बिजनेस स्टैंडर्ड - क्या बाजार नियामकों को दिया जाना चाहिए संवैधानिक दर्जा?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, May 26, 2022 04:29 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

क्या बाजार नियामकों को दिया जाना चाहिए संवैधानिक दर्जा?

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  03 01, 2022

नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) में हुआ घटनाक्रम इन दिनों समाचार माध्यम में सुर्खियों में रहा है। एनएसई में जो हुआ क्या वित्त मंत्री और उनके आगे-पीछे घूमने वाले अधिकारियों को उसकी जरा भी भनक नहीं थी? यह एक ऐसा प्रश्न है जो कोई नहीं पूछ रहा है।

एक और बड़ा सवाल भी जेहन में उठना स्वाभाविक है। क्या भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) का व्यवहार उस दरबान की तरह हो सकता है जो सुरक्षा एवं आते-जाते लोगों पर नजर रखने के बजाय एक खिदमदगार बनकर रह जाता है? क्या भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) बैंकों पर निगरानी रखने में विफल रहने का जोखिम मोल ले सकता है? क्या भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) पक्षपात करने के लिए किसी भी सीमा को पार कर सकता है?

ऐसे कई मौके आए हैं जब विभिन्न नियामक अपने कत्र्तव्यों को दरकिनार कर मंत्री को प्रसन्न रखने में कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते हैं। एक कटु सत्य यह है कि भारतीय नियामक एक तरह से सरकार की हाथों की कठपुतली बन कर रह गए हैं और वे वही करते हैं जो उन्हें सरकार में बैठे लोग करने के निर्देश देते हैं। नियामक अपना महत्त्व एवं कत्र्तव्य भूल चुके हैं या उनका निर्वाह समुचित ढंग से नहीं कर पा रहे हैं। जो नियामक संबंधित क्षेत्र के मंत्रियों की बातों पर सहमति नहीं जताते हैं उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है।

वजह जो भी हो मगर समस्या सदैव नियामकों के स्तरों पर नहीं होती है और काफी हद तक ढांचागत खामियां जिम्मेदार हैं। नियामक एक सीमा तक ही मंत्रालय के निर्देशों पर प्रतिरोध जता सकते हैं। अगर मंत्री की कृपा दृष्टि पाने की सदैव चाहत रखने वाले संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी किसी नियामक को सरकार के साथ सहयोग करने या फिर पीछे हटने के लिए कहते हैं तो वे किसी न किसी रूप में अपने ऊपर बैठे लेागों की सहमति से ही ऐसा कर पाते हैं।

भारत को इन ढांचागत खामियों को दूर करना होगा। इसके लिए मंत्री और नियामक के बीच के संबंधों में तारतम्यता लानी होगी। नियामकों को मंत्रालय के अधीनस्थ काम करने वाले विभागों की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। भारत में इस समन्वय का इसलिए अभाव दिखता है क्योंकि दुनिया के दूसरे देशों से इतर भारत में तीन तरह के नियामक हैं। सबसे ऊपर वे नियामक हैं जिनकी स्थापना भारतीय संविधान के प्रावधानों के तहत की गई है। इसके बाद वे नियमाक आते हैं जिनकी स्थापना देश की संसद ने की है। तीसरे स्तर पर वे नियामकीय संस्थाएं आती हैं जिनका सृजन मंत्रालयों के द्वारा किया गया है। दूसरे और तीसरे स्तरों के नियामक सरकार एवं संबंधित मंत्री के अधीन रह कर काम करते हैं। इसके जो नतीजे होते हैं वे किसी से छुपे नहींं हैं। ऐसे घोटाले आते हैं जिनमें कठपुतली बन बैठीं नियामक संस्थाएं और इन्हें नचाने वाले सरकार में बैठे मंत्री एवं लोग कभी नहीं पकड़े जाते हैं। वास्तव में ऐसा ढांचा तैयार कर लिया गया है जिनमें जवाबदेही से लोग आसानी से मुंह मोड़ सकते हैं।

मेरेे विचार से नरेंद्र मोदी सरकार को नियमन के दृष्टिकोण से संबंधित दो बड़े बदलावों पर काम करना चाहिए। सरकार के पास ऐसा करने का अवसर भी मौजूद है। पहली बात, सभी नियामकीय इकाइयों को चुनाव आयोग, उच्चतम न्यायालय और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) आदि की तरह संवैधानिक सस्थाओं में तब्दील किया जाना चाहिए। ऐसा करने से वे मंत्री के नियंत्रण से मुक्त हो जाएंगे और उनकी वित्तीय जरूरतें भारत की संचित निधि से पूरी होंगी। इस तरह बजट के माध्यम से रकम के आवंटन पर उनकी निर्भरता कम हो जाएगी।

दूसरी बात यह कि इन सभी नियामक एजेंसियों के प्रमुखों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया जाना चाहिए। इसका कारण भी स्पष्ट है। मेरा इशारा मौजूदा अधिकारों के बंटवारे में असंतुलन की तरफ है। देश में इस्पात एवं उर्वरक से लेकर खाद्य प्रसंस्करण के लिए भी नियुक्त किए गए हैं। वे महज उत्पादन एवं निवेश का नियमन करते हैं। इसके बावजूद उन्हें कैबिनेट स्तर के मंत्री का दर्जा दिया गया है मगर पूरे बाजार को नियंत्रित करने वाली एजेंसियों के प्रमुखों को ऐसा सम्मान नहीं दिया जाता है। इस दिशा में कदम उठाने के बाद सरकार और नियामक के बीच मालिक एवं अनुसेवक जैसा संबंध खत्म हो जाएगा। संक्षेप में कहें तो इस पूरी व्यवस्था में अधिकारों के मनमाने इस्तेमाल की परिपाटी समाप्त कर दी जानी चाहिए क्योंकि हमारी प्रणाली में कोई व्यक्ति या संस्था पूर्ण स्वतंत्रता पाकर मनमाना व्यवहार कर सकते हैं।

संंविधान में अधिकारों का दुरुपयोग रोकने या इसे कम से कम करने के लिए व्यापक प्रावधान किए गए हैं। जरा कल्पना करें अगर आरबीआई, सेबी और अन्य नियामक संसद के बजाय मंत्री, सचिव या यहां तक कि संयुक्त सचिव की हामी के लिए इंतजार करते रहेंगे तो वे अपने कत्र्तव्यों का निर्वाह कैसे कर पाएंगे? वर्ष 2014 से मोदी सरकार ने कई संरचनात्मक सुधार करने के प्रयास किए हैं। सरकार कुछ सुधारों को सफलतापूर्वक अंजाम दे पाई है जबकि कुछ प्रयास विफल भी हुए हैं।

अब पुरानी व्यवस्थाएं लाभ से अधिक नुकसान का कारण बनती जा रही हैं क्योंकि इनका इस्तेमाल करने वाले लोग त्रुटियों का फायदा उठाने में हमेशा आगे रहते हैं। वे जब राजनीतिक एवं प्रशासनिक अधिकार रखने वाले लोगों से हाथ मिला लेते हैं तो उन्हें रोकना और मुश्किल हो जाता है। अगर उन्हें रोका भी जाता है तो भी उन्हें दंड नहीं दिया जाता है।

पूरे विश्वास के साथ तो नहीं कहा जा सकता कि नियामकों को संवैधानिक पद देने से नियमन से जुड़ी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। मगर जैसा कि हमने दूसरे संवैधानिक संस्थानों के मामले में देखा है यह व्यवस्था उतनी खराब नहीं होगी जितनी मौजूदा परिपाटी है। यह काफी प्रभावी साबित होगा क्योंकि नियामक संस्थाएं सरकार के दबाव से जितनी दूर रहेंगी वे उतने ही बेहतर ढंग से अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह कर पाएंगी।

Keyword: संवैधानिक दर्जा, एनएसई, सेबी, आरबीआई, ट्राई, पक्षपात, नियामक, संविधान,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या सरकार को उधारी लक्ष्य बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.