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आरबीएल बैंक में पर्दे के पीछे की कहानी

बैंकिंग साख
तमाल बंद्योपाध्याय /  January 16, 2022

आरबीएल बैंक का कारोबार पिछले 11 वर्षों में तेजी से फला-फूला है। भारत में बैंक ऑफ अमेरिका के पूर्व प्रमुख विश्ववीर आहूजा के हाथों प्रबंधन की कमान जाने के बाद इस बैंक के कारोबार की चकाचौंध बढ़ गई। आहूजा के संपर्क बड़ी कंपनियों से थे जिसका सीधा लाभ आरबीएल को मिला। बैंक खुदरा ऋण -सूक्ष्म वित्त एवं क्रेडिट कार्ड- कारोबार में तेजी से चमक रहा था। इस बीच 27 दिसंबर को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एक विज्ञप्ति जारी कर कहा, 'आरबीएल बैंक से जुड़े घटनाक्रम को लेकर कई तरह की चर्चा हो रही है। मगर जमाकर्ताओं और संबंधित पक्षों को इनकी ओर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। बैंक की वित्तीय स्थिति स्थिर है।' 
 
आरबीआई का यह बयान तब आया था जब कुछ लोगों ने घबराहट में आरबीएल बैंक से रकम निकालनी शुरू कर दी थी। जब बैंक की वित्तीय हालत स्थिर थी तो क्यों जमाकर्ताओं ने रकम निकालनी शुरू कर दी और क्यों कुछ निवेशक इसके शेयर बेचने लगे थे? दरअसल बैंकिंग नियामक द्वारा बैंक में एक अतिरिक्त निदेशक की नियुक्ति और आहूजा के छह महीने के अवकाश पर जाने से खलबली मच गई। किसी निजी बैंक के निदेशक मंडल में ऐसी नियुक्ति का मतलब है कि आरबीआई की नजर में संबंधित बैंक को नियामकीय मामलों में मदद की जरूरत है। एक तरह से यह उस बैंक से विश्वास डगमगाने का संकेत है।
 
अंदरूनी बात
 
आरबीएल उपयुक्त जोखिम प्रबंधन और साख आकलन उपायों के बिना अपना कारोबार अंधाधुंध बढ़ाने की होड़ में शामिल हो गया था। इस वजह से वह आरबीआई की नजरों में आ गया। 2010 से बैंक के ऋण खाते करीब 1,100 करोड़ रुपये से बढ़कर 60,000 करोड़ रुपये हो गए थे और जमा आधार भी 1,600 करोड़ रुपये से बढ़कर 75,000 करोड़ रुपये पहुंच गया था। बैंक की पूंजी भी 350 करोड़ रुपये से बढ़कर 12,500 करोड़ रुपये हो गई। कुछ ऋणों का भुगतान रुकने और असुरक्षित ऋणों का आकार बढऩे से आरबीआई चिंतित हो उठा। आरबीएल बैंक अपेक्षाकृत छोटा बैंक है मगर क्रेडिट कार्ड जारी करने वाला वह भारत का पांचवां सबसे बड़ा बैंक है।
 
हालात भांपते हुए आहूजा ने बैंक की छवि सुधारने के लिए उपाय शुरू कर दिए थे मगर कोविड महामारी और येस बैंक के लगभग धराशायी होने के बाद परिस्थितियां बदलने लगीं। कोविड-19 महामारी की वजह से बैंक के ऋण कारोबार पर असर हुआ वहीं येस बैंक घटनाक्रम के बाद आरबीआई का रुख कड़ा हो गया। इससे भी बैंक का कारोबार प्रभावित हुआ। इस बीच, आरबीएल ने सूक्ष्म वित्त ऋण कारोबार की हिस्सेदारी अपने कुल ऋण खाते में घटाकर 8 प्रतिशत तक कर दी है। बैंक का क्रेडिट कार्ड कारोबार करीब 21 प्रतिशत है और निगमित ऋणों की हिस्सेदारी 47 प्रतिशत है। शेष 24 प्रतिशत हिस्सा विभिन्न सुरक्षित ऋणों का है। पिछले वर्ष बैंक के निदेशक मंडल ने आहूजा को तीन वर्षों का सेवा विस्तार दिया था मगर आरबीआई ने केवल एक वर्ष के लिए हामी भरी। आहूजा अपने पद पर आगे भी बने रहना चाहते थे। आरबीआई ने कुछ समय पहले ही एक पुराने निजी बैंक के सीईओ को तीन वर्षों का सेवा विस्तार दिया था। इससे आहूजा को लगा कि उनके मामले में भी नियामक ऐसा ही करेगा और वह जून 2025 तक अपने पद पर बने रह पाएंगे। किसी निजी बैंक का सीईओ अधिकतम 15 वर्षों तक अपने पद पर रह सकता है। आरबीएल बैंक ने आहूजा को सेवा विस्तार देने के लिए सारी तिकड़म लगा दीं। आरबीआई को यह पसंद नहीं आया। 
 
आहूजा का वर्तमान कार्यकाल खत्म होने से छह महीने पहले नियामक ने एक अतिरिक्त निदेशक की नियुक्ति कर दी ताकि बैंक नया सीईओ खोज सके और नियंत्रण हस्तांरण की प्रक्रिया बिना किसी व्यवधान के पूरी हो जाए। इससे नाराज होगर आहूजा अवकाश पर चले गए। वर्ष 2010 में जब आहूजा और उनकी टीम ने पूर्ववर्ती रत्नाकर बैंक लिमिटेड (वर्तमान में आरबीएल बैंक) की कमान संभाली तो उस वक्त भी आरबीआई ने नियंत्रण हस्तांतरण निर्बाध रूप से सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त निदेशक की नियुक्ति की थी। आहूजा के उत्तराधिकारी के समक्ष चुनौती बड़ी है मगर इससे निपटा जा सकता है। आरबीएल बैंक येस बैंक की तरह फर्जीवाड़े का शिकार नहीं है। यह जरूर है कि यह बैंक असीमित महत्त्वकांक्षा और तेजी से आगे बढऩे में कोई उपाय करने से चूकना नहीं चाहता है। इसका नेतृत्व एक ऐसे व्यक्ति के हाथ है जो कमान नहीं छोडऩा चाहता है। 
 
कारोबार बढ़ाने की मुहिम में बैंक का सकल एनपीए वित्त वर्ष 2022 की पहली छमाही में बढ़कर 5.40 प्रतिशत हो गया था और शुद्ध फंसा कर्ज 2.14 प्रतिशत हो गया। पुनर्गठित ऋण का आकार भी सितंबर 2020 के 0.09 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर 2021 में 3.35 प्रतिशत हो गया। हालांकि बैंक का बुरा दौर पीछे छूट चुका है और अब उम्मीद की जा सकती है कि कोई अस्थिर करने वाली घटना सामने नहीं आएगी। पिछले कुछ वर्षों में बैंक ने तकनीक, प्रक्रिया एवं ढांचागत प्रणाली तैयार करने में काफी निवेश किया है। इसकी कुल देनदारी में एक तिहाई से अधिक हिस्सेदारी कम ब्याज वाले बचत एवं चालू खातों की है। 
 
बैंक का प्रबंधन सबक ले चुका है। आरबीएल जब रत्नाकर बैंक था तो इसे 'एनएच 4' बैंक कहा जाता था क्योंकि इसका ज्यादातर कारोबार राष्टï्रीय राजमार्ग 4 के इर्द-गिर्द होता था। 12,235 किलोमीटर लंबा यह राजमार्ग देश में 10 सबसे अधिक आबादी वाले शहरों में से 4 को जोड़ता है। मगर आहूजा ने बैंक का कारोबार देश के दूसरे हिस्सों तक फैलाया और दूर-दराज भी नई शाखाएं खोलीं। बैंक के अगले सीईओ के की जिम्मेदारी पहले से तय है। उसे कारोबार बढ़ाने के साथ ही हरेक नियमों का पालन करते हुए आगे होगा।
 
(लेखक बिजनेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठï सलाहकार हैं।)
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