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हरियाणा में खट्टर के लिए बाहरी नहीं भीतरी चुनौतियां

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  January 07, 2022

भारत सरकार के प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग ने कुछ दिन पहले सन 2020-21 का सुशासन सूचकांक (जीजीआई) जारी किया। यह सूचकांक देश के राज्यों के शासन-संचालन के आकलन की एक नई और उपयोगी व्यवस्था है। पिछली बार यह 2019 में जारी किया गया था। इसकी रेटिंग विश्वसनीय हैं क्योंकि आंकड़ों में छेड़छाड़ करने अथवा भाजपा एवं गैर भाजपा शासित राज्यों में भेद करने का कोई जरिया नहीं है। इसके अलावा यह सरकार के आंकड़ों पर आधारित है। यानी अगर केरल और तमिलनाडु जैसे गैर भाजपा शासित राज्यों ने पर्यावरण संरक्षण व्यवहार के मामले में दो शीर्ष स्थान हासिल किए या 2019 से 2020-21 के बीच सुशासन व्यवहार में सबसे अधिक सुधार आंध्र प्रदेश में देखा गया तो भाजपा के पास नतीजों पर सवाल उठाने की कोई वजह नहीं है। 
 
दिलचस्प बात यह है कि हरियाणा सभी क्षेत्रों में शीर्ष पांच राज्यों में नजर आता है। फिर चाहे बात कृषि की हो, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की या आर्थिक शासन (कारोबारी सुगमता समेत) की अथवा समाज कल्याण एवं विकास की। यह स्वीकार करना होगा कि ये आंकड़े केवल दो वर्ष के हैं इसलिए इनका इस्तेमाल शासन को आंकने और चुनावी नतीजों पर लागू करने में नहीं किया जा सकता है। परंतु एक बात स्पष्ट है कि हरियाणा में शासन के स्तर पर जो व्यवहारात्मक सुधार हुए हैं उनमें निरंतरता है, भले ही राज्य में भाजपा के चुनावी प्रदर्शन में ऐसा न दिखता हो।
 
बतौर मुख्यमंत्री एक वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के बाद मनोहर लाल खट्टर ने कहा था, 'जब मैं मुख्यमंत्री बना था, मेरा अनुभव शून्य था। अब यदि काई मुझसे पूछे तो मैं कहूंगा कि मेरे पास एक वर्ष का अनुभव है...मुझे सब पता है कि समस्याओं को कैसे हल करना है। जब 2019 में अगले विधानसभा चुनाव आए तो भाजपा 90 सदस्यीय विधानसभा में 46 सदस्यों का बहुमत हासिल करने में नाकाम रही और उसे दुष्यंता चौटाला की जनता जन नायक पार्टी (जेजेपी) के साथ चुनाव बाद गठबंधन करना पड़ा। तब से अब तक गुजरात और कर्नाटक में एक-एक बार जबकि उत्तराखंड में दो बार मुख्यमंत्री बदले जा चुके हैं लेकिन हरियाणा उन चुनिंदा भाजपा शासित राज्यों में शामिल है जहां सात वर्ष से एक ही मुख्यमंत्री है। हालांकि उनके नेतृत्व में पार्टी का चुनावी प्रदर्शन अपेक्षित नहीं रहा है।
 
बीते दो वर्षों में हरियाणा को किसान आंदोलन की नाराजगी झेलनी पड़ी है। बमुश्किल तीन महीने पहले खट्टर को सोनीपत का दौरा रद्द करना पड़ा था क्योंकि उन्हें सलाह दी गई थी कि बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर रहे किसान उनकी सुरक्षा को खतरा उत्पन्न कर सकते हैं। राज्य में बाहरी लोगों की बढ़ती तादाद को देखते हुए राज्य को एक कानून पारित करना पड़ा जिसके मुताबिक निजी क्षेत्र को कहा गया कि वह 50,000 रुपये से कम सकल वेतन वाली नौकरियों में निजी क्षेत्र के लोगों को 75 फीसदी आरक्षण दे। अल्पसंख्यकों के सार्वजनिक स्थल पर प्रार्थना करने के अधिकार को सीमित करने पर नए सिरे से जोर दिया गया है। हालांकि रथयात्रा या हिंदू धार्मिक जुलूसों और जागरण आदि पर कोई रोक नहीं लगाई गई है। ये सारे कदम एक ऐसे मुख्यमंत्री का किस्सा कहते हैं जो भीषण राजनीतिक दबाव से जूझ रहा है, हालांकि जीजीआई के अनुसार शासन के मामले में उसका रिकॉर्ड बहुत अच्छा है। खट्टर के लिए सबसे बड़ी समस्याएं अंदरूनी हैं।
 
दस दिन पहले उन्होंने मंत्रिपरिषद में फेरबदल और उसका विस्तार किया। उन्होंने शहरी स्थानीय निकाय विभाग गृह मंत्री अनिल विज से छीनकर हिसार के दो बार के भाजपा विधायक कमल गुप्ता को सौंप दिया। सबके लिए आवास का विभाग जो पहले खुद खट्टर के पास था उसे भी गुप्ता को दे दिया गया। (हरियाणा ने सबके लिए आवास का 100 फीसदी लक्ष्य हासिल कर लिया है, ऐसे में यह विभाग अब भी अस्तित्व में है तो कुछ वजह अवश्य होगी)। विज इतने नाराज हुए कि उन्होंने स्थानीय पत्रकारों को पूरा किस्सा सुनाया: उन्होंने कहा कि मंत्रिमंडल फेरबदल के पहले मुख्यमंत्री ने उनसे कहा था कि गृह मंत्रालय भी उनसे छीनना पड़ सकता है। विज ने पत्रकारों को बताया, 'तब मैंने कहा कि अगर उनकी ऐसी इच्छा है तो वह मुझसे सभी विभाग ले सकते हैं...मैंने कहा कि मैं सारे विभाग छोडऩे का इच्छुक हूं, सिर्फ एक या दो विभाग क्यों? वह मंत्रिमंडल विस्तार के कार्यक्रम में भी शामिल नहीं हुए।
 
छह बार के भाजपा विधायक विज और मुख्यमंत्री के बीच तनाव नया नहीं है। सन 2020 में खट्टर ने विज से अपराध अन्वेषण विभाग (सीआईडी) भी ले लिया था जिसके बिना किसी राज्य के गृह मंत्रालय के पास बहुत कम अधिकार शेष रह जाते हैं। इसके बाद पुलिस महानिदेशक के कार्यकाल को लेकर मुख्यमंत्री  और गृहमंत्री आमने-सामने आए। खट्टर उन्हें बरकरार रखना चाहते थे और विज हटवाने के इच्छुक थे। सन 2015 में भाजपा के अपने दम पर पहली बार हरियाणा की सत्ता में आने के तीन महीने के भीतर तत्कालीन स्वास्थ्य, युवा और खेल मंत्री विज ने ट्विटर के माध्यम से मुख्यमंत्री पर तंज कसते हुए लिखा था, 'धन्यवाद मुख्यमंत्री मेरे विभागों में इतनी गहरी रुचि लेने के लिए, मुझे बहुत राहत है। उन्होंने ऐसा तब किया था जब खट्टर ने विज के विभागों से संबंधित कई कार्यक्रमों और योजनाओं की घोषणा कर दी थी। गठबंधन साझेदार दुष्यंत चौटाला को भी किसानों के विरोध प्रदर्शन के बाद चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। परंतु वह भी मुख्यमंत्री के लिए कोई मजबूत सहारा नहीं साबित हो सके हैं। हरियाणा में चुनाव अभी कुछ दूर हैं लेकिन मुख्यमंत्री खट्टर के लिए हालात मुश्किल हो सकते हैं। 
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