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तीसरी लहर के लिए डॉक्टर नर्स कितने तैयार

अक्षरा श्रीवास्तव, रुचिका चित्रवंशी, सोहिनी दास और ईशिता आयान दत्त /  January 09, 2022

दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की ओर से पिछले सप्ताह की शुरुआत में अपने कर्मचारियों को यह संदेश दिया गया, 'सर्दियों की छुट्टियां रद्द की जा रही हैं, तुरंत ड्यूटी पर आ जाएं।' कोविड-19 की तीसरी लहर भारत में देखी जा रही है। पिछली बार की तरह और उससे पहले भी डॉक्टर और नर्स ही संक्रमितों के इलाज में सबसे आगे होंगे और इससे रात-दिन निपटेंगे। भारत में पहले ही आधिकारिक तौर पर ओमीक्रोन की वजह से होने वाली मौत देखी जा चुकी है और कोरोनावायरस का यह नया स्वरूप पहले के संस्करणों की तुलना में कहीं अधिक संक्रामक है और स्वास्थ्य सेवा से जुड़े लोग खुद को संक्रमण के अधिक मामलों से निपटने के लिए तैयार कर रहे हैं।

 
मैक्स हेल्थकेयर, दिल्ली के इंटरनल मेडिसन के निदेशक रोमेल टिक्कू कहते हैं, 'जिंदगी फिर से उसी जगह वापस आ गई है लेकिन उम्मीद है कि यह पिछले साल की तरह खराब नहीं होगा।' उनके जैसे डॉक्टरों की मांग फिर से बढ़ गई है। वह कहते हैं, 'हमारी सारी योजनाएं बिगड़ गई हैं। देर रात भी हम 1 बजे या 2 बजे तक सेवाएं दे रहे हैं लेकिन अभी तक कोई गंभीर मामला सामने नहीं आया है।' कोविड की दूसरी लहर की यादें अब भी डॉक्टरों के मन में ताजा हैं जब दिन बेहद थकाऊ और भावनात्मक रूप से पूरी कसर निकालने वाली पाली करीब 12 घंटे तक चला करती थी। उस वक्त खाने के लिए भी समय नहीं था और जब पीपीई (व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण) किट में लंबे समय तक रहने की वजह से उन्हें पानी तक नहीं पीने को मिलता था।
 
ओमीक्रोन का संक्रमण फैलने के बावजूद डॉक्टर उम्मीद कर रहे हैं कि पिछली लहर की तुलना में अस्पताल में भर्ती दरें कम रहेंगी। लेकिन कोई भी निश्चित रूप से यह नहीं जानता है कि आगे हालात कैसे रहेंगे। दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल के एक डॉक्टर का कहना है, 'हम जल्द ही महामारी के तीसरे वर्ष में प्रवेश करने वाले हैं और यह भावनात्मक रूप से काफी तनावपूर्ण रहा है और शारीरिक मेहनत काफी बढ़ गई, खासतौर पर उन जूनियर मेडिकल स्टाफ  के लिए जो कोविड के दौरान सेवाएं देने के लिए जुड़े थे।' नोएडा के कैलाश हेल्थकेयर की ग्रुप मेडिकल निदेशक ऋ तु वोहरा कहती हैं, 'निश्चित रूप से थकान का माहौल है और लोग निष्क्रियता का अनुभव कर रहे हैं। हमने पिछले हफ्ते से ओपीडी में मामले बढ़ते हुए देखा है लेकिन हमने लोगों को अस्पताल में भर्ती होते हुए नहीं देखा है। आने वाले सप्ताह में यह बढ़ सकता है। इस समय काम करने वालों की कमी नहीं है लेकिन बाद में हमें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।'
 
हालांकि, अस्पताल में भर्ती दरों में कमी के साथ भी काम बढ़ रहा है और पालियां लंबी हो रही हैं। संसाधनों की कमी और दूसरी लहर के दौरान मृत्यु दर अधिक रहने की वजह से लाचारी वाली भावनाएं बढ़ गईं और इससे भी डॉक्टरों और नर्सों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है। नई दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के एक जूनियर डॉक्टर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, 'कोविड की दूसरी लहर जब चरम पर थी वह 14 दिन मेरी जिंदगी का सबसे मुश्किल दिन था। आठ घंटे की पाली के दौरान हमें लगातार खड़ा ही रहना पड़ता था और हमें मरीजों का मनोबल बढ़ाने के लिए बात करते रहना पड़ता था। उन दिनों मुझे काफी कुछ खोखला सा महसूस होने लगा था उसके बाद से मैं काफी अधिक एकाकीपन महसूस करता हूं। इस मुश्किल घड़ी मे लोगों को दवाओं सहित अन्य जरूरी सामान की जमाखोरी करते हुए देखना और सरकार का ऐसे जमाखोरों और कालाबाजारी करने वालों का नकेल कसने में नाकाम रहना देखकर मुझमें काफी रोष बढ़ा।' वह कहते हैं, 'मेरी परीक्षा आ रही है लेकिन मेरा मोहभंग हो चुका है। मैं पढ़ाई नहीं कर सकता। अब तीसरी लहर आने के साथ मैं सिर्फ  उम्मीद कर रहा हूं कि चीजें पहले की तरह बुरी न हों।'
 
हैदराबाद के यशोदा हॉस्पिटल्स के साथ पल्मोनोलॉजिस्ट और थोरेसिक सर्जन गोपीकृष्ण येदलापति भी कुछ ऐसा ही महसूस करते हैं, 'डॉक्टर के रूप में अपनी आंखों के सामने लोगों को मरते हुए देखना और वह भी युवाओं को, यह हमारे जीवन का सबसे दर्दनाक अनुभव था। निश्चित रूप से इससे डॉक्टरों और नर्सों पर मनोवैज्ञानिक असर पड़ा। एक वक्त में 1,000 बेड वाले यशोदा हॉस्पिटल में 700 कोविड मरीज थे।' येदलापति कहते हैं, 'हमारी योजना यह है कि कर्मचारियों की पाली इस तरह हो कि वे आराम करने के साथ ही परिवार के साथ कुछ वक्त भी बिता सकें। परिवार के साथ समय बिताना, भीड़ भरे वार्ड के तनाव का सामना करने का सबसे अच्छा तरीका था।' हालांकि कई लोगों की चिंताओं का कारण भी यही बना। येदलापति याद करते हैं, 'हर रात घर वापस जाने पर मुझे चिंता होती थी। मन में सवाल आते थे कि क्या मैं बीमारी घर ले जा रहा हूं? अगर परिवार में कोई बीमार पड़ जाए तो क्या होगा? अगर मैं बीमार पड़ गया, तो उन 130 से अधिक मरीजों का क्या होगा जिनकी मैं देखभाल कर रहा हूं?'
 
ऐसा दिल्ली के बाल रोग विशेषज्ञ और रैडिक्स हेल्थकेयर के निदेशक रवि मलिक के साथ भी हुआ जो दूसरी लहर के दौरान कोविड-19 से संक्रमित होने की वजह से सात दिन तक आईसीयू में भर्ती रहे। उनका डॉक्टरों वाला परिवार भी संक्रमित हुआ और यहां तक कि उनकी छह महीने की पोती भी अछूती नहीं रही। वह कहते हैं, 'हमें इस पेशे में होने की यह कीमत चुकानी पड़ती है।' हालांकि उन्हें उम्मीद है कि यह लहर उतना विनाशकारी नहीं होगा और चिकित्सा बिरादरी के लोग स्वीकार करते हैं कि अधिकारियों के प्रति तथा लोगों के कठोर व्यवहार की वजह से असंतोष और गुस्से की भावना है।
 
दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की यूनाइटेड नर्सेज एसोसिएशन की अध्यक्ष जोशी मैथ्यू कहती हैं, 'लहर जब चरम पर था तब कई जगहों पर नर्स-मरीज का अनुपात 1:15  था। वे बिना ब्रेक के काम कर रही थी और कई बार उनकी तबीयत खराब हो जाती थी।' वह कहती हैं, 'उनमें से कई लोग वायरस के संपर्क में आए। कई लोगों के अस्पतालों में उचित वॉशरूम की सुविधा भी नहीं थी। ऐसी जोखिम भरी परिस्थितियों में काम करने के लिए उन्हें कोई वित्तीय लाभ नहीं मिलना था।'
 
इस संगठन का कहना है कि स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री को कई पत्र लिखे गए हैं लेकिन लगता है कि अधिकारियों को स्वास्थ्यकर्मियों की चिंता नहीं है। इस बीच डॉक्टर और नर्स फिर से दोहरे मास्क और फेस शील्ड पहनने लगे हैं। मधुकर रेनबो चिल्ड्रन हॉस्पिटल, नई दिल्ली की प्रसूति एवं स्त्री रोग की निदेशक जयश्री सुंदर कहती हैं, 'यह आसान नहीं है। मेरे लिए राहत की एकमात्र बात यह है कि मेरे मरीजों में से अधिकांश को टीका लगा हुआ है तो इससे उन्हें कुछ सुरक्षा जरूर मिलेगी लेकिन हमें तीसरी लहर का खौफ  है। मैंने अपनी गर्भवती मरीजों को डांटा और समझाया है कि वे दोनों बूस्टर टीके लगवाएं। मैं उम्मीद कर रही हूं कि गर्भवती स्वास्थ्य कर्मी भी अपना बूस्टर टीका लेंगी।'
 
पिछली लहर से मिला सबक काम आ रहा है। बेंगलूरु के आसरा ग्रुप ऑफ  हॉस्पिटल्स के चेयरमैन जगदीश हिरेमठ कहते हैं, '22 साल तक इस पेशे में रहते हुए दूसरी लहर के बाद मुझे अधिक स्टाफ के होने के महत्व का एहसास हुआ।' नई दिल्ली के अपोलो अस्पताल के डॉक्टर कहते हैं, 'जनता के सामान्य व्यवहार पर भी थोड़ी नाराजगी है। हम उनके घर में बंद रहने को लेकर उनकी निराशा को समझते है लेकिन अंतिम बोझ हम पर ही आता है।' मलिक कहते हैं, 'लोग टीके लगवाकर, मास्क पहन कर, हाथ धोने और एक-दूसरे से दूरी रखने के मानदंडों का पालन कर स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति अपनी कृतज्ञता दिखा सकते हैं।'
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