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दिसंबर 2021 में उपभोक्ताओं की धारणा हुई कमजोर

श्रम-रोजगार
महेश व्यास /  January 13, 2022

दिसंबर 2021 में उपभोक्ताओं की धारणा मजबूत होने का सिलसिला थम गया। दिसंबर से पहले लगातार पांच महीनों से उपभोक्ताओं का मिजाज मापने वाला सूचकांक लगातार चढ़ता जा रहा था। मगर दिसंबर में उपभोक्ता धारणा सूचकांक 4.4 प्रतिशत फिसल गया। इसके साथ ही अक्टूबर और नवंबर में अर्जित बढ़त पर भी पानी फिर गया। इस सूचकांक में दिसंबर में अचानक आई गिरावट चिंता का विषय है। दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत भी सुधार की राह पर तेजी से चल रहा था। कोविड-19 से बचाव के लिए टीकाकरण अभियान जोर पकड़ चुका था। दिसंबर में अधिकांश समय ओमीक्रोन को लेकर दहशत का कोई माहौल नहीं था। सार्वजनिक परिवहन सेवाएं भी लगभग सामान्य हो गई थीं। यात्रा एवं पर्यटन क्षेत्र जोर पकड़ रहा था और सिनेमाघरों तक दर्शक भी आने शुरू हो गए थे। शादी-विवाह समारोह सहित राजनीतिक रैलियों में भीड़ जुटने लगी थी। स्कूल-कॉलेज भी खोलने की तैयारी शुरू हो गई थी।

दिसंबर में किसानों का एक साल से चला आ रहा आंदोलन भी समाप्त हो गया था। कोविड महामारी की वजह से 18 महीने तक थमने के बाद दुनिया फिर उत्साहित दिख रही थी। कुल मिलाकर माहौल खुशनुमा हो गया था। तो फिर दिसंबर में उपभोक्ताओं की धारणा क्यों कमजोर हुई? ऐसा लग रहा है कि केवल अमीर लोगों के चेहरे पर ही मुस्कान आई थी। दिसंबर में हालात सामान्य होने का जश्न आय अर्जित करने वाले पविारों ने मनाया था और बाकी लोगों के चेहरे सहमे हुए थे। सालाना 10 लाख रुपये से अधिक  कमाने वाले परिवारों के उपभोक्ता धारणा सूचकांक में 12.8 प्रतिशत की तेज उछाल आई थी। दूसरे आय वर्ग वाले लोगों की धारणा कमजोर हुई थी या यह लगभग शिथिल पड़ गई। टीकाकरण की तेज गति और यात्रा, परिवहन, होटल, सिनेमाघरों आदि पर प्रतिबंधों में ढील दिए जाने से उच्च आय वर्ग वाले परिवार संभवत: अधिक उत्साहित हुए थे। दिसंबर 2021 में उपभोक्ताओं की धारणा 2019-20 के स्तर से 39 प्रतिशत कम थी। कुल मिलाकर दिसंबर 2021 में उपभोक्ता धारणा सूचकांक 2019-20 की तुलना में 45.5 प्रतिशत कम था।

सालाना 10 लाख रुपये से अधिक आय अर्जित करने वाले परिवारों की हिस्सेदारी देश के कुल भारतीय परिवारों में बहुत कम है। कोविड महामारी के दौरान यह अनुपात और कम हुआ है। वर्ष 2019-20 में कुल भारतीय परिवारों में ऐसे परिवारों की हिस्सेदारी 1.2 प्रतिशत थी। 2020-21 में यह हिस्सेदारी कम होकर 0.5 प्रतिशत रह गई। 2021-22 में इसमें थोड़ी तेजी जरूर आई होगी मगर उनकी हिस्सेदारी शायद ही 0.6 प्रतिशत (20 लाख परिवार) से अधिक रही होगी।

उपभोक्ता व्यय में उनकी हिस्सेदारी जरूर अधिक है और बचत में भी वे काफी आगे हैं। दिसंबर 2021 में देश में निम्रतम आय वर्ग वाले परिवारों के उपभोक्ता सूचकांक में सबसे अधिक कमी आई। ये ऐसे परिवार हैं जिनकी सालाना कमाई 1 लाख रुपये या इससे कम है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसे परिवारों के उपभोक्ता सूचकांक में दिसंबर में किस वजह से 20.7 प्रतिशत की गिरावट आई। सूचकांक में आम तौर पर हरेक महीने आने वाली गिरावट की तुलना में भारी अनिश्चितता दिखी है। एक बात तो तय है कि यह समूह आर्थिक परिदृश्य में सुधार की संभावना को लेकर सबसे कम उत्साहित दिख रहा है। इस वर्ग की धारणा दिसंबर 2021 में 2019-20 की तुलना में 51.7 प्रतिशत कम रही थी। इस समूह की खास अहमियत इसलिए है कि 2020-21 में इन परिवारों की संख्या बढ़कर 17 प्रतिशत हो गई थी जो 2019-20 में केवल 10 प्रतिशत थी। कोविड महामारी का इस समूह पर सर्वाधिक असर हुआ था। इस असर से यह समूह अब तक नहीं उबर पाया है।

सालाना 1 लाख से 2 लाख रुपये आय अर्जित करने वाले परिवारों की संख्या 45 प्रतिशत से थोड़ी ही कम है। कोविड महामारी की वजह से ऐसे परिवारों की संख्या में कोई खासा इजाफा नहीं हुआ है। 1 लाख रुपये से अधिक कमाने वाले परिवारों की संख्या तो बढ़ी है मगर 1 लाख से 2 लाख रुपये अर्जित करने वाले कई परिवार फिसल कर 1 लाख रुपये या इससे कम आय कमाने वाले परिवारों के समूह में आ गए। 2 लाख रुपये से अधिक आय अर्जित करने वाले कई परिवार 1 लाख से 2 लाख रुपये अर्जित करने वाले समूह में आ गए। कुल मिलाकर आय में कमी आने के बाद भी 1 लाख से 2 लाख रुपये अर्जित करने वाले समूह के अनुपात पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। दिसंबर 2021 में इस समूह के उपभोक्ता धारणा सूचकांक में 7.6 प्रतिशत गिरावट आई। मई 2021 में कोविड की दूसरी लहर के बाद हालात सुस्त गति से ही सही मगर सुधर रहे थे मगर इस गिरावट ने यह निरंतरता तोड़ दी है। सालाना आय के लिहाज से कुल परिवारों में शीर्ष आधे परिवारों की धारणा मजबूत हुई थी मगर सबसे नीचे से ऊपर शेष आधे परिवारों की धारणा दिसंबर में कमजोर हुई। इन दोनों समूहों के बीच आने वाले समूह की धारणा में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई मगर कोई सुधार भी नजर नहीं आया। शीर्ष आधे और नीचे से आधे समूहों के बीच दो वर्ग आते हैं। सालाना 2 लाख से 5 लाख रुपये अर्जित करने वाले समूह की हिस्सेदारी देश के कुल परिवारों में एक तिहाई है। अक्टूबर 2021 के बाद इन समूह के लिए उपभोक्ता धारणा लगभग स्थिर हो गई है। दिसंबर 2021 में सूचकांक में 0.3 प्रतिशत का मामूली इजाफा हुआ। 2019-20 की तुलना में यह तब भी 44 प्रतिशत कम था। सालाना 5 लाख से 10 लाख रुपये कमाने वाले परिवारों की धारणा भी अक्टूबर 2021 के बाद सुस्त हो गई। इन परिवारों के लिए सूचकांक दिसंबर 2021 में 1.4 प्रतिशत कमजोर रहा। 2019-20 की तुलना में यह सूचकांक करीब 47 प्रतिशत कमजोर रहा। संक्षेप में कहें तो 0.5 प्रतिशत सर्वाधिक धनी परिवारों ने दिसंबर 2021 में आर्थिक गतिविधियों में तेजी का जश्न मनाया, वहीं सबसे नीचे से आधे परिवारों में बहुत उत्साह नहीं दिखा। ओमीक्रोन के दस्तक देने के बाद पूरे देश में जनवरी में धारणा और कमजोर हो सकती है। इससे कोविड-19 से बेहाल भारतीय अर्थव्यवस्था के सुधार की राह और कठिन हो सकती है।

Keyword: उपभोक्ता धारणा, श्रम, रोजगार, सिनेमाघर, शादी-विवाह समारोह,
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