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आरबीआई गवर्नर और वित्त मंत्री के बीच संतुलन

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  December 22, 2021

शक्तिकांत दास ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर के रूप में तीन वर्ष पूरे कर लिए हैं। सरकार ने उनका कार्यकाल अगले और दो वर्षों के लिए बढ़ा दिया है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को वित्त मंत्रालय की बागडोर संभाले भी ढाई वर्ष हो चुके हैं। इनमें दो वर्ष दास और सीतारमण ने कोविड-19 महामारी से निपटने में निकाले हैं।

एक पर्यवेक्षक के रूप में पहली बात दिमाग में यह आती है कि केंद्रीय बैंक के वर्तमान गवर्नर और वित मंत्री सीतारमण के संबंधों में  कितनी शालीनता रही है। इससे पहले आरबीआई के तीन गवर्नरों ने संस्थागत महत्त्व का हवाला देते हुए अपनी स्वायत्तता पर विशेष जोर दिया था। पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और ऊर्जित पटेल के सरकार के साथ परोक्ष मतभेद किसी से छुपे नहीं रहे हैं। कम से कम दास ने अपने पूर्ववर्ती गवर्नरों के सोच को स्वयं पर हावी होने नहीं दिया। खासकर मीडिया से बातचीत या किसी बड़े कार्यक्रम में कोई ऐसी बात नहीं कही जो सरकार के अहम को ठेस पहुंचा सकती थी या सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती थी। इस वजह से दास और सीतारमण के बीच एक संतुलित संबंध कायम हुआ। सीतारमण और दास ने वित्त मंत्रियों और आरबीआई गवर्नरों के बीच भविष्य के संबंधों के लिए एक पुराना आधार फिर सामने कर दिया है। यह काफी स्वागत योग्य कदम है क्योंकि 2011 से 2018 के बीच गवर्नर यह भूल गए थे कि भारतीय संविधान के अनुसार वरिष्ठ कौन है।

दूसरे गवर्नरों के भी वित्त मंत्रियों के साथ मतभेद रहे थे मगर ये सारी बातें पर्दे के पीछे हुआ करती थीं। इनकी जानकारी काफी बाद में लोगों को मिली थी। वाई वी रेड्डी और डी सुब्बाराव की आत्मकथाएं गवर्नरों और वित्त मंत्रियों के बीच उतार-चढ़ाव वाले संबंधों की झलक देते हैं।

दास ने एक और बात साबित की है जो भविष्य में गवर्नरों की नियुक्तियों के लिए अहम है। वह बात यह है कि सरकार से बाहर किसी अर्थशास्त्री खासकर विदेश से आए किसी व्यक्ति को गवर्नर बनाना उपयुक्त नहीं है। वास्तव में आरबीआई गवर्नर का काम संतोषजनक ढंग से करने के लिए अर्थशास्त्र न ही आवश्यक है और न ही पर्याप्त है। 1977 में आई जी पटेल से पहले कोई भी गवर्नर अर्थशास्त्री नहीं थे। केवल दो को छोड़कर सभी भारतीय सिविल सेवा से थे।

अर्थशास्त्र की समझ रखना या अर्थशास्त्री होना एक अतिरिक्त खूबी हो सकती है मगर इसके लिए विदेश से किसी को लाना जरूरी नहीं है। वास्तव में 2013 तक प्रत्येक अर्थशास्त्री गवर्नर आरबीआई की कमान संभालने से पहले सरकार के साथ काम कर चुके थे। इससे उन्हें 'केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता' को समझने में आसानी हुई। यह सोचना बेवकूफी है कि कोई गवर्नर उस संस्था से स्वतंत्र हो सकता है जो उसकी नियुक्ति करता है। वैसे भी स्वायत्तता की सीमा नियोक्ता परिभाषित करता है, न कि वह जो नियुक्त किया गया है।

श्रेष्ठ गवर्नर बस अपने काम में लगे रहते हैं। सी रंगराजन इसका एक उदारहण हैं। सरल शब्दों में कहें तो जब आरबीआई गवर्नरों को कोई कार्य सौंपा जाता है तो उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे इसे बिना अवांछित टिप्पणी के चुपचाप पूरा कर लें। इस लिहाज से दास सुधार एवं खामोशी दोनों दृष्टिकोण से काफी उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण साबित हुए हैं।

दास ने कड़ी मेहनत की है और कोई अनावश्यक दिखावा नहीं किया है। यही वजह है कि विमल जालान के बाद उनकी स्वायत्तता किसी भी दूसरे गवर्नरों से अधिक है। मंत्री स्तरीय सूक्ष्म प्रबंधन कम से है। यह जरूर है कि उन्हें कभी-कभी दूसरे तरीके से कार्य करने के लिए कहा होगा। आखिर यह रवैया भी काम का ही हिस्सा होता है।

मगर वित्त मंत्रियों का भी अपना रसूख होता है। वास्तव में गवर्नर के साथ संबंध तय करने में मंत्री का सोच अहम होता है। एक बार एक वित्त मंत्री ने बड़े रोष के साथ बताया कि वह संसद के माध्यम से देश के प्रति जवाबदेह हैं, न कि गवर्नर के जरिये। एक वित्त मंत्री ने आरबीआई गवर्नर को अभिमानी तक कह दिया। एक वित्त मंत्री ने एक गवर्नर को इस्तीफा देने के लिए लगभग विवश कर दिया। ऐसे कई उदाहरण हैं।

यह भी सत्य है कि तमिल वित्त मंत्रियों-टीटीके, सी सुब्रमण्यम, पी चिबदंबरम-के गवर्नरों के साथ संबंध उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। कम से कम इस मामले में तो सीतारमण ने अब तक निराश किया है!

गवर्नर और वित्त मंत्री के संबंधों का आधार आपसी विश्वास तो है ही साथ ही व्यक्तित्व का टकराव भी नहीं है। बैंक ऑफ इंगलैंड (बीआई) के पूर्व डिप्टी गवर्नर पॉल टकर ने अपनी पुस्तक 'अनइलेक्टेड पावर' में केंद्रीय बैंक प्रमुखों एवं संवैधानिक संस्थाओं के बीच के आपसी संबंधों की चर्चा की है। 'अन्इलेक्टेड पावर' एक बेमिसाल पुस्तक है। इसे समझना भले ही थोड़ा कठिन है मगर आप केंद्रीय बैंकों पर नजर रखते हैं या उनके काम-काज को समझने की कोशिश करते रहते हैं तो यह पुस्तक पठनीय है। युद्धों के दौरान मॉन्टेग्यू नॉर्मन के बाद से केंद्रीय बैंक प्रमुखों ने अपनी ताकत का इतना प्रदर्शन नहीं किया है जितना अब केंद्रीय बैंक प्रमुख कर रहे हैं। नॉर्मन सरकार तक गिरा सकते थे। लिहाजा कभी-कभी दास भी यह सोचकर विस्मित होते होंगे वह इतने 'सरल' कैसे हैं।

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