बिजनेस स्टैंडर्ड - विनिवेश को लेकर अलग रुख जरूरी
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, January 28, 2022 04:38 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

विनिवेश को लेकर अलग रुख जरूरी

राजेश कुमार /  January 03, 2022

चूंकि अब सरकारी उपक्रमों को लेकर सरकार के पास एक स्पष्ट नीति है इसलिए उसे विनिवेश कार्यक्रम को नए तरीके से तैयार करना चाहिए। विस्तार से बता रहे हैं राजेश कुमार 

 
एयर इंडिया की बिक्री निश्चित रूप से सरकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। हालांकि अंतिम हस्तांतरण में कुछ देर हुई है लेकिन तमाम बाधाओं के बावजूद ऐसा करने में कामयाबी मिलने के लिए सरकार की सराहना की जानी चाहिए। परंतु देश के विनिवेश कार्यक्रम के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती है। चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही भी समाप्त हो गई है और सरकार 1.75 लाख करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य में केवल 9,300 करोड़ रुपये की राशि ही हासिल कर सकी है। वर्ष का अंतिम आंकड़ा काफी हद तक जीवन बीमा निगम की सूचीबद्धता पर निर्भर करेगा। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि मार्च के अंत तक ऐसा हो पाएगा अथवा नहीं।
 
निवेश के मोर्चे पर इस वर्ष प्रदर्शन दो वजहों से खासतौर पर निराशाजनक रहा है। पहली, उच्च कर संग्रह के बावजूद, विनिवेश से होने वाली उच्च प्राप्तियां पूंजीगत व्यय को बढ़ाने में मदद करतीं। इससे अर्थव्यवस्था में सुधार की गति तेज होती और यह टिकाऊ होता। दूसरा बाजार परिस्थितियां एकदम अनुकूल थीं। निजी क्षेत्र ने रिकॉर्ड रकम जुटाई और आशा है कि निकट भविष्य में यह सिलसिला बरकरार रहेगा। बहराहल, इस मोर्चे पर सरकार की नाकामी में कुछ भी नया नहीं है। उदाहरण के लिए उसने गत वर्ष 2.1 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य की तुलना में केवल 32,845 करोड़ रुपये की राशि जुटाई थी। यह सवाल तो बनता है कि दशकों से एजेंडे पर होने के बावजूद विनिवेश को लेकर व्यवस्थित तरीका नहीं अपनाया गया। हकीकत में अतीत में सरकार ने विनिवेश लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक सरकारी उपक्रम को दूसरे के हाथों बेचा। एक हालिया रिपोर्ट में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने इस कवायद पर आपत्ति की और कहा कि यह विनिवेश की भावना के विरुद्ध है।
 
इन प्राप्तियों को राजस्व घाटा कम करने के लिए इस्तेमाल किया गया। परंतु इसमें बदलाव आना चाहिए क्योंकि अब सरकार के पास सरकारी उपक्रमों को लेकर स्पष्ट नीति है। इसके मुताबिक सरकार केवल रणनीतिक क्षेत्रों में न्यूनतम हिस्सेदारी रखेगी। परमाणु ऊर्जा, बिजली और पेट्रोलियम, परिवहन तथा दूरसंचार तथा वित्तीय सेवा आदि ऐसे ही क्षेत्र हैं। अन्य क्षेत्रों के सरकारी उपक्रमों को या तो बेचा जाएगा या बंद कर दिया जाएगा। हालांकि नीति का क्रियान्वयन अपेक्षित तरीके से नहीं हुआ है लेकिन महामारी के बाद आर्थिक सुधार की प्रक्रिया को आकार देने के मामले में इस क्षेत्र में होने वाली प्रगति अहम होगी।
 
सरकार के बड़ी तादाद में सरकारी उपक्रम चलाने की कोई वजह नहीं है। उनमें से कई तो सरकार पर बोझ हैं और उनको चलाने में बहुत अधिक खर्च होता है। सीएजी की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2018 के अंत तक के लिए 600 से अधिक केंद्रीय उपक्रमों की समीक्षा की गई और पाया गया कि 70 प्रतिशत से अधिक मुनाफा राज्य सरकारों के उपक्रमों से आया और इनमें पेट्रोलियम, कोयला और लिग्नाइट जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली 52 कंपनियों का योगदान था। इससे पता चलता है कि सरकारी उपक्रम उन क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करते हैं जहां प्रतिस्पर्धा सीमित हो। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं क्योंकि तेजी से बदलते कारोबारी माहौल को अपनाना और प्रतिस्पर्धा का सामना करना सरकारी क्षेत्र के लिए शुरू से कठिन रहा है क्योंकि वह तमाम बाधाओं के बीच काम करता है। यह भी एक बड़ी वजह है जिसके चलते सरकारी क्षेत्र की कंपनियां दूरसंचार और विमानन क्षेत्र में तमाम सरकारी मदद के बावजूद नाकाम रहीं। सीएजी के एक नमूने के मुताबिक 184 कंपनियों को 1.42 लाख करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ। इतना ही नहीं 77 कंपनियों का पूरा मूल्यांकन उनके घाटे के चलते हवा हो गया। जाहिर है ये कंपनियां देश के लिए लाभदायक नहीं हैं।
 
चूंकि अब सरकार के पास स्पष्ट नीति है इसलिए उसे विनिवेश कार्यक्रम को भी नए सिरे से आंकना चाहिए। अहम यह होगा कि विनिवेश को केवल एक खास वर्ष के राजकोषीय घाटे की पूर्ति का जरिया न समझा जाए। यहां सरकार तीन काम कर सकती है। पहला, उसे मध्यम अवधि का लक्ष्य घोषित करना चाहिए जिसमें वह तय समय के भीतर चुनिंदा रणनीतिक क्षेत्रों के अलावा अपनी मौजूदगी को कम करेगी। यह सूची सार्वजनिक की जानी चाहिए। स्पष्ट लक्ष्य या योजना के अभाव में विनिवेश कार्यक्रम उन्हीं समस्याओं में उलझा रहेगा।
 
दूसरा, सरकार को उन सरकारी उपक्रमों की सूची जारी करनी चाहिए जिनका वह विनिवेश करना चाहती है। कम से कम अगले तीन वर्षों में निजीकृत किए जाने वाले उपक्रमों की सूची सामने आनी चाहिए। बजट की जरूरत के मुताबिक बेचने के लिए उपक्रम तलाशने से बात नहीं बनेगी। कंपनियों या क्षेत्र विशेष की अपनी दिक्कतें होती हैं जिन्हें दूर करने की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया में समय लगेगा। मसलन सरकार ने इस वर्ष के बजट में दो सरकारी बैंकों का निजीकरण करने की बात कही थी। यह काम इसी वित्त वर्ष में करना था लेकिन अब तक ऐसे बैंकों के नाम तक घोषित नहीं किए गए हैं। सरकारी बैंकों का निजीकरण करना आसान नहीं होगा। सरकार को कई नियामकीय मसलों को ध्यान में रखना होगा और संबंधित कानूनों में संशोधन करना होगा।
 
तीसरा, सरकार को राजकोषीय घाटे का वार्षिक आंकड़ा पेश करना चाहिए, भले ही विनिवेश प्रक्रिया इसमें उल्लिखित हो या नहीं। इस ढांचे में यह अहम बात होगी क्योंकि कुछ वर्षों में यह प्रक्रिया विनिवेश प्रत्याशियों और बाजार परिस्थितियों पर और अधिक निर्भर हो सकती है। इसलिए सरकार को बिना विनिवेश प्राप्तियों के बिना घाटे का प्रबंधन करना चाहिए। सरकार बड़ी परियोजनाओं की पहचान कर सकती है जिनका वित्त पोषण विनिवेश फंड से किया जा सकता है।
 
इससे बजट दस्तावेज में पता चल सकता है कि प्रक्रिया किस दिशा में है। इससे शंकालुओं को यह समझाने में मदद मिलेगी कि सरकार केवल परिसंपत्ति नहीं बेच रही बल्कि नई संपत्तियां भी तैयार कर रही है और इस प्रक्रिया में वह अर्थव्यवस्था की वृद्धि संभावनाओं में भी सुधार कर रही है। कार्यक्रम की व्यापक स्वीकार्यता इसकी सफलता के लिए आवश्यक होगी। महामारी के बाद भारत की मध्यम अवधि की वृद्धि काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकारी वित्त का प्रबंधन किस प्रकार किया जाता है और विनिवेश कार्यक्रम इसमें काफी अहम होगा। 
Keyword: disinvestment, PSU, GOVT, economy,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या टाटा की अुगआई में लौटेगा एयर इंडिया का पुराना गौरव?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.