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साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  December 24, 2021

अवकाश के दिनों में थोड़ा आराम का काम करते हैं और देखते हैं कि एक टीकाकार ने गत गर्मियों में प्रधानमंत्री के बारे में क्या लिखा था, 'वह कहते हैं कि उनका लक्ष्य है (देश का) स्वयं में विश्वास बहाल करना, निर्बलों, शोषितों और निराशों की लड़ाई लड़ते हुए पराजयवाद से जूझना।' इसके बावजूद 'कई लोगों के लिए वह सार्वजनिक मानकों के पतन का मूर्त रूप तथा उत्तर सत्य राजनीति का चेहरा हैं...उनके सर्वाधिक प्रबल आलोचकों के लिए वह एक ऐसे मायावी व्यक्ति हैं जो झूठ बोलकर शीर्ष पर पहुंचे, जिन्होंने लोकतंत्र को खतरे में डाला और जो किसी और चीज में नहीं केवल अपनी तरक्की में यकीन करते हैं...वह अर्थव्यवस्था और चुनावी मानचित्र को सर्वाधिक अतिवादी ढंग से बदलते हुए देश का नेतृत्व कर रहे हैं...'

टीकाकार ने आगे कहा, 'देशप्रेमी आशावाद की उनकी दलीलों में जाहिर तौर पर आकर्षण है', लेकिन 'सोचने वाली बात है कि कहीं उनके पीछे अधिक स्वार्थी भावनाएं तो नहीं छिपी हैं। क्या वह देश के हित में काम कर रहे थे या अपने हित में?...हमारी एक बातचीत में उन्होंने कहा था कि लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि वे खुद से बड़ी किसी चीज का हिस्सा हैं...और उन्हें यह चिंता होती है कि उनकी परंपराएं और संपर्क क्षीण हो रहे हैं तो उन पर कृपा नहीं दिखानी चाहिए।'

महामारी के प्रबंधन के तौरतरीकों को लेकर प्रधानमंत्री की जबरदस्त आलोचना की गई लेकिन 'लोग उनके साथ बहुत धैर्य से पेश आ रहे हैं, लोग उन्हें माफ भी कर रहे हैं क्योंकि वह कोई आम राजनेता नहीं हैं।' यह बात विपक्ष को हताश करती है। 'उन पर कभी कोई आरोप नहीं ठहरता और यह बात उनके विरोधियों को पागल बना रही है...बार-बार जब भी वह किसी विवाद में पड़े हैं तो अनछुए ही बाहर आए हैं। उनकी चुनावी समझ का एक हिस्सा यह भी है कि वह अपने विरोधियों को सीधा सोचने से रोकते हैं, उनको लेकर अपनी नफरत के कारण विरोधी यह देख ही नहीं पाते कि वह लोकप्रिय क्यों हैं, वे यह भी नहीं समझ पाते कि इस बारे में क्या किया जाए।'

'...उनके लिए राजनीति तथ्यों को लेकर कोई लड़ाई नहीं बल्कि लोगों के सामने ऐसी कहानी पेश करना है जिस पर वे यकीन कर सकें...मनुष्य कल्पनाजीवी जो है। इसलिए उन्होंने लोकलुभावन, राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाया...स्पष्ट रूप से निष्पक्ष व्यवस्था के खिलाफ बगावत, जिसमें क्रोध का तड़का है।'

दिक्कत यह है कि यह ड्रीमपॉलिटिक (जॉन डिडिऑन के शब्दों में) है। इसलिए प्रधानमंत्री को 'उन समस्याओं को वास्तव में हल करना होगा जिनसे केवल भरोसे के दम पर नहीं निपटा जा सकता। यदि उनकी घरेलू आर्थिक परियोजना विफल होती है तो कुछ लोगों को भय है कि देश अजनबियों से भयभीत रहने वाली पहचान की राजनीति की दिशा में मुड़ जाएगा...यहां तक कि उनके सबसे करीबी सहयोगियों में से एक ने भी चिंता जताई कि प्रधानमंत्री देश की समस्याओं के बारे में व्यवस्थित ढंग से विचार नहीं करते, और उन्हें अटल विश्वास पर कुछ ज्यादा ही भरोसा है।'

यदि आप अब तक अनुमान नहीं लगा पाए हैं तो बता दूं कि इनमें से कोई बात नरेंद्र मोदी के बारे में नहीं है, हालांकि सारी बातें या अधिकांश बातें उन पर लागू की जा सकती हैं। उपरोक्त बातें टॉम मैकटॉग द्वारा लिखी बोरिस जॉनसन की प्रोफाइल से उद्धृत की गई हैं जो द अटलांटिक में प्रकाशित हुई थी। शायद आप सोच सकते हैं कि कोई दो व्यक्ति इससे अधिक असमान नहीं हो सकते। विरोधाभास देखिए कि जॉनसन एटन और ऑक्सफर्ड से निकले हैं। मोदी के करीने से काढ़े गए बालों और गंभीर आचरण के उलट उनके ब्रिटिश समकक्ष अस्तव्यस्त रहते हैं और मजाकिया किस्म के हैं। जब तुलना की जाती है कि मोदी को अक्सर तुर्की के रेजेेप एर्दोआन, हंगरी के विक्टर ऑर्बन और ब्राजील के जैर बोलसोनारो जैसे लोकप्रिय अधिनायकवादी शासकों के साथ रखा जाता है। कहने का अर्थ यह कि लोकतंत्र के चुनिंदा गढ़ों में भी लोकलुभावनवादियों ने जगह बना ली है।

जॉनसन की सदस्यता का दावा डॉनल्ड ट्रंप से मिलता है। फ्रांस के अगले राष्ट्रपति के रूप में एरिक जेम्मॉर शायद ऐसे क्लब का हिस्सा बनें। नव-उदारवाद बेदखल है जबकि हस्तक्षेपकारी सरकार का आगमन हो चुका है, अप्रवास बाहर है जबकि गुस्से का भड़कना सहज है, संस्कृति अर्थशास्त्र पर भारी है और जन भावनाओं का ध्यान न रखने की बात खम ठोककर कही जा सकती है। मैकटाग ने जॉनसन के मुख्य विदेश नीति सलाहकार और रियलपॉलिटिक के लेखक जॉन ब्यू को उचित ही उद्धृृत किया है, 'किसी देश की राजनीति का दायरा निर्धारित करने वाला इकलौता सबसे अहम कारक है युग चेतना।' भले ही ट्रंप सत्ता से बाहर हो गए हैं और जॉनसन के लिए हालात मुश्किल हो चुके हैं लेकिन उक्त बात अभी भी सच है।

Keyword: अवकाश, आलोचक, राजनेता, ड्रीमपॉलिटिक, घरेलू आर्थिक परियोजना, प्रधानमंत्री,
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