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बड़ा कदम

संपादकीय /  December 30, 2021

कोविड-19 वायरस का नया प्रकार ओमीक्रोन फैल रहा है और देश के कई हिस्सों में संक्रमण दर में तेजी नजर आने लगी है। इन खबरों ने टीकाकरण कार्यक्रम को लेकर सरकार के रुख को झिंझोड़ दिया है। टीकाकरण को लेकर सरकार का रुख अत्यधिक सक्रियता वाला नहीं था। वह इसे अपनी गति से चलने दे रही थी। हालांकि आदर्श स्थिति में ऐसा होना ही नहीं चाहिए था। खासकर तब जबकि अभी तत्काल यह घोषणा की गई है कि आबादी के एक हिस्से को बूस्टर खुराक दी जाएगी और 15 से 18 वर्ष की उम्र के युवाओं को भी टीका लगाया जा सकेगा। इसके लिए दो नए टीकों के आपात इस्तेमाल को मंजूरी दी गई है जबकि एक ऐंटीवायरल गोली का भी इस्तेमाल किया जाएगा। ये तीनों विदेशों से तकनीक हस्तांतरण के बाद भारत में बनाई जा रही हैं। ऐंटीवायरल गोली मोलनुपिराविर का लाइसेंस उसे विकसित करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी मर्क ने संयुक्त राष्ट्र के मेडिसन पेटेंट पूल को सौंपा है। इससे इस औषधि को भारत समेत विकासशील देशों के जेनेरिक निर्माताओं द्वारा बनाए जाने की राह आसान हुई। मोलनुपिराविर संक्रमण के बाद अस्पताल में भर्ती होने या मौत की आशंका को 30 से 50 फीसदी तक कम करती है।

जिन दो टीकों के आपात इस्तेमाल की इजाजत दी गई है उनका नाम है कोर्बेवैक्स और कोवावैक्स। इन दोनों के आगमन के बाद न केवल भारत में बल्कि विकासशील देशों में बड़े पैमाने पर टीकाकरण की संभावनाएं बढ़ी हैं। कोवावैक्स के नाम से भारत में नोवावैक्स टीके का प्रकार बिक रहा है। इसे बनाने का लाइसेंस सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के पास है और उसने इस वर्ष के मध्य में टीके का निर्माण शुरू किया। विभिन्न अध्ययनों में इसे ओमीक्रोन समेत तमाम प्रकार वाले वायरस पर अन्य टीकों की तुलना में अधिक प्रभावी पाया गया है। टीके की बूस्टर खुराक का भी ऐसा ही प्रभाव है। इससे प्रतिरोधक क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। इतना ही नहीं इसे फ्रिज में लंबे समय तक रखा जा सकता है और कमरे के तापमान पर भी यह तीन महीने रखी जा सकता है।

कोर्बेवैक्स और अधिक क्षमता वाला टीका साबित हो सकता है। इसे मूल रूप से अमेरिका के बायलॉर विश्वविद्यालय और टैक्सस चिल्ड्रन हॉस्पिटल ने विकसित किया और तेलंगाना की कंपनी बॉयोलॉजिकल ई ने इसे सह विकसित किया। कंपनी ने इसकी 15 करोड़ खुराक पहले ही तैयार कर ली हैं और वह हर माह 10 करोड़ खुराक बनाने की क्षमता रखती है। बौद्धिक संपदा पर किसी का अधिकार नहीं है और अब इसे बनाने की तकनीक बांग्लादेश, इंडोनेशिया और बोत्सवाना के निर्माताओं को मिल चुकी है। डेल्टा स्वरूप के खिलाफ इसका प्रभाव ऑक्सफर्ड/ एस्ट्राजेनेका अथवा कोविशील्ड टीके से बेहतर है और लक्षण वाले संक्रमण में यह 80 फीसदी को रोकने में सक्षम है। मेसेंजर आरएनए टीकों के उलट बेहतर विज्ञान पर आधारित है। इसमें वह तकनीक अपनाई गई है जिसके आधार पर दशकों से हेपटाइटिस बी के टीके बन रहे हैं और इसलिए इसकी कीमत भी बहुत कम यानी तीन डॉलर प्रति खुराक तक रह सकती है।

इन बातों से यह भी पता चलता है कि भारतीय नियामकों को विज्ञान को तरजीह देते हुए वैश्विक औषधीय शोध केंद्रों के संपर्क में रहना होगा। कोवावैक्स इंडोनेशिया में पहले से लग रही है और मोलनुपिराविर को बांग्लादेश में नवंबर में मंजूरी मिली थी, ऐसे में भारत को इतना समय नहीं लगाना चाहिए था। तेज गति और लचीलापन जरूरी हैं। अब जबकि ये मंजूरी दी जा चुकी हैं, सरकार को यह भी तय करना चाहिए कि वह सही पैमाने पर अग्रिम खरीद करे, निर्माताओं को अग्रिम फंड देना तय करे और निर्यात प्रतिबंध कम करे। अब अवसर है कि देश में टीकाकरण कार्यक्रम को पूरा किया जा सके तथा सभी वयस्कों को बूस्टर खुराक दी जा सके।

Keyword: ओमीक्रोन, संक्रमण दर, टीकाकरण, ऐंटीवायरल गोली, मोलनुपिराविर, लाइसेंस,
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