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नए गन्ना आदेश की बैंक कर रहे आलोचना

रुचिका चित्रवंशी और संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली February 24, 2022

प्रतिस्पर्धी कानूनों द्वारा ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया कानून को दरकिनार करने का एक और उदाहरण बनकर आया है उत्तर प्रदेश सरकार का गन्ना संशोधन अधिनियम। इस कानून की बैंकों और ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) पर नजर रखने वालों ने आलोचना शुरू कर दी है। ऐसा इसलिए है कि इस कानून में सरकार को कंपनियों से किसानों का गन्ना भुगतान बकाया वसूलने के लिए उनकी या वहां स्थापित उनकी सहायक कंपनियों की संपत्तियों को जब्त करने या प्राप्तियों का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है।

यूपी गन्ना (आपूर्ति और खरीद का विनियमन) द्वितीय संशोधन अधिनियम, 2021 नाम से लाए गए इस विधेयक में राज्य सरकार को चीनी विनिर्माता कंपनी की किसी सहायक कंपनी या सहायक का राज्य सरकार पर या उसके किसी निगम पर बकाया, ऋण या निवेश को जब्त करने का अधिकार दिया गया है जिससे किसानों के गन्ना बकाये का भुगतान किया जाएगा।      

विशेषज्ञों के मुताबिक आदेश का तत्काल असर बजाज ग्रुप के मामले में हुआ है। राज्य सरकार को बजाज ग्रुप के ललितपुर पावर जनरेशन कंपनी को 1,000 करोड़ रुपये का भुगतान करना था जिसका इस्तेमाल उसने समूह की एक अन्य कंपनी बजाज हिंदुस्तान सुगर पर किसानों के 2,300 करोड़ रुपये के गन्ना बकाये का एक हिस्सा चुकाने के लिए किया है।

बजाज हिंदुस्तान सुगर यूपी में सबसे बड़ी चीनी विनिर्माण कंपनियों में से एक है। राज्य भर में उसकी कुल 14 से अधिक इकाइयां फैली हुई हैं। ललितपुर पावर भी समूह की अपनी कंपनी है जो सालाना 2,000 मेगावाट बिजली पैदा करती है जो पूरी तरह से यूपी पावर कॉर्पोरेशन के लिए होता है। विद्युत इकाई झांसी जिले के ललितपुर इलाके में स्थित है।

विभिन्न एजेंसियों से जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि 16 फरवरी, 2022 तक उत्तर प्रदेश में किसानों से खरीदे गए गन्ने के एवज में उन्हें 5,356 करोड़ रुपये का बकाया भुगतान किया जाना बाकी है। बकाये के एक बड़े हिस्से को बजाज हिंदुस्तान सुगर से जोड़ा जा सकता है।

 सूत्रों ने कहा कि बजाज पावर की ललितपुर पावर का राज्य निगम के साथ पुर्व निर्धारित दर से बिजली खरीद के लिए दीर्घकालीन बिजली खरीद समझौता (पीपीए) था। राज्य सरकार ने संशोधन कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल कर लंबित गन्ना बकाये के भुगतान के लिए कंपनी का अपने ऊपर बकाये की रकम के एक हिस्से को जब्त करने का निर्णय लिया था।

विभिन्न विशेषज्ञों का कहना है कि महत्त्वपूर्ण राज्य विधानसभा चुनावों से पहले यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया कि बड़ी चीनी मिलें गन्ने के बकाया भुगतान में तेजी लाएं। लेकिन इससे आईबीसी पर नजर रखने वालों की नाराजगी बढ़ गई। उनका कहना है किसी से भी पहले बकाया वसूलने का अधिकार बैंकों के पास है।

उम्मीद की जा रही है कि इस मामले में बैंकर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से संपर्क कर यह बात उठाएंगे कि यूपी के नए कानून से उनकी स्थिति कमतर हो गई है। साथ ही, अन्य राज्य भी इसे मिसाल के तौर पर लेकर समान प्रकार के प्रावधान कर सकते हैं।

आईबीसी विशेषज्ञ मानते हैं कि जैसे जैसे बैंक की गैर निष्पादित आस्तियों (एनपीए) में इजाफा होगा यह संशोधन बकाया वसूलने की उनकी क्षमता में बाधक बनेगा।

2019 में संहिता में किए गए एक संशोधन से स्पष्ट है कि समाधान योजना की एक बार मंजूरी मिलने के बाद यह केंद्र, राज्य सरकारों और स्थानीय प्राधिकरण के लिए बाध्यकारी होता है। 

Keyword: गन्ना आदेश, बैंक, आलोचना, प्रतिस्पर्धी कानून, ऋणशोधन अक्षमता, आईबीसी,
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