बिजनेस स?टैंडर?ड - निजीकरण पर रुख में बदलाव
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निजीकरण पर रुख में बदलाव

टी टी राम मोहन /  February 14, 2022

अपेक्षाकृत सहज लक्ष्यों को देखकर लगता है कि सरकार की आर्थिक नीति हकीकत के अधिक करीब हुई है और लक्ष्य तय करने में समझदारी दिखाई जा रही है। बता रहे हैं टी टी राम मोहन  
 
वर्ष 2022-23 के केंद्रीय बजट से यह संकेत निकलता है कि सरकार निजीकरण की दिशा में सतर्क तरीके से आगे बढ़ेगी। सुधार समर्थक इस बदलाव की आलोचना करते हुए कहेंगे कि यह सुधारों के लिए बहुत बड़ा झटका है। हालांकि यह एक ऐसा कदम है जो देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं को स्वीकार करता है। बजट में निजीकरण के लिए 65,000 करोड़ रुपये का अपेक्षाकृत सहज लक्ष्य रखा गया है। यह वित्त वर्ष 2021-22 के 1.75 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य से काफी कम है। वित्त वर्ष 2021-22 में 78,000 करोड़ रुपये हासिल होने की आशा है जिसमें से ज्यादातर राशि जीवन बीमा निगम के विनिवेश से आने की आशा है। यह राशि निजीकरण या स्वामित्व और नियंत्रण के हस्तांतरण से नहीं आएगी जबकि वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में इसी बात पर जोर दिया गया था और इसके लिए बजट की सराहना भी की गई थी। इस वर्ष के बजट में दो बैंकों या एक बीमा कंपनी के निजीकरण का कोई जिक्र नहीं है जबकि गत वर्ष इनका उल्लेख किया गया था।
 
निजीकरण को लेकर उत्साहित लोग इस वर्ष एयर इंडिया के सफल निजीकरण के बाद इसे एक गंभीर कमी के रूप में देखेंगे। वे इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि एयर इंडिया के निजीकरण की शुरुआत 2018 में हुई थी और इस प्रक्रिया को पूरा होने में चार वर्ष लगे। एयर इंडिया के निजीकरण की प्रक्रिया में विमानन कंपनी की जमीन और इमारत को एक विशेष उद्देेश्य से बनाई गई कंपनी को हस्तांतरित किया गया। सरकार ने एयर इंडिया के 61,000 करोड़ रुपये के कर्ज का 75 फीसदी खुद वहन करके एक अस्वाभाविक कदम उठाया। कर्मचारियों को गारंटी दी गई कि उन्हें कम से कम एक वर्ष तक काम से नहीं निकाला जाएगा। विमानन कंपनी को एक प्रतिष्ठित कारोबारी समूह टाटा को बेचा गया। अन्य सरकारी कंपनियों के निजीकरण के दौरान इस स्तर पर ध्यान देना न केवल बहुत समय खपाऊ होगा बल्कि ऐसा कर पाना लगभग नामुमकिन हो सकता है। सरकारी परिसंपत्तियों की बिक्री सरकार के निजीकरण पर जोर न देने के निर्णय से तीन बातें पता चलती हैं। पहली बात, भारत सरकार के पास बड़े पैमाने पर निजीकरण को पूरा करने की क्षमता नहीं है। दूसरा, सरकारी परिसंपत्तियों की बिक्री के मामले में ढिलाई बरतना राजनीतिक और आर्थिक दोनोंं संदर्भों में महंगा पड़ सकता था। तीसरी बात, निजीकरण को समग्र आर्थिक प्रदर्शन का मानक बनाने से कोई मदद नहीं मिलने वाली थी।
 
निजीकरण को सही तरीके से अंजाम देना एक ऐसी चुनौती है जिसे विकसित देश भी अच्छी तरह अंजाम नहीं दे सके हैं। निजीकरण का लक्ष्य है परिसंपत्तियों का किफायती इस्तेमाल करना। इरादा यह भी है कि सरकार समुचित राजस्व जुटा सके। इन दो लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सरकार को सही मूल्यांकन करना चाहिए। यह आसान नहीं है। बिक्री का समय सही होना चाहिए। यदि बाजार कमजोर हो तो परिसंपत्ति का कमतर मूल्यांकन होने की संभावना अधिक होती है। अक्सर कंपनियों को बिक्री के लिए सामने लाने के पहले एक हद तक पुनर्गठन करना होता है ताकि सही कीमत लग सके। इस दौरान कई बोलीकर्ता भी होने चाहिए।
 
यह सुनिश्चित करना तथा अन्य शर्तों को पूरा करते हुए नीलामी को सफलतापूर्वक अंजाम देना आसान काम नहीं है। दुनिया मेंं बहुत कम सरकारें ही सफलतापूर्वक ऐसा कर पाती हैं। एक सरकार के लिए सबसे बुरा यही हो सकता है कि वह इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कठिन लक्ष्य तय करे। जब ऐसा होता है तो निजीकरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है और विवाद खड़ा होना तय होता है। हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (एचजेडएल) की बिक्री हुए दो दशक से अधिक समय बीत चुका है। इतने लंबे अरसे के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो से कहा कि वह इससे संबंधित लेनदेन की जांच करे। एचजेडएल कोई बहुत महत्त्वपूर्ण सरकारी उपक्रम नहीं था। इसके बावजूद इसकी रणनीतिक बिक्री विवादों में आ गई। कल्पना कीजिए कि तब क्या होगा जब बड़े और अच्छी तरह संचालित सरकारी उपक्रमों के बारे में यह माना जाएगा कि उन्हें सस्ती दरों पर या गलत खरीदार को बेच दिया गया। 
 
यदि बड़ी और मुनाफे में चल रही सरकारी कंपनियों की बिक्री विवादित हो सकती है तो वहीं सरकारी बैंकों की बिक्री में अलग तरह की चुनौतियां हैं। हमेंं संभावित खरीदारों के बारे में स्पष्ट रहना होगा। देश में बड़े निजी बैंकों ने शाखाओं का तगड़ा जाल बिछा लिया है और विदेशी बैंक वित्तीय संकट के बाद अपने घरेलू बाजारों के लिए पैसा बचा रहे हैं। वे रिजर्व बैंक की इच्छा के अनुसार पूर्ण अनुषंगी बनाकर भी भारत नहीं आना चाहते। विदेशी संस्थागत निवेशकों के समूह को बैंक बेचने से उनमें संचालन की समस्या पैदा हो सकती है। ऐक्सिस बैंक का उदाहरण याद करें। सरकारी उपक्रमों की भूतपूर्व यूटीआई बैंक में अहम हिस्सेदारी थी कि तभी उसका बड़ा हिस्सा संस्थागत विदेशी निवेशकों को बेच दिया गया। ऐक्सिस बैंक में उनकी अहम हिस्सेदारी बरकरार है। 
 
एक बैंक की नाकामी से लाखों लोगों की बचत प्रभावित होती है। यदि ऐसी स्थिति बनती है तो संसद से लेकर प्रशासनिक मशीनरी तक उथलपुथल मचेगी और मीडिया में भी नकारात्मक प्रचार-प्रसार होना तय है। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो सरकार ने बैंकों के निजीकरण की दिशा में धीमी गति से आगे बढऩे का निर्णय लिया है। जानकारी के मुताबिक सरकारी 26 फीसदी हिस्सेदारी के साथ नियंत्रण अपने पास रखना चाहती है। वह संभावित खरीदारों के मानक के बारे में रिजर्व बैंक से मशविरा करेगी। इतनी समझदारी तो दिखानी ही चाहिए। 
 
सरकार के लिए यह भी उचित नहीं कि निजीकरण को आर्थिक प्रदर्शन का मानक बना दिया जाए। बजट से पहले के सप्ताहों में मीडिया ऐसी खबरें चलाता है कि  निजीकरण का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएगा। बजट के बाद एक बार फिर यही थीम दोहरायी जाती है। निजीकरण के मोर्चे पर नाकामी अन्य सभी सुधारों तथा पहलों को पीछे धकेल देती है। तत्काल यह घोषणा कर दी जाती है कि यह सरकार भी बड़े सुधारों के मोर्चे पर अनिच्छुक है। निजीकरण के लिए कमतर लक्ष्य तय करना समझदारी की बात है। बेहतर तो यह होगा कि कोई लक्ष्य ही तय न किया जाए और विनिवेश तथा निजीकरण से होने वाली प्राप्तियों को बजट में संतुलनकारी कारक के रूप में देखा जाए। सरकार ने महामारी के बाद व्यापक राजकोषीय व्यय की मांगों पर कान न देते हुए नकदी समर्थन पर ध्यान केंद्रित करके बेहतर किया। उसने लगातार विरोध के बाद कृषि कानूनों को वापस लेकर एक बार फिर साहस का प्रदर्शन किया। इसी तरह निजीकरण को लेकर यह नया रुख भी आर्थिक नीति में समझदारी का ही परिचायक है। 
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