राष्ट्रीय स्तर पर सात पदक जीत चुके हैं।

अब्बास कहते हैं कि योगी सरकार का कानून-व्यवस्था में सुधार का दावा हवा-हवाई है। मायावती भी ऐसा ही कहती हैं। वाराणसी के निकट एक संक्षिप्त बातचीत में वह हमसे कहती हैं कि क्या योगी का बुलडोजर और हथौड़ा किसी गैर मुस्लिम की संपत्ति पर चला।

भाजपा की सभी रैलियों में एक नारा सुनाई देता है: बुलडोजर बाबा, जय श्रीराम/बुलडोजर बाबा जिंदाबाद। आदित्यनाथ भी अपने भाषण में बुलडोजर का जिक्र करते हैं। वाराणसी के निकट एक इंटर कॉलेज में रैली के दौरान भीड़ भाषण में तभी दिलचस्पी लेती है जब वे बुलडोजर और हथौड़े का जिक्र करते हैं और कहते हैं कि समाजवादी पार्टी ने विकास के नाम पर केवल कब्रिस्तानों की दीवार ऊंची करवाईं। लेकिन लोगों ने उन्हें ये सारी बातें करते हुए पहले भी सुना है। उनके बोलना शुरू करने के दो मिनट के भीतर लोग वहां से जाने लगते हैं। हमने जिससे भी बात की सबने कहा कि वे भाजपा को वोट देंगे। लेकिन योगी के लिए नहीं, मोदी के लिए।

उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी ही नयी जाति, राष्ट्रवाद और धर्म है। उन भावानात्मक मुद्दों के मद्धम पडऩे के साथ ही जाति की वापसी हुई है। गरीबों को बड़ी तादाद में गो संरक्षण की कीमत चुकानी पड़ रही है। ऊंची जातियों के ज्यादातर लोग, खासकर दुकानदार और कारोबारी कहते हैं कि वे तनाव में हैं लेकिन भाजपा को वोट देंगे क्योंकि उसने कानून-व्यवस्था बेहतर बनाई है। बड़ी तादाद में गरीब समुदाय नि:शुल्क अनाज, दालों और खाद्य तेल दिए जाने को भी सराहता है।

क्या ये सारी बातें आपको भ्रमित कर रही हैं? इसका केवल एक ही अर्थ है और वह यह कि तीन बार आसानी से चुनाव जीतने वाली भाजपा को इस बार उत्तर प्रदेश में कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है।

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