बिजनेस स्टैंडर्ड - कितनी वास्तविक है जीएसटी में वृद्धि?
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कितनी वास्तविक है जीएसटी में वृद्धि?

ए के भट्टाचार्य /  January 13, 2022

मोदी सरकार हाल के महीनों में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में सुधार को लेकर उत्साहित है। केंद्र सरकार के अन्य करों के संग्रह में वृद्धि के साथ-साथ जीएसटी संग्रह भी गत जुलाई से हर महीने एक लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर गया है। मई और जून माह में जब कोविड-19 की दूसरी लहर ने आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया था, उन्हें छोड़ दिया जाए तो बीते 15 महीनों से जीएसटी का मासिक संग्रह एक लाख करोड़ रुपये से ऊपर है।

अक्टूबर से दिसंबर तक लगातार तीन महीनों में यह 1.3 लाख करोड़ रुपये से ऊपर रहा जो 2020 के समान महीनों से 13 से 26 फीसदी तक अधिक था। 2019 के समान महीनों से तुलना करें तो अक्टूबर से दिसंबर के बीच जीएसटी संग्रह 26 से 37 फीसदी के बीच बढ़ा।

कोविड के कारण उच्च व्यय प्रतिबद्धताओं से जूझ रहे सरकारी वित्त को राजस्व के मोर्चे पर जरूरी मदद मिली है। 2021-22 में विनिवेश प्राप्तियों में कमी से जूझ रही सरकार के लिए जीएसटी संग्रह में इजाफा एक ऐसी अर्थव्यवस्था का संकेत है जो वापसी कर रही है।

यह धारणा कितनी सही है? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए यह जरूरी है कि हम हालिया महीनों में जीएसटी संग्रह में वृद्धि की प्रकृति को समझें।  यह चिह्नित करें कि किन कारकों ने इस वृद्धि में योगदान किया होगा और क्या ये आने वाले महीनों में इसे जारी रखने में मदद कर सकते हैं।

पहले नजर डालते हैं बीते तीन वर्षों के सालाना जीडीपी संग्रह पर। वर्ष 2018-19 में कुल मिलाकर 11.75 लाख करोड़ रुपये का संग्रह होने का अनुमान था जो सकल घरेलू उत्पाद का 6.22 फीसदी था। औसत मासिक संग्रह 0.92 लाख करोड़ रुपये था। जुलाई 2017 में जीएसटी के आगमन के बाद नौ महीनों में औसत मासिक संग्रह 0.9 लाख करोड़ रुपये था।

कोविड-19 ने 2019-20 की आर्थिक गतिविधि पर अधिक असर नहीं डाला क्योंकि लॉकडाउन मार्च 2020 के अंतिम सप्ताह में लगा। महामारी के पहले वाले वर्ष में जीएसटी संग्रह के 12.2 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया था, यानी एक लाख करोड़ रुपये प्रति माह। परंतु 2019-20 में जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी घटकर 6 फीसदी रह गई।

वर्ष 2020-21 में प्रदर्शन और बुरा रहा। आर्थिक लॉकडाउन के कारण कुल जीएसटी संग्रह घटकर 11.35 लाख करोड़ रुपये रह गया, यानी औसतन 0.94 लाख करोड़ रुपये प्रति माह। जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी घटकर 5.75 फीसदी रह गई।

2021-22 के पहले नौ महीनों में कुल जीएसटी संग्रह के 10.68 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान था, यानी प्रति माह औसतन 1.2 लाख करोड़ रुपये। देश में कोविड की तीसरी लहर आ चुकी है और लगता नहीं कि बचे हुए तीन महीनों में जीएसटी संग्रह पिछले नौ महीनों के औसत को पार करेगा। ऐसे में पूरे वर्ष का संग्रह 14.28 लाख करोड़ रुपये रह सकता है यानी जीडीपी के आकार का करीब 6.1 फीसदी।

स्पष्ट है कि जीडीपी में जीएसटी संग्रह की हिस्सेदारी बहुत उत्साहित होने की वजह नहीं है। यह 2018-19 के 6.22 फीसदी के बाद लगातार दो वर्ष गिरी और 2021-22 में इसके बढ़कर 6.1 फीसदी होने का अनुमान है। जीडीपी और जीएसटी का अनुपात इसका संकेत देते हैं कि कर राजस्व और आर्थिक वृद्धि के बीच कैसा तालमेल है। उस लिहाज से भी कोई खुश होने की बात नहीं है।

बीते वर्षों में जीएसटी प्रदर्शन को एक और तरह से देखा जा सकता है। जीएसटी संग्रह प्रमुख रूप से चार श्रेणियों में होता है: केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी), राज्य जीएसटी (एसजीएसटी), एकीकृत जीएसटी (आईजीएसटी) और क्षतिपूर्ति उपकर। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र के संग्रह में वृद्धि के लिए विशेष प्रशासनिक एवं नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।

सन  2018-19 में सीजीएसटी के अधीन हर माह औसतन 17,000 करोड़ रुपये का संग्रह होता था। 2021-22 के पहले नौ महीनों में यह करीब 29 फीसदी बढ़ कर औसतन प्रतिमाह 22,000 करोड़ रुपये रहा। हालांकि इसी अवधि में एसजीएसटी की वृद्धि केवल 22 फीसदी रही और औसत मासिक संग्रह 23,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 28,000 करोड़ रुपये तक पहुंचा। एसजीएसटी का संग्रह राज्य सरकार करती हैं जबकि सीजीएसटी का केंद्र सरकार। एसजीएसटी में धीमी वृद्धि में कर संग्रह प्रणाली का किफायती न होना नजर आता है। कई राज्य इससे जूझ रहे हो सकते हैं। कर प्रशासन को इस पर ध्यान देना चाहिए।

अंतरराज्यीय आपूर्ति के लिए जुटाए जाने वाले आईजीएसटी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा। 2018-19 और 2021-22 के बीच इसका मासिक औसत केवल 19 फीसदी सुधरा और 26,000 करोड़ रुपये प्रति माह के औसत से बढ़कर 31,000 करोड़ रुपये प्रति माह हुआ। यहां समस्या संग्रहण व्यवस्था से संबद्ध नहीं दिख रही है। आईजीएसटी का संग्रह केंद्र करता है। ऐसे में अंतरराज्यीय आपूर्तियों में आईजीएसटी संग्रह कम क्यों है? इसके विपरीत समान अवधि में आयात के आईजीएसटी में 25 फीसदी इजाफा हुआ और यह 24,000 करोड़ रुपये मासिक से बढ़कर 30,000 करोड़ रुपये प्रति माह हो गया। इससे एक बड़ा सवाल  उठता है कि कैसे आयात का आईजीएसटी जीएसटी का सबसे बड़ा घटक बन गया। कम से कम अक्टूबर से दिसंबर 2021 तक तीन महीनों में तो ऐसा ही हुआ।

अक्टूबर से दिसंबर 2021 के बीच सीजीएसटी, एसजीएसटी और आईजीएसटी में या तो कमी आई या वे स्थिर रहे जबकि आयात के आईजीएसटी में सुधार दिखा। शायद भारत के आयात में इजाफे ने जीएसटी संग्रह में वृद्धि में योगदान किया है, खासकर 2021-22 की तीसरी तिमाही में। आयात पर कर संग्रह को सहज बनाने की व्यवस्था ने भी उच्च वृद्धि में योगदान किया।

क्षतिपूर्ति उपकर की बात करें तो बीते तीन वर्षों में इसका औसत मासिक संग्रह 8,000 करोड़ रुपये और 9,000 करोड़ रुपये के बीच रहा है। उपकर जुलाई 2017 से पांच वर्ष की तय अवधि के लिए लगाया गया था ताकि राज्यों को जीएसटी के बाद हो रही राजस्व हानि की भरपाई की जा सके। अब राज्यों ने मांग की है कि जून 2022 के बाद पांच वर्ष तक इसे जारी रखा जाए। राज्यों के राजकोषीय दबाव को देखते हुए केंद्र इस मांग की अनदेखी नहीं कर सकता। हालांकि इसके संग्रहण में ठहराव भी एक पहेली है।

परंतु जीएसटी संग्रह का व्यापक रुझान आपको चौंका सकता है कि क्या देश के सबसे बड़े अप्रत्यक्ष कर सुधार ने वास्तव में राजस्व में सुधार किया है? वर्ष 2021-22 में जीएसटी संग्रह का आंकड़ा अभी भी तीन वर्ष पहले के स्तर से कम है ऐसे में ये प्रश्न उठेंगे कि मौजूदा प्रशासन फर्जी बिलों आदि के मामले में कितना सचेत है। इससे भी अहम बात यह है जीएसटी परिषद अब कर दरों में को दो तीन स्लैब में एकीकृत करने के बहुप्रतीक्षित सुधारों को और नहीं टाल सकती। ऐसा करने से कुछ चीजों की दरें बढ़ेंगी। मोदी सरकार ने सीमा शुल्क के अलावा अब तक कर दरें बढ़ाने की अनिच्छा ही जताई है। अब वक्त आ गया है कि जीएसटी दरों को तार्किक बनाने पर काम किया जाए ताकि प्रभावी दर में बढ़ोतरी हासिल की जा सके।



Keyword: जीएसटी वृद्धि, आईजीएसटी, राजस्व, वस्तु एवं सेवा कर संग्रह,
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