बिजनेस स?टैंडर?ड - बजट की बुनियादी बातें
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बजट की बुनियादी बातें

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  January 07, 2022

जनवरी में सबका ध्यान केंद्रीय बजट पर लगा रहता है। तमाम अन्य चीजों की तरह बजट के मामले में भी गैरजरूरी बातों को किनारे करके जरूरी बातों पर ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है। बात शुरू करते हैं सरकारी कर्ज से। महामारी से निपटने की कोशिश में घाटा बढ़ा और सरकारी कर्ज में तेजी से इजाफा हुआ। राजस्व को हो रहे नुकसान के दौरान खर्च करना भी अपरिहार्य था और यह अपेक्षाकृत कम ही रहा। इसके बावजूद इसका प्रभाव नजर आ रहा है। केंद्र और राज्यों का सरकारी कर्ज जीडीपी के 90 फीसदी के करीब है। महामारी के पहले यह 70 फीसदी था जबकि इसका वांछित स्तर 60 फीसदी है।

 
परिणामस्वरूप ब्याज का बोझ बढ़ रहा है। महामारी के पहले यह सरकारी प्राप्तियों के 34.8 फीसदी के स्तर पर था। यह आंकड़ा करीब एक दशक से बदला नहीं था क्योंकि 2011-12 में भी यह 34.6 फीसदी ही था। लेकिन चालू वर्ष के लिए बजट अनुमान के अनुसार ब्याज की हिस्सेदारी बढ़कर 40.9 फीसदी हो गई है। यदि अनुमान 34.8 फीसदी पर बना रहता तो सरकार के पास अपने कार्यक्रमों में खर्च करने के लिए 1.2 लाख करोड़ रुपये बचते। यदि ब्याज दर बढ़ती है तो बिल का आकार और बढ़ेगा। भविष्य के लिए यह बड़ा बोझ होगा और अन्य प्रकार के व्यय को सीमित करेगा।
 
इसके अलावा बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में जीडीपी के हिस्से के रूप में कर राजस्व की हिस्सेदारी अधिक होती है ताकि स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण योजनाओं के साथ बुनियादी ढांचे तथा रक्षा क्षेत्र का वित्त पोषण  किया जा सके। भारत के मामले में जीडीपी के हिस्से के रूप में केंद्रीय सकल कर राजस्व संग्रह लगभग अपरिवर्तित है। 10 वर्ष पहले यह 10.2 फीसदी था और इस वर्ष इसके 9.9 फीसदी रहने का अनुमान है। हालांकि इस आंकड़े में संशोधन हो सकता है क्योंकि कर संग्रह बेहतर है, परंतु कर-जीडीपी अनुपात में दीर्घावधि से चला आ रहा ठहराव दरअसल इसलिए है क्योंकि हमारा देश स्वास्थ्य और शिक्षा तथा रक्षा क्षेत्र पर कम खर्च कर रहा है।
 
इससे पहली बात तो यह पता चलती है कि बजट भाषण में उल्लिखित वे लंबी-लंबी सूचियां जिनमें सरकारी कार्यक्रमों के लिए आवंटन में भारी इजाफे की बात कही जाती है वह बस शब्दों की बाजीगरी होती है। यदि जीडीपी के संदर्भ में राजस्व और कुल व्यय में उसी तरह इजाफा नहीं होता है और अगर कुछ कार्यक्रमों को अधिक राशि मिलती है तो यह स्पष्ट है कि औरों को कम राशि मिल रही है। हाल के वर्षों में राजस्व में ठहराव की एक वजह है वस्तु एवं सेवा कर। इस वर्ष अधिक जीएसटी राजस्व को लेकर आशावादी टीकाकार इस बात की अनदेखी कर देते हैं कि यह तेजी प्राथमिक तौर पर इसलिए आई है कि आयात में इजाफा हुआ है (दिसंबर तक आयात में 70 फीसदी बढ़ोतरी हुई)। तथ्य यह है कि इस बड़े कर सुधार से राजस्व में अपेक्षित इजाफा नहीं हुआ है और न ही जीडीपी में वृद्धि हुई है। इसकी वजह सब जानते हैं लेकिन सुधार के उपाय धीमे रहे हैं।
 
राजस्व में कमी का एक अन्य कारण कॉर्पोरेशन कर है। वर्तमान मूल्य पर देखें तो जीडीपी गत एक दशक में 160 फीसदी बढ़ा है जबकि कॉर्पोरेशन कर से आने वाला राजस्व केवल 70 फीसदी बढऩे की बात कही गई है। तुलनात्मक रूप से देखें तो व्यक्तिगत आय कर से हासिल होने वाले राजस्व के एक दशक में 230 फीसदी बढऩे का अनुमान है। यह असंतुलन इसलिए हो सकता है क्योंकि कंपनियां कठिन समय से गुजरी हैं। अच्छी बात है कि हम उस दौर से आगे निकल आए हैं। इसलिए बजट के दिन जब चालू वर्ष के संशोधित कर आंकड़े सामने आएंगे तो ये अनुपात सुधरे हुए दिखेंगे।
 
इसके बावजूद व्यापक रुझान अपरिवर्तित है: सरकारी राजस्व उस तरह नहीं बढ़ा जिस तरह उसे बढऩा चाहिए था और विशिष्ट कार्यक्रमों की व्यय राशि में बदलाव एक तय दायरे में ही हुआ है। अगर राजस्व का बड़ा हिस्सा कर्ज के ब्याज भुगतान में चला जाएगा तो बजट में प्रमुख सामाजिक-आर्थिक लक्ष्य (वृद्धि और रोजगार में इजाफा तथा बढ़ती असमानता को दूर करना) हासिल करने के लिए राजकोषीय उपायों की गुंजाइश और अधिक सीमित रहेगी। ऐसे में इस स्थिति को दूर करने और राजस्व बढ़ाने के केवल दो तरीके हैं। पहला, तेज आर्थिक वृद्धि। सदी के पहले दशक में ब्याज के भारी बोझ (सरकारी प्राप्तियों के हिस्से के रूप में) से ऐसे ही निपटा गया था। बदकिस्मती से फिलहाल वैश्विक परिस्थितियां अलग हैं। दूसरा है कर नीति और प्रमुख तौर पर जीएसटी सुधारों का दोबारा आकलन करना, कॉर्पोरेट कर की कमियों को दूर करना और यह सवाल करना कि आखिर पूंजीगत लाभ पर लगने वाले कर अर्जित आय पर लगने वाले कर से कम क्यों हैं तथा अस्तित्वहीन संपत्ति पर कर लगाना। 
Keyword: budget, fiscal deficit, GDP, economy,,
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