बिजनेस स्टैंडर्ड - कंपनियों की समृद्धि का दौर
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कंपनियों की समृद्धि का दौर

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  January 14, 2022

देश का कारोबारी क्षेत्र नाटकीय बदलाव का लुत्फ ले रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक का कॉर्पोरेट वित्त संबंधी अध्ययन दिखाता है कि वित्तीय क्षेत्र की कंपनियों को छोड़कर करीब 2,600 से अधिक सूचीबद्ध निजी कंपनियों ने इस वर्ष की पहली छमाही में ही इतना लाभ अर्जित कर लिया है जो पिछले वर्ष के उनके कुल लाभ का 80 प्रतिशत है। यदि इस वर्ष की दूसरी छमाही में मुनाफे में होने वाली वृद्धि कमजोर भी पड़ जाती है तो भी आरबीआई के इस नमूने का वर्ष 2021-22 का कुल मुनाफा 60 फीसदी तक रह सकता है। 2020-21 में  भी मुनाफा करीब दोगुना बढ़ा था क्योंकि उससे पिछले वर्ष भारी गिरावट देखने को मिली थी।

हालांकि यह बात भी सही है कि कॉर्पोरेट क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आरबीआई के तय नमूनों से बाहर है: उदाहरण के लिए बड़ी गैर सूचीबद्ध कंपनियां (मसलन हुंडई, कोक और पेप्सी,आईबीएम और एक्सेंचर) तथा बैंक और सार्वजनिक क्षेत्र की अव्वल कंपनियां (इंडियन ऑयल, ओएनजीसी, कोल इंडिया आदि)। सरकारी बैंकों समेत तमाम बैंकों का प्रदर्शन पहले से बेहतर है और ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि गैर सूचीबद्ध कंपनियों का प्रदर्शन सूचीबद्ध कंपनियों से अलग रहता। मुनाफे में वृद्धि में कमी सार्वजनिक क्षेत्र के गैर बैंकिंग उपक्रमों की बदौलत आएगी। इस बात को मान लिया जाए और छोटे तथा कुछ मझोले उपक्रमों के कमजोर प्रदर्शन को ध्यान में रखा जाए तो भी आशा करनी चाहिए कि इस वर्ष मुनाफे में इजाफा होगा।

इस खबर के साथ कुछ अन्य अच्छी खबर भी हैं। मसलन आरबीआई के नमूने में शामिल कंपनियों के बिक्री राजस्व में भी अच्छी वृद्धि हुई है। जुलाई-सितंबर तिमाही में इनमें पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 30 फीसदी की वृद्धि हुई है। ब्याज भुगतान में स्थिरता ने भी शुद्ध मुनाफा मार्जिन में इजाफा किया है। जैसा कि बिजऩेस स्टैंडर्ड ने प्रकाशित भी किया था, कॉर्पोरेट डेट-इक्विटी अनुपात छह वर्षों के न्यूनतम स्तर पर है। इन आंकड़ों से कई बातें पता चलती हैं जिसमें शेयर बाजार की तेजी भी शामिल है जिसे व्यापक तौर पर अधिमूल्यित माना जा रहा है। शायद ऐसा है भी लेकिन मूल्य-आय अनुपात उस समय भ्रामक संकेतक हो सकता है जब आय बढ़ रही हो।

इस प्रदर्शन के बारे में उल्लेखनीय बात यह है कि ऐसा क्षमता के कम इस्तेमाल के बावजूद तथा कई क्षेत्रों में मंदी के हालात के बावजूद हुआ है। उत्पादन में ऐसा अंतर बताता है कि बिना क्षमता में नया निवेश किए भी बिक्री बढ़ाने की गुंजाइश मौजूद है। ऐसे में नए कर्ज की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसमें ब्याज के रूप में अतिरिक्त लागत चुकानी होगी। यानी बिक्री बढऩे पर मार्जिन और सुधर सकता है।

सरकार के राजस्व के लिए भी इसके अपने निहितार्थ हैं। एक वर्ष पहले अपने बजट में वित्त मंत्री ने अनुमान जताया था कि वर्ष 2021-22 में कॉर्पोरेशन कर से 5.47 लाख करोड़ रुपये की राशि एकत्रित होगी। यह राशि कोविड प्रभावित 2020-21 में जुटाई गई 4.46 लाख करोड़ रुपये की राशि से 22.6 फीसदी अधिक थी। परंतु यह दो वर्ष पहले यानी 2019-20 और 2018-19 में संग्रहित राजस्व की तुलना में कम थी। दो बार कम राजस्व हासिल होने के कारण वित्त मंत्री ने अपने अनुमान में सतर्कता बरती थी।

यदि आरबीआई की ओर से वर्ष की पहली छमाही में अर्जित हुए कॉर्पोरेट मुनाफे को पूरे वर्ष में रूपांतरित किया जाए तो यह राशि 2018-19 के स्तर से दोगुनी हो सकती है। उस वर्ष 6.64 लाख करोड़ रुपये मूल्य का कॉर्पोरेशन कर एकत्रित हुआ था। यदि इस वर्ष का उच्च मुनाफा कॉर्पोरेशन कर राजस्व को उस उच्चतम स्तर से ऊपर नहीं ले जा पाता और बजट अनुमान को पीछे नहीं छोड़ देता तो कॉर्पोरेशन कर के साथ कुछ न कुछ गड़बड़ है।

कॉर्पोरेशन कर दरों में हालिया बदलाव जिनकी घोषणा पिछले दोनों कार्यकाल में मोदी सरकार ने चरणबद्ध ढंग से की है, उन्हें राजस्व निरपेक्ष होना था। कम दरों के मद्देनजर रियायतों को समाप्त किया जाना था ताकि प्रभावी कर दर और असमायोजित कर दर में ज्यादा अंतर न रहे। सुधार की यह कोशिश समझदारी भरी थी: अन्य बातों के अलावा इसने असमायोजित कर दरों को अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के करीब लाने में मदद की। बजट के दिन इस सवाल का जवाब देना होगा कि ये बदलाव राजस्व निरपेक्ष थे भी या नहीं। इसलिए क्योंकि वस्तु एवं सेवा कर दरों को भी राजस्व निरपेक्ष होना था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यदि कॉर्पोरेशन कर के साथ भी ऐसा ही हुआ तो वित्त मंत्री को यह तय करना होगा कि किन कर रियायतों को लक्षित करना है।

Keyword: रिजर्व बैंक, अध्ययन, कॉर्पोरेट क्षेत्र, गैर सूचीबद्ध कंपनियां, बैंक, बिक्री राजस्व,
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