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व्यय में हो रही बढ़ोतरी और उसका प्रबंधन

ए के भट्टाचार्य /  December 23, 2021

संकट के समय सरकारें अलग-अलग प्रतिक्रिया देती हैं। यदि संकट अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला हो और सरकारी मदद तथा हस्तक्षेप की आवश्यकता हो तो प्रतिक्रिया में अक्सर सरकारी व्यय में बढ़ोतरी देखने को मिलती है।

वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के समय भारत के साथ यही हुआ। सरकारी व्यय 2007-08 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 29 फीसदी से बढ़कर 2008-09 में 31 फीसदी हो गया। अगले दो वर्षों तक यह 31 फीसदी से अधिक रहा और फिर 2011-12 में घटकर 29 फीसदी हुआ। बाद के वर्षों में इसमें और कमी आई। संयुक्त सरकारी घाटा भी 2007-08 के 4 फीसदी से बढ़कर 2008-09 में 8.4 फीसदी और 2009-10 में 9 फीसदी से अधिक हो गया। बाद के दो वर्षों में इसमें कमी आई और यह 7-8 फीसदी हुआ।

दो वर्ष पहले कोविड-19 के आगमन के बाद से वह लगातार वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था और आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौती बना हुआ है। भारत समेत तमाम सरकारों ने महामारी से निपटने के लिए व्यय बढ़ाया है। परंतु बीते दो वर्षों में इस व्यय वृद्धि ने सार्वजनिक वित्त पर क्या असर डाला? भारत के सार्वजनिक वित्त के लिए पहली बड़ी बात तो यही है कि पिछले संकटों की तरह कोविड-19 के बाद भी सरकारों का आकार बढ़ा। महामारी के पहले कुल सरकारी व्यय जीडीपी का 29 फीसदी था  जबकि 2020-21 में यह बढ़कर 36 फीसदी हो गया। याद रहे कि ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि 2020-21 में भारत की अर्थव्यवस्था समायोजन के बगैर तीन फीसदी सिकुड़ी, हालांकि सिकुडऩ के कारण इस पर जोर अवश्य पड़ा होगा लेकिन इस अवधि में सरकारी व्यय भी बढ़ा। केंद्र का व्यय 28 फीसदी और राज्यों का 12 फीसदी बढ़ा।

महामारी के बाद सरकार का आकार बढऩा अपेक्षित था। हालांकि आश्चर्यचकित करने वाली बात थी केंद्र और राज्यों की प्रतिक्रिया की गुणवत्ता में अंतर। केंद्र ने जल्दी प्रतिक्रिया दी और अपने व्यय को 2019-20 के जीडीपी के 13 फीसदी से बढ़ाकर 2020-21 में 17.5 फीसदी कर दिया। राज्यों के मामले में यह 16 फीसदी से बढ़कर 19 फीसदी हो गया।

जाहिर है केंद्र ने महामारी के पहले वर्ष में राज्यों की तुलना में ज्यादा बड़ा वित्तीय प्रोत्साहन दिया। यह संभव है कि राज्यों की वित्तीय स्थिति ने उन्हें बेहतर प्रतिक्रिया न देने दी हो। याद रहे 2020-21 में राज्य लगातार शिकायत कर रहे थे कि उन्हें वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था के तहत केंद्र से पर्याप्त क्षतिपूर्ति नहीं मिल पा रही और उन्हें बाद में अतिरिक्त उधारी की इजाजत दी गई उससे पहले व्यय की योजना बाधित रही।

सन 2021-22 ज्यादा चौंकाने वाला साबित हो सकता है। सामान्य स्थिति में सरकारी व्यय में इजाफा होना चाहिए था या उसे चालू वर्ष में कम से कम समान स्तर पर रहना था। बजट अनुमान के मुताबिक तो 2021-22 में केंद्र और राज्यों का संयुक्त व्यय जीडीपी की तुलना में घटकर 35 फीसदी रह जाना था। दिलचस्प बात यह है कि 2021-22 में राज्यों ने अपना व्यय जीडीपी की तुलना में 19 फीसदी बढ़ाया लेकिन केंद्र सरकार ने उल्लेखनीय प्रतिबद्धता दिखाई और अपना व्यय जीडीपी की तुलना में करीब दो फीसदी कम किया और यह जीडीपी के 15.6 फीसदी के बराबर रह गया।

परंतु 2021-22 के समाप्त होने के पहले केंद्र सरकार का अंतिम व्यय स्तर बजट अनुमान से बहुत अधिक होने की आशा है। चालू वर्ष में सब्सिडी तथा अन्य व्यय पर 3 लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च होंगे। इससे केंद्र का व्यय जीडीपी के 16.9 फीसदी पहुंच जाएगा जो इसके बावजूद 2020-21 के स्तर से कम रहेगा। संभव है राज्यों का व्यय अनुमान इसलिए न बढ़े क्योंकि उनके पास ऋण की गुंजाइश नहीं है और वे ऐसा प्रयास नहीं कर सकते। ऐसे अतिरिक्त व्यय को ध्यान में रखने के बावजूद 2021-22 में सरकरी व्यय जीडीपी की तुलना में 36 फीसदी रहेगा जो 2020-21 के 36.4 फीसदी से कम है।

कोविड-19 के बाद के दो वर्षों में भारत के सार्वजनिक वित्त के प्रदर्शन में दो और बातें ध्यान देने लायक हैं। पहली बात, केंद्र और राज्यों का कुल पूंजी आवंटन स्वस्थ और स्थिर गति से बढ़ा है। यह अच्छी बात है कि केंद्र और राज्य सरकारों का पूंजी आवंटन महामारी के पहले यानी 2019-20 के जीडीपी के 3.6 फीसदी से बढ़कर 2020-21 में 4.3 फीसदी और 2021-22 में 5.3 फीसदी हुआ। दिलचस्प बात यह है कि राज्यों ने इस क्षेत्र में बढ़त बनाई और महामारी के बाद केंद्र द्वारा किए गए व्यय की तुलना में उनकी हिस्सेदारी आधी से अधिक रही।

दूसरी बात, बीते दो वर्षों में कर राजस्व में अच्छी वृद्धि देखने को मिली है। केंद्र और राज्यों द्वारा संग्रहीत कुल कर राजस्व महामारी के पहले के वर्षों में धीमा पड़ रहा था। यह 2017-18 के जीडीपी के 17.8 फीसदी से घटकर 2018-19 में 17.4 फीसदी हुआ और 2019-20 में यह 15.8 फीसदी रह गया। केंद्र और राज्यों का इस गिरावट में समान योगदान रहा। बहरहाल, महामारी के बाद वाले वर्ष यानी 2020-21 में संयुक्त कर राजस्व बढ़ा और वह जीडीपी का 16 फीसदी हो गया। चालू वर्ष में इनके जीडीपी के 17.15 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया था। मौजूदा तेजी को देखते हुए कहा जा सकता है कि कर राजस्व जीडीपी के 18 फीसदी का स्तर पार कर सकता है।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि सार्वजनिक वित्त के ये आंकड़े इस विषय में क्या जानकारी देते हैं कि केंद्र और राज्यों को अगले वर्ष की बजट कवायद में क्या करना चाहिए? सरकार क आकार में बढ़ोतरी संकट काल की आवश्यकता हो सकती है लेकिन इसे एक स्थायी नीति के रूप में नहीं इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि इससे वृद्धि और मुद्रास्फीति के प्रबंधन के लिए जोखिम उत्पन्न हो सकता है। वर्ष 2020-21 में सरकार का संयुक्त घाटा 14 फीसदी से अधिक था और अनुमान है कि चालू वर्ष में उसे घटाकर 10.5 फीसदी तक लाया जा सकेगा।

यदि केंद्र और राज्य सरकारें आने वाले वर्ष में भी कोविड-19 की चुनौतियों का सामना करने के लिए अधिक व्यय करना चाहती हैं तो उन्हें यह बात ध्यान में रखनी होगी कि करों तथा गैर कर राजस्व के जरिये उन्हें संसाधन बढ़ाने होंगे। यदि ऐसा नहीं किया गया तो राजकोषीय घाटा कम नहीं किया जा सकेगा। संक्षेप में कहें तो ज्यादा व्यय, खासकर पूंजी आवंटन पर व्यय भी राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के समान ही महत्त्वपूर्ण है। केंद्र के कुछ व्यय का बोझ राज्यों पर डालना भी अच्छा विचार नहीं है।

Keyword: सरकारी व्यय, वैश्विक वित्तीय संकट, जीडीपी, सब्सिडी, पूंजी आवंटन, राजस्व,
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