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आम बजट में नजर आई सुसंगति और निरंतरता

आशिमा गोयल /  03 03, 2022

अक्सर शुरुआती धारणा ही मजबूत हो जाती है। परंतु नए आंकड़ों पर नजर डालना भी महत्त्वपूर्ण है। हमें बताया गया कि कोविड-19 के झटके के तहत भारतीय अर्थव्यवस्था सबसे बुरा प्रदर्शन करने वाली रही और वृद्धि में सुधार इसलिए हो रहा है कि गिरावट आई। परंतु अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के 2020 और 2021 के हालिया वृद्धि अनुमान दर्शाते हैं कि 6.6 फीसदी ऋणात्मक और 9 फीसदी के साथ भारत मैेक्सिको (8.2 फीसदी ऋणात्मक तथा 5.3 फीसदी ), स्पेन (10.8 फीसदी ऋणात्मक एवं 4.9 फीसदी) तथा फ्रांस (8 फीसदी ऋणात्मक एवं 6.7 फीसदी) आदि से बेहतर स्थिति में है।

जिस वृहद आर्थिक नीति ने हमें यह हासिल करने में मदद की वह बजट में अस्पष्ट ही दिखती है। सरकार का कर अनुपात असहज करने वाले स्तर तक बढ़ चुका है तथा ब्याज भुगतान के चलते आधा राजस्व उसे चुकाने में जा रहा है। यह जापान और अमेरिका के उलट है जहां सरकारें उच्च कर्ज के बावजूद कम ब्याज दर पर कर्ज हासिल कर सकती हैं। इसके बावजूद निजी खपत और निवेश को मदद की आवश्यकता है।

बजट की प्राथमिकता की बात करें तो वह संवेदनशील वर्ग को जरूरी मदद मुहैया कराते हुए भी निवेश पर बल दे रहा है। इस बीच राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की दिशा में छोटे कदम बढ़ाए जा रहे हैं। नीचे दिए गए छह बिंदु बताते हैं कि ऐसा क्यों हुआ:

पहला, अतीत में उच्च वृद्धि के दौर में पहले निजी और फिर सार्वजनिक निवेश में तेजी देखी गई है लेकिन वृहद आर्थिक अस्थिरता वृद्धि को प्रभावित करती है। यदि सरकारी निवेश में मौजूदा दो अंकों की वृद्धि निजी निवेश बढ़ाती है तो यह अहम जरूरतमंदों तक पहुंच सकती है। कुछ निचले दर्जे का विनिर्माण तेजी से रोजगार तैयार करेगा। खपत में और ज्यादा तेजी की गुंजाइश नहीं है। वर्ष 2008 का हमारा अनुभव तथा अमेरिका की मौजूदा मुद्रास्फीति हमें बताती है कि खपत को प्राथमिकता देने से मुद्रास्फीति बढ़ती है और आपूर्ति के गतिरोधों की बदौलत वृद्धि पर असर पड़ता है।

दूसरा, सरकारी व्यय तथा आपूर्ति क्षेत्र के अन्य कदमों का बेहतर सामंजस्य मुद्रास्फीति को तय दायरे में रखने में मदद करेगा। गति शक्ति ने बेहतर पर्यावरण के अनुकूल समन्वय वाले बुनियादी ढांचे की योजना प्रस्तुत की है। इससे माल ढुलाई की लागत में कमी आएगी। बेहतर राजस्व की बदौलत उत्पादों में सहजता आती है और आवश्यकता पडऩे पर जिंस मुद्रास्फीति को सीमित किया जा सकता है। घरेलू नीति खुदरा मूल्य सूचकांक (सीपीआई) को अधिक प्रभावित करती है जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रास्फीति थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) को। सीपीआई आम परिवारों पर असर डालती है और वह मुद्रास्फीति को लक्षित करती है। सरकार का जोर भी मुद्रास्फीति को सीमित करने पर रहता है। इन मसलों पर बेहतर राजकोषीय-मौद्रिक तालमेल वास्तविक ब्याज दरों को वृद्धि दर से नीचे रखने तथा वृद्धि और राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को थामने में मदद करता है। इसके साथ ही जमाकर्ताओं को सकारात्मक वास्तविक प्रतिफल हासिल होता है।

तीसरा, क्रियान्वयन की शासकीय क्षमता को लेकर भी चिंता है। सरकार को सार्वजनिक निवेश की बदौलत स्वास्थ्य एवं शिक्षा क्षेत्र में बेहतरी लानी होती है। केंद्रीय बजट में लोकलुभावन उपाय नहीं किए गए लेकिन राज्यों के चुनावों में ऐसे वादे किए जाते हैं। नि:शुल्क बिजली जैसे वादे खासतौर पर घातक हैं। सब्सिडी की जगह आय हस्तांतरण ने ले ली है जो कम से कम विसंगति नहीं पैदा करती। परंतु एक अरब से अधिक आबादी तथा कमजोर कर आधार के साथ इन्हें बेहतर लक्षित करना होगा। उधारी की सीमा राज्यों को प्रभावित करती है। इन्हें प्राप्त करने के लिए वे निवेश में कमी करते हैं। पंजाब इससे हुए नुकसान का प्राथमिक उदाहरण है।

ऐसे में राज्यों को निवेश के लिए प्रेरित करने के लिए प्रलोभन और दंड की नीति का प्रयोग करने की जरूरत है। बजट निवेश को वित्तीय मदद मुहैया कराके उसका बचाव करता है लेकिन यह सशर्त होता है।

यदि ऐसी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए राजकोषीय परिषद का गठन किया जाता और राज्यों की लोकतांत्रिक भागीदारी होती तो केंद्र सरकार उस आलोचना से बच सकती थी जो अनुशासन लागू करने के प्रयास में होती है। परिषद को यह आदेश दिया जा सकता था कि वह राज्यों को व्यय गुणवत्ता, अंकेक्षण, पारदर्शिता, त्वरित भुगतान, विभिन्न योजनाओं को तार्किक बनाने और तीसरे स्तर पर अनिवार्य प्रतिनिधित्व में राज्यों की मदद करे।

चौथा, बजट प्रोत्साहन के लिए वित्तीय क्षेत्र का इस्तेमाल जारी रखे हुए है। बीआईएस क्रेडिट डेटा दिखाता है कि भारतीय कंपनियां तथा परिवारों के पास उभरते बाजारों के औसत का करीब आधे के बराबर लाभ लेने की स्थिति में है जबकि सरकार का कर्ज करीब दोगुना है। यह नीति सरकारी कर्ज कम करने और निजी ऋण बढ़ाने में मदद मिलेगी।

वारंटी जो बैंकों का जोखिम कम करती हैं तथा तैयार नकदी का इस्तेमाल करती हैं वे सरकार की देनदारी हैं, न कि बैंकों की। सरकारी उधारी में इजाफा नहीं हो रहा है और सुधार बेहतर होने पर शायद भविष्य में ऋण भी न बढ़े।  सुधारों के साथ कारोबारी संचालन तथा नियमन कड़े हुए हैं। नियामकीय राहत कालातीत है, पूंजी का बचाव मुहैया है और बैंक जोखिम को ध्यान में रखकर ऋण दे रहे हैं। संग्रहण की क्षमता बेहतर है। वित्तीय स्थिरता ने भी प्रभावित किया है।

गैर बैंकिंग ऋण की बढ़ती हिस्सेदारी स्वस्थ विविधता का संकेत कर रही है। बजट ने इसमें और योगदान किया है। बैंक ऋण में स्थिर सुधार हो रहा है। इस अनिश्चित समय में भी कुछ क्षेत्रों में निवेश बढ़ रहा है।

पांचवां, सशर्त प्रोत्साहन संबद्ध प्रोत्साहन, कॉर्पोरेट कर कटौती तथा सीमित शुल्क समायोजन के कारण आपूर्ति शृंखला में विविधता आई और अंतत: भारत को रोजगार आधारित निर्यात का मौका मिला। ऐसे में यह पुनर्वितरण की दृष्टि से कर बढ़ाने का सही समय नहीं है। नयी बात यह है कि प्रोत्साहन अस्थायी हैं और केवल तब तक के लिए हैं जब तक वांछित पैमाना हासिल नहीं हो जाता तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा हासिल नहीं हो जाती। तकनीक और नवाचार की मदद से सेवा निर्यात जारी है। इस क्षेत्र में भारत को तुलनात्मक बढ़त हासिल है।

छठा, अमेरिकी मुद्रास्फीति तथा फेड की कड़ाई से जोखिम उत्पन्न हुए हैं। परंतु 2013 और 2018 में फेड के अनुसरण ने भी भारत में वृद्धि के दशक भर लंबे धीमेपन में योगदान किया है। भारतीय मुद्रास्फीति का ढांचा अलग है। ब्याज संवेदी पूंजी प्रवाह की सीमा तय करने से पूंजी का बहिर्गमन कम होगा। इससे आरबीआई सरकारी उधारी की अधिक मदद कर पाएगा। ऐसे में नीतिगत दरों को घरेलू चक्र के साथ सुसंगत बनाने का अवसर है।

बजट में निरंतरता है और कुछ बदलाव तथा अच्छे क्रियान्वयन के साथ हम वैश्विक अस्थिरता के बावजूद राह निकाल सकते हैं। हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं।

(लेख में विचार व्यक्तिगत हैं)

Keyword: आम बजट, सुसंगति, निरंतरता, क्रियान्वयन, वैश्विक उथलपुथल, आईएमएफ, आर्थिक नीति,
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