बिजनेस स्टैंडर्ड - सरकारी खरीद नीति का दायरा बढ़ाने की है आवश्यकता
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सरकारी खरीद नीति का दायरा बढ़ाने की है आवश्यकता

बुनियादी ढांचा
विनायक चटर्जी /  March 02, 2022

वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग ने 29 अक्टूबर, 2021 को 22 पृष्ठों की एक अधिसूचना जारी की। इसका शीर्षक था, 'सरकारी खरीद और परियोजना प्रबंधन को लेकर कुछ आम दिशानिर्देश'। यह शीर्षक अपने आप में निरापद है। प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री ने इसे लेकर कोई घोषणा नहीं की। मीडिया और कारोबारी जगत में भी बहुत कम लोगों ने इस पर ध्यान दिया। केंद्र सरकार के सभी उपक्रमों को रूटीन के तहत इसके बारे में बता दिया गया और दस्तावेज को खामोशी से मंत्रालय की वेबसाइट पर दर्शा दिया गया।

दिसंबर 2021 में बिज़नेस स्टैंडर्ड में इस बात को रेखांकित किया गया कि यह स्वतंत्र भारत के सबसे अहम सुधारों में से एक था और इसने सरकारी खरीद के एक साहसी नये युग की शुरुआत की। इसके बावजूद मीडिया और संबंधित कारोबारियों में इसे लेकर अविश्वास की दृष्टि ही दिखी। आखिरकार वित्त मंत्री के 1 फरवरी, 2022 के बजट भाषण में इन सुधारों को रेखांकित किया गया और तब जनता का ध्यान इस ओर गया। इसमें कहा गया है कि अर्हता वाले चालू खातों के 75 फीसदी तक के बिलों को जमा करने के 10 कार्यदिवस के भीतर भुगतान किया जाना चाहिए। शेष भुगतान 28 कार्यदिवस के भीतर किया जाना चाहिए। अंतिम बिल का भुगतान काम पूरा होने के तीन माह के भीतर ठेकेदार को कर दिया जाना चाहिए। सभी केंद्रीय मंत्रालयों की खरीद के लिए कागजरहित, ऑनलाइन ई-बिल व्यवस्था शुरू की जानी है ताकि आपूर्तिकर्ता और ठेकेदार अपने डिजिटल हस्ताक्षर वाले बिल और दावे ऑनलाइन जमा कर सकें तथा कहीं से भी जानकारी का पता लगा सकें। ऐसे मामलों में जहां किसी मंत्रालय या विभाग ने मनमाने अवार्ड को चुनौती दी हो और पराजित हो गया हो वहां 75 फीसदी मनमाने अवार्ड को बैंक गारंटी के विरुद्ध तत्काल चुकता कर दिया जाना चाहिए।

अधिसूचना ने एक सक्षम प्राधिकार द्वारा गुणवत्ता आधारित सरकारी खरीद (क्यूओपी) के लिए गुणवत्ता एवं लागत आधारित चयन (क्यूसीबीएस) घोषित होने की राह भी खोल दी। गैर वित्तीय बोलियों के लिए मानक 30 फीसदी से अधिक नहीं रखा गया।

आखिर में आलोचना का सबब रहे न्यूनतम लागत के विजेता वाले ढांचे को समाप्त करने का विचार रखा गया। सबसे अहम काम है अब राज्यों को सहमत किया जाए। मौजूदा अधिसूचना केवल केंद्र सरकार के संस्थानों पर लागू होती है जबकि सरकारी कामों में राज्यों की हिस्सेदारी करीब 60 फीसदी है। विभिन्न औद्योगिक संगठनों को भी इसे ध्यान में रखते हुए राज्यों से चर्चा करनी चाहिए।

अगली महत्त्वपूर्ण बात वस्तुओं को शामिल करने की है। वस्तुएं अब मानक जिंस नहीं हैं। रोबोट से ड्रोन तक सरकारी एजेंसियां तकनीक संपन्न उत्पाद खरीद रही हैं और सार्वजनिक खरीद नीति में इसे समझकर क्यूसीबीएस जैसी बोली लगनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय क्यूसीबीएस प्रारूप मसलन विश्व बैंक जैसे प्रारूपों में तकनीकी और वित्तीय स्कोर के लिए 80:20 का अनुपात है। तकनीकी स्कोर के लिए 30 फीसदी की सीमा को बढ़ाकर 80 फीसदी करने की जरूरत है। तकनीकी जटिलता वाले कार्य अनुबंधों में इस प्रावधान का इस्तेमाल करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए सड़क और रेल परियोजनाओं के लिए पहाड़ों के बीच गहरी खुदाई की आवश्यकता होती है। यदि गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित है तो निजी क्षेत्र की ओर से आतर्किक बोली को समाप्त करना होगा। ऐसे विवेक आधारित निर्णय तथा 30:70 का क्यूसीबीएस प्रारूप का इस्तेमाल करने के लिए वस्तुगत निर्णय की आवश्यकता है। इन पर हमेशा सवाल उठ सकता है और ऐसी प्रक्रिया में शामिल अफसरशाहों को भविष्य की जांचों से सुरक्षा दी जानी चाहिए। यदि अतार्किक बोली निजी क्षेत्र की समस्या है तो बैंक गारंटी का मनमाना नकदीकरण तथा काली सूची में डालने की धमकी सरकारी एजेंसियों का चलन है। इन दोनों क्षेत्रों में स्वीकार्य व्यवहार को लेकर दिशानिर्देश जरूरी हैं।

एक अन्य अहम कारक यह है कि बोली प्रक्रिया में तय समय सीमा के पालन को लेकर कोई जवाबदेही नहीं है। इस प्रक्रिया को कई बार टालने से बोली लगाने वाले हताश होते हैं और बोली की लागत बढ़ती है। बोली की प्रक्रिया की निष्पक्षता को बचाया जाना चाहिए और काम पूरा होने की तय समय सीमा होनी चाहिए।

इसके अलावा मौजूदा कार्य अनुबंध दस्तावेज में उल्लिखित मूल्य वृद्धि फॉर्मूला निर्माण सामग्री की कीमतों में समय-समय पर होने वाले इजाफे के लिए अनुकूल नहीं है और इस समस्या को हल करने की आवश्यकता है। सरकारी परियोजनाओं को पूरा कर रहे ठेकेदारों की समस्या अक्सर सामने आती है। स्वतंत्र इंजीनियर एक अहम आवश्यकता हैं जिस पर ध्यान देना चाहिए। वे प्रगति, गुणवत्ता और व्यय की निगरानी कर सकते हैं। मौजूदा प्रणाली में ठेकेदार उन्हें भुगतान करता है। यह सही नहीं है। सरकारी खरीद एजेंसी को उन्हें सीधे नियुक्त करना चाहिए और वेतन देना चाहिए। कई देशों में सरकारी खरीद के लिए स्विस चैलेंज प्रारूप इस्तेमाल किया जाता है जहां सरकारी अधिकारी किसी गैर मानक सार्वजनिक परियोजना के लिए अनपेक्षित बोली का प्रसंस्करण करते हैं। स्विस नीलामी वह प्रक्रिया है जहां सरकारी खरीद प्राधिकार आगे बढ़कर उन उपक्रमों से बेहतर बोली को आमंत्रित करता है जिन्होंने नीलामी में हिस्सा नहीं लिया। भारत में ऐसे दोनों हालात बन रहे हैं और एक स्वीकार्य नीतिगत ढांचे की आवश्यकता है।

मौजूदा अधिसूचना की सबसे अहम बात यह है कि इसके प्रावधान अब भारत सरकार के आम वित्तीय नियमन का हिस्सा हैं। यानी अब इनका उल्लंघन करने पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षा तथा केंद्रीय सतर्कता आयोग का सामना करना होगा। अनुमान है कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षा की लेखा प्रक्रिया जरूरी अनुपालन लाएगी लेकिन यह लंबी प्रक्रिया है। तात्कालिक प्रभाव के लिए जरूरी है कि नीति अनुपालन प्रतिकूल व्यवहार तथा खामियों के जरिये प्रावधानों को धता बताने की कोशिश के लिए परिणाम प्रबंधन की प्रक्रिया स्थापित करे।

यदि इन बातों को हल किया जा सके तो देश में सरकारी खरीद में ऐतिहासिक बदलाव आएगा।

Keyword: सरकारी खरीद नीति, अधिसूचना, परियोजना प्रबंधन, दिशानिर्देश, ऑनलाइन ई-बिल व्यवस्था,
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