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विवेकपूर्ण सार्वजनिक व्यय प्रबंधन या मूल्य स्थिरता?

के पी कृष्णन /  February 23, 2022

निजी क्षेत्र के निवेश में सुधार की अनुपस्थिति के स्पष्ट प्रमाणों के बीच ताजा बजट में यह नीति अपनायी गई है कि महामारी के बाद के वृद्धि चक्र को सरकार के पूंजीगत व्यय के बल पर गति प्रदान की जाए। माना जा रहा है कि मध्यम अवधि में इसकी बदौलत निजी निवेश भी आएगा। इस बढ़े हुए सरकारी व्यय की फंडिंग एक बड़े सरकारी उधारी कार्यक्रम की मदद से की जाएगी जिसे सरकार के डेट प्रबंधक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा अंजाम दिया जाएगा।

क्या इस नीति में कुछ जोखिम निहित हैं? उन्हें कम कैसे किया जा सकता है?

आरबीआई की स्थापना सन 1934 में की गई थी। अपने समय के तमाम अन्य केंद्रीय बैंकों की तरह आजाद भारत के शुरुआती वर्षों में भी आरबीआई ने विकास परियोजनाओं के वित्त पोषण में अहम भूमिका निभाई। जब पंचवर्षीय योजना आरंभ हुई तो बतौर आंशिक भागीदार कई वित्तीय संस्थानों की स्थापना में इसकी भूमिका रही। समय बीतने के साथ वित्तीय बाजारों का विकास हुआ और हितों के टकराव को देखते हुए आरबीआई ने इनमें से कई काम त्याग दिए।

कई दशकों की सार्वजनिक बहस के बावजूद आखिरकार फरवरी 2015 में मौद्रिक नीति ढांचा समझौते पर हस्ताक्षर हुए और सितंबर 2016 में आरबीआई को कानूनन यह अधिकार दिया गया कि वह मूल्य स्थिरता बरकरार रखे तथा वृद्धि के लक्ष्य को भी ध्यान में रखे।

आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति को यह दायित्व सौंपा गया है कि वह मुद्रास्फीति को तय दायरे में रखने के लिए मानक नीतिगत दर तय करे।  2016-2021 के लिए इसका चार फीसदी का स्तर तय किया गया था जिसमें दो फीसदी ऊपर या नीचे की रियायत थी। इससे एक ओर जहां आरबीआई का संस्थागत लक्ष्य पूरा हो गया, वहीं सार्वजनिक ऋण के प्रबंधक की उसकी भूमिका को लेकर एक अन्य विवाद उत्पन्न होगा।

देश में सार्वजनिक ऋण प्रबंधन के डिजाइन में तीन मुद्दे प्रासंगिक हैं। ये हैं समावेशन, हितों का टकराव और वित्तीय नियंत्रण। एक व्यवस्थित ढांचे वाली ऋण प्रबंधन व्यवस्था में देसी-विदेशी हर प्रकार की देनदारी की सारी सूचनाओं को एक डेटाबेस में केंद्रीकृत कर दिया जाता है। हर प्रकार की सूचना का एकीकरण करने से ऋण प्रबंधन को लेकर बेहतर निर्णय लेना संभव होता है। फिलहाल सूचनाओं के बंटा हुआ होने से सटीक निर्णय लेने में दिक्कत होती है। ऐसे में अगर ऋण प्रबंधक ऐसा हो जो सारी सरकारी उधारी से निपटता हो और समूचे पोर्टफोलियो को समझता हो तो ऋण समन्वय और जोखिम प्रबंधन बेहतर होगा।

केंद्रीय बैंक के सार्वजनिक ऋण का प्रबंधन करने में कई दिक्कतें हैं जिनका आर्थिक और वित्तीय नीति पर नकारात्मक प्रभाव हो सकता है। पहली बात तो यह कि अल्पावधि की ब्याज दरें तय करने तथा सरकार के लिए बॉन्ड बेचने में हितों का गंभीर टकराव उत्पन्न होता है। यदि केंद्रीय बैंक प्रभावी ऋण प्रबंधक की भूमिका निभाना चाहता है तो वह बॉन्ड को ऊंची कीमत पर बेचने के प्रति झुकाव रखेगा और ब्याज दरों को कम रखेगा। इससे मौद्रिक नीति में मुद्रास्फीतिक पूर्वग्रह उत्पन्न होगा।

जहां केंद्रीय बैंक बैंकों का नियमन भी करता है और वहां भी हितों के टकराव की स्थिति है। यदि वह बॉन्ड बिक्री के अपने दायित्व को अच्छी तरह निभाने का प्रयास करता है तो केंद्रीय बैंक को यह प्रोत्साहन होता है कि वह बैंकों को कहे कि वे बड़ी मात्रा में बॉन्ड रखें। इस पूर्वग्रह की वजह से बैंकिंग नियमन और निगरानी में गड़बड़ी पैदा होती है और बैंकों में सरकारी बॉन्ड खरीदने की प्रवृत्ति बढ़ती है। खासतौर पर दीर्घावधि के सरकारी बॉन्ड। बड़ी तादाद में अंदरूनी स्तर पर खरीदारों की मौजूदगी सरकारी प्रतिभूतियों के क्षेत्र में गहन नकदीकृत बाजार की वृद्धि को प्रभावित करता है। इसका असर कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार पर पड़ता है। एक मानक सॉवरिन यील्ड कर्व की गैरमौजूदगी कॉर्पोरेट बॉन्ड के मूल्य निर्धारण को मुश्किल बनाती है। इसके अलावा जहां बैंक नाजुक स्थिति में हों और उनके पास ढेर सारे सरकारी बॉन्ड हों तो केंद्रीय बैंक बैंकिंग नियामक की अपनी भूमिका में दरें बढ़ाने का अनिच्छुक होता है क्योंकि इससे बैंकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

ऋण प्रबंधन को केंद्रीय बैंक से अलग करने से ये विवाद हल हो सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी यही बताता है कि इस अलगाव से कई अहम लाभ हैं। इस ढांचे में केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति पर ध्यान केंद्रित करता है और घरेलू कारोबारी चक्र को स्थिर करने के लिए अल्पावधि की ब्याज दरों को संशोधित करता है। ऋण प्रबंधन कार्यालय सरकार के लिए निवेश बैंकर के रूप में काम करता है, बॉन्ड की बिक्री करता है और बजट शाखा के साथ तालमेल में अन्य पोर्टफोलियो प्रबंधन संबंधी काम करता है।

इस संस्थागत डिजाइन पर चर्चा आज क्यों प्रासंगिक है? बजट के मुताबिक कुल सार्वजनिक उधारी जीडीपी के 11 फीसदी के बराबर रह सकती है। विशुद्ध संदर्भ में देखें तो आने वाले वित्त वर्ष में सरकार की सकल उधारी 14.2 लाख करोड़ रुपये रहेगी जो इस वर्ष के 10.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। सरकारी उधारी पहले ही जीडीपी के 90 फीसदी के स्तर पर है और वार्षिक ब्याज भुगतान जीडीपी के करीब 3.5 फीसदी के स्तर पर है। बकाया सरकारी प्रतिभूतियों का मौजूदा भंडार करीब 80 लाख करोड़ रुपये है तथा आरबीआई के पास इसका 17 फीसदी हिस्सा है। ऐसे में वह वित्तीय संस्थानों के बाद सरकारी प्रतिभूतियों का सबसे बड़ा धारक है।

खुदरा मुद्रास्फीति जनवरी 2022 में 6.01 फीसदी और दिसंबर 2021 में यह 5.66 फीसदी थी। बिना खाद्य एवं ईंधन के यह महंगाई और अधिक यानी 5.8 फीसदी है और थोक मूल्य सूचकांक में दो अंकों में वृद्धि जारी है। तारापोर समिति ने सन 1997 में ही अनुशंसा की थी और 2001 में आरबीआई बोर्ड तथा बाद में कई विशेषज्ञ समितियों ने यह दोहराया और फिर 2007 और 2015 के बजट भाषण में सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी की स्थापना की घोषणा की गई। 2015 के वित्त विधेयक ने विस्तृत सांविधिक प्रावधान किए। जब तत्कालीन आरबीआई गवर्नर ने सार्वजनिक रूप से इस कदम का विरोध किया तो तत्कालीन वित्त मंत्री ने कदम वापस ले लिया। बहरहाल, संसद में इस कदम वापसी की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री ने आरबीआई के ऋण प्रबंधन के काम और बाजार अधोसंरचना के काम को अलग-अलग करने का खाका बनाने का वादा किया। अब सरकार के लिए समय आ गया है कि वह संसद के समक्ष किए गए सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी के गठन के वादे को पूरा करे और आरबीआई को मूल्य स्थिरता का अपना धर्म निभाने दे।

(लेखक सीपीआर में मानद प्राध्यापक और पूर्व अफसरशाह हैं)

Keyword: सार्वजनिक व्यय प्रबंधन, मूल्य स्थिरता, मौद्रिक नीति, बजट, आरबीआई, जोखिम,
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