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स्वास्थ्य की तस्वीर

संपादकीय /  January 02, 2022

नीति आयोग ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ मिलकर चौथी स्वास्थ्य सूचकांक रिपोर्ट प्रकाशित की है। वर्ष 2019-20 के लिए प्रकाशित इस रिपोर्ट में 24 संकेतकों के आधार पर राज्यों को रैंक (क्रम) प्रदान की गई है और यह रिपोर्ट देश में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की तस्वीर सामने रखती है। तीन व्यापक क्षेत्रों-स्वास्थ्य संबंधी परिणाम, संचालन और सूचना तथा प्रमुख जानकारी और प्रक्रियाओं पर आधारित यह सूचकांक पर्याप्त जानकारी देता है। इसमें केवल शिशु मृत्यु जैसे मानक स्वास्थ्य संकेतक शामिल नहीं हैं बल्कि आधुनिक गर्भनिरोधकों के प्रसार, टीबी के उपचार की सफलता की दर, बीते तीन वर्षों में जिलों में मुख्य चिकित्सा अधिकारी की औसत उपलब्धता जैसे मानक भी इसका हिस्सा हैं। इस व्यापक सूची के लिए सूचना स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के डेटा बेस के साथ-साथ राज्यों की रिपोर्ट से भी हासिल की गई। रैंकिंग काफी हद तक अपेक्षा के अनुरूप ही है और दक्षिणी और समृद्ध पश्चिमी राज्य आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। इससे भी आंकड़ों की सत्यता उजागर होती है। परंतु कुछ बदलावों पर जोर देकर इस रैंकिंग को और अधिक उपयोगी तथा सार्थक बनाया जा सकता है तथा स्वास्थ्य नीति निर्माण तथा राज्यों के बीच संसाधनों के आवंटन में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

रैंकिंग हमें बताती है कि एक दूसरे के सामने राज्य किस स्थिति में है। यहां भी सूचना इसलिए सीमित हो जाती है क्योंकि राज्यों को तीन श्रेणियों में रैंक किया गया है- 19 बड़े राज्य, आठ छोटे राज्य और सात केंद्र शासित प्रदेश। यह अपने आप में भ्रामक हो सकता है। उदाहरण के लिए केरल और तमिलनाडु समग्र प्रदर्शन के मामले में शीर्ष दो राज्य थे जबकि उत्तर प्रदेश अंतिम स्थान पर रहा। इसके बावजूद क्रमिक प्रदर्शन की बात करें तो उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर रहा जबकि केरल और तमिलनाडु बड़े राज्यों में 12वें और आठवें स्थान पर आए। यहां भी कई समस्याएं हैं। इसलिए नहीं कि ऐसा जोखिम है कि आंकड़ों की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है कि जल्दी ही उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सेवा आपूर्ति के मामले में आदर्श बन सकता है। बीते वर्ष की घटनाओं से तुलना करें तो यह तथ्य एकदम विरोधाभासी है। यह और बात है कि बीता वर्ष सूचकांक की अध्ययन अवधि से बाहर है। चूंकि उत्तर प्रदेश की शुरुआत बहुत कम आधार से होती है इसलिए कोई भी क्रमिक सुधार उसकी स्थिति में असंगत उछाल दर्शाता है। इतना ही नहीं राज्यों का उनके आकार के अनुसार किया गया कृत्रिम बंटवारा भी तस्वीर को खराब करता है। कई छोटे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में क्रमिक बदलाव के अंक उत्तर प्रदेश से अधिक रहे। मिजोरम, मेघालय, दिल्ली, जम्मू कश्मीर तथा पुदुच्चेरी इसके उदाहरण हैं।

मानव विकास संकेतकों की कोई भी रैंकिंग स्थिर तस्वीर भी पेश करती है और अगर एक मानक के समक्ष उनका आकलन न किया जाए तो उसका दुुरुपयोग संभव है। स्वास्थ्य सूचकांक की बात करें तो अधिकतम अंक (100) और हर प्रांत के विशिष्ट अंक के बीच का अंतर ज्यादा उपयुक्त मानक है। इस पर बहुत कम ध्यान दिया गया है लेकिन फिर भी यह स्पष्ट दिखाता है कि स्वास्थ्य के मामले में हमारी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। करीब आधे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश समग्र सूचकांक अंक में आधे अंक भी नहीं पा सके और शीर्ष चार राज्य भी अधिकतम से काफी दूर रह गए। मसलन केरल, जिसकी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की सराहना नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमत्र्य सेन ने भी की है उसे कुल मिलाकर 82.8 अंक मिले। इससे पता चलता है कि सर्वश्रेष्ठ राज्य में भी सुधार की गुंजाइश है। उस मानक पर उत्तर प्रदेश को तो बहुत लंबा सफर तय करना होगा क्योंकि उसे केवल 30.57 अंक मिले। कोविड-19 के प्रभाव वाले वर्ष का सूचकांक अधिक वास्तविक तस्वीर पेश कर सकता है।

Keyword: नीति आयोग, परिवार, स्वास्थ्य सूचकांक रिपोर्ट, चिकित्सा अधिकारी,
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