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हरियाणा के लिए अब तक अहम रहा गुरुग्राम क्या आगे भी देगा योगदान?

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  November 22, 2021

गुडग़ांव का नाम बदलकर गुरुग्राम रखे जाने के बहुत पहले से वह हरियाणा के जीडीपी में महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी रखता आया है और ऐसा लगता नहीं कि नए कानून की अधिसूचना जारी होने के बाद वहां से कारोबार बड़े पैमाने पर बाहर जा सकते हैं। नए कानून के मुताबिक अगले वर्ष 15 जनवरी से निजी उद्यमों में 75 फीसदी स्थानीय लोगों को रोजगार देना होगा लेकिन यह कानून उन नए कर्मचारियों पर ही लागू होगा जिनकी आय 30,000 रुपये तक होगी और जो कम से कम पांच वर्षों से प्रदेश में रह रहे होंगे। परंतु हमारे सामने कोलकाता (पुराना कलकत्ता) के रूप में एक उदाहरण मौजूद है कि कैसे पूंजी का अंधाधुंध बहिर्गमन एक जीवंत शहर को प्रभावित कर सकता है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि आगे चलकर कहीं गुरुग्राम उसी परिणति को न प्राप्त हो।

आक्रामक श्रम नीतियों ने पश्चिम बंगाल में पूंजी के लिए पहले से असुरक्षित माहौल को और घना कर दिया तथा कारोबारी समुदाय को दूसरी जगहों का रुख करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके साथ ही वह बहुसांस्कृतिक विविधता भी चली गई जिसे आजकल सोशल मीडिया पर बहुत चाव से याद किया जाता है। नए भर्ती कानून के रूप में श्रम नीतियां गुडग़ांव से भी पूंजी के वैसे ही पलायन को जन्म दे सकती हैं।

उदारीकरण के बाद के तमाम बुरे विरोधाभासों के बावजूद हरियाणा का यह क्षेत्र फलता-फूलता रहा। यह राजधानी नहीं है लेकिन राज्य का प्रमुख शहर है और उसके राजस्व में बहुत अधिक योगदान करता है। राष्ट्रीय राजधानी से इसकी करीबी और डीएलएफ के चलते अचल संपत्ति में विस्तार ने इसे स्वत: ही एक महानगर का स्वरूप दे दिया है। यहां बिना पावर ऑफ अटार्नी की जटिल राह अपनाए अच्छे आकार की संपत्ति हासिल की जा सकती है। दरें भी नई दिल्ली की तरह आसमान नहीं छूती हैं। यही वजह है कि विदेशी कंपनियों ने अपने बैक ऑफिस और आईटी सक्षम सेवा केंद्र यहां स्थापित किए हैं और सुदूर विदेशों में सेवाएं दे रहे हैं। इसके साथ ही यहां अफरातफरी भरे शहरी विकास की शुरुआत हुई।

नोएडा जैसे सुनियोजित रूप से विकसित इलाके के उलट राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का यह सिरा नए भारत की अतिरंजनाओं को दर्शाता है। सिंगापुर की तरह कांच और कंक्रीट के ढांचे सड़क पर उग आए हैं जिन पर गुडग़ांव की ग्रामीण स्थिति की छाया देखी जा सकती है। ग्रिड आधारित बिजली की आपूर्ति में इतनी दिक्कत है कि कोई बड़ी कंपनी बिना जनरेटर के काम नहीं कर सकती। सार्वजनिक सुरक्षा की अनुपस्थिति के चलते गेट वाले आवासीय परिसरों की भरमार हो गई है जिनमें काम करने के लिए इनके बाहर स्थित बस्तियों से लोग आते हैं।

गुडग़ांव वह जगह है जो भारत और दुनिया भर के बड़े नामों को अपनी ओर आकर्षित करता है। देश के किसी भी अन्य शहर की तुलना में प्रति वर्ग किलोमीटर विदेशी उपस्थिति यहां ज्यादा है। ऐसा कारोबारी और रिहाइशी दोनों क्षेत्रों में हो रहा है। देश भर के प्रवासी श्रमिक काम की तलाश में यहां आते हैं और इस जगह की विविधता में इजाफा करते हैं। इसका असर वस्तुओं और सेवाओं पर भी देखने को मिला। महंगे रेस्तरां पहले दिल्ली में खुलते और फिर गुडग़ांव में अपनी शाखाएं खोलते। अब यह सिलसिला उलट गया है।

आज साइबर सिटी की इमारतें कर्मचारियों की अनुपस्थिति से सन्नाटे में हैं क्योंकि कर्मचारी अभी भी घरों से काम कर रहे हैं। मॉल भीड़ आकर्षित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और ऊंचे-ऊंचे टावर खाली खड़े हैं तो ऐसी स्थिति में राज्य सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए रोजगार बहाल करना और मांग में इजाफा करना। इसके बावजूद दो माह पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने दावा किया था कि उनके राज्य में बेरोजगारी की समस्या नहीं है। सीएमआईई ने अपने आंकड़ों में बताया था कि राज्य में 35.7 फीसदी बेरोजगारी है। खट्टर ने दावा किया कि सही आंकड़ा 9 फीसदी है। अगर उनके मुताबिक यह मान लिया जाए कि ज्यादातर युवाओं ने बेहतर रोजगार की तलाश में रोजगार एक्सचेंज पर नामांकन कराया है, तो शायद यह आंकड़ा कम होकर 4-5 फीसदी रह जाएगा।

यदि रोजगार की कोई समस्या ही नहीं है तो निजी क्षेत्र पर श्रमिकों की भर्ती को लेकर आरक्षण थोपना अनावश्यक है। यदि इसका लक्ष्य जाट युवा हैं जो सरकारी नौकरी पाने के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण मांग रहे हें, तो यह बात और भी बेतुकी साबित होती है। इन युवाओं में अनेक पहले खेती से जुड़े थे लेकिन खेती का रकबा कम होने के कारण वहां प्रतिफल कम हो गया है और वे कारखानों में या लिपिकीय काम नहीं करना चाहते। इसके बावजूद राज्य में स्थापित होने वाले किसी भी नए उपक्रम को या यहां अपना विस्तार करने वाले उपक्रम को इन कामों के लिए युवाओं की तलाश में समय गंवाना होगा या सरकारी निरीक्षक को यह यकीन दिलाना होगा कि उन्हें अपने काम के लिए स्थानीय युवा नहीं मिल रहे हैं। जब गुडग़ांव का कमजोर बुनियादी ढांचा सामने आएगा तो दिल्ली और नोएडा स्वाभाविक रूप से आकर्षक विकल्प के रूप में सामने आएंगे। इससे भी बुरी बात यह है कि जब नई नीति स्थानीय रोजगार पर खास प्रभाव नहीं डाल पाएगी तो उस तरह के दंगों के लिए भी तैयार रहना होगा जिनके चलते पिछले वर्षों में मुंबई और बेंगलूरु से लोगों को पलायन करना पड़ा था।

गुडग़ांव अतीत में राज्य सरकार के नीतिगत विध्वंस का शिकार रहा है। सन 1990 के दशक के अंत में शराबबंदी के कारण राज्य को राजस्व का भारी नुकसान हुआ और तत्कालीन सरकार तक गिर गई। एक मुख्यमंत्री ने गुडग़ांव के राजस्व को अपने क्षेत्र के लिए इस्तेमाल किया और इसकी कीमत शहर की अधोसंरचना को चुकानी पड़ी। हालांकि इन बातों ने कारोबारी गतिविधियों पर कोई असर नहीं डाला। परंतु अब निजी क्षेत्र की नियुक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास नुकसानदेह साबित हो सकता है। संभव है कोलकाता/कलकत्ता की तरह गुुरुग्राम/गुडग़ांव को भी इसका असर महसूस करने में एक दशक का वक्त लगे।

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