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बैंकिंग को लेकर एक नया साहसी विचार

टीटी राम मोहन /  November 18, 2021

यदि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन सफल रहे तो वहां के ऑफिस ऑफ कंट्रोलर ऑफ करेंसी (ओसीसी) को एक ऐसी महिला प्रमुख मिलेगी जो बैंकिंग की प्रकृति को ही बदलना चाहती है। अमेरिका में बैंकिंग को लेकर कई नियामक हैं। संभवत: ओसीसी उनमें सबसे प्रमुख है। 

वैश्विक संकट के परिणामस्वरूप अमेरिका में भी हवा का रुख बाजार से परे और नियमन तथा राज्य का हस्तक्षेप बढ़ाने की दिशा में हुआ है। कॉर्नेल विश्वविद्यालय की विधि विभाग की प्रोफेसर साउले ओमारोवा को ओसीसी के पद पर नामित करना इसी बदलाव का सूचक है।

ओमारोव उस विचारधारा की हैं जो मानती है कि आज निजी बैंकिंग में बुनियादी खामियां हैं। बैंकों से आशा की जाती है कि वे बचतकर्ताओं और निवेशकों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाएंगे। वे जमा लेकर और ऋण देकर ऐसा करते हैं। व्यवहार में बैंक ऋण देने के पहले जमा लेने की प्रतीक्षा नहीं करते। वे कर्ज देते हैं और दिए गए कर्ज के बदले बाद में जमा लेते हैं। चूंकि बैंक जमा को नकदी माना जाता है इसलिए उनके पास यह नकदी तैयार करने की सुविधा होती है। 

ओमारोवा की विचारधारा के मुताबिक दिक्कत यहीं है। बैंकर अपनी मर्जी से कर्ज दे सकते हैं और उन्हें ऐसा करने का प्रोत्साहन भी मिलता है। जितना ज्यादा ऋण उतना बड़ा बोनस। ऐसे में बैंकिंग में ऋण का बुलबुला बनना आम बात है। बैंकर यह ध्यान नहीं देते कि ऋण उत्पादक आर्थिक गतिविधियों के लिए है या अटकलबाजी से भरी गतिविधियों के लिए।

जब कर्ज में तेजी को इस तथ्य से मिलाया जाए कि बेसल 3 मानकों के तहत बैंक नकदीकरण के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं तो बैंक 33:1 के डेट और इक्विटी अनुपात पर काम कर सकते हैं। केंद्रीय बैंक कोशिश करते हैं कि बैंकों की नकद आरक्षित अनुपात की जरूरत, ब्याज दर और बैंकों की पूंजी आवश्यकता के जरिये नकदी तैयार करने की क्षमता सीमित हो सके। इन उपायों का प्रभाव सीमित रहा है। मुद्रा निर्माण में बैंक भी उतने ही गैर जिम्मेदार हो सकते हैं जितनी कि सरकारें।

ओमारोवा को लगता है कि अब वक्त आ गया है कि बैंकों के कर्ज देने के काम को उनके मौद्रिक काम से अलग किया जाए। बैंकों को बिना मुद्रा निर्माण ऋण देना चाहिए। वह कहती हैं कि इसके लिए जमा को बैंकों से दूर किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि जमा को फेडरल रिजर्व में भेजा जाना चाहिए।

केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्रा (सीबीडीसी) पर चर्चा में पहले ही लोगों के केंद्रीय बैंक के साथ जमा खाते की बात शुरू हो चुकी है। ये बैंकों के डिजिटल वॉलेट की तरह ही होंगे। अधिकांश लोगों का सोचना है कि सीबीडीसी मौजूदा वाणिज्यिक मुद्रा के साथ ही चलन में रहेगी।

ओमारोवा का प्रस्ताव कुछ ज्यादा ही रूढि़वादी है: वह चाहती हैं कि संपूर्ण जमा को फेडरल रिजर्व में स्थानांतरित कर दिया जाए। इन खातों में भी वैसे ही ब्याज मिलेगा जैसे अन्य जमा को मिलता है। यह ब्याज दर अर्थव्यवस्था में ब्याज दर ढांचे को लेकर प्रभावी आधार तैयार करेगी। इससे फेड की ब्याज दर प्रबंधन क्षमता में नाटकीय इजाफा होगा और पारेषण की समस्या का अंत होगा। कुल मिलाकर फेड को बैंकों के जरिये मौद्रिक नीति संचालन की जरूरत न रह जाएगी। 

यहां दो प्रश्न उठते हैं: पहला, यदि बैंक अपना जमा फेड के हाथों गंवा बैठते हैं तो क्या होगा? फेड अपने पास जमा धन का क्या करेगा? ओमारोवा दोनों सवालों का विस्तार से जवाब देती हैं।

बैंक अगर अपने जमा तक पहुंच गंवा देते हैं तो भी कोई दिक्कत नहीं। फेड उन्हें सब्सिडी वाली दर पर फंड मुहैया कराएगा। जिन गतिविधियों के संचालन के लिए फेड के फंड की आवश्यकता नहीं हैं, उनके लिए बैंकों को महंगे ऋण या इक्विटी प्रतिभूति से राशि जुटानी होगी जैसा कि कंपनियां करती हैं।

एक बार जब बैंक जमा तक पहुंच गंवा दें तो भी बैंक चलेंगे और बैंकिंग में शामिल भंगुरता का अंत हो जाएगा। इसके साथ ही जमा बीमा तथा आरक्षित आवश्यकताओं तथा बैंकों की पूंजी आवश्यकताओं का भी समापन हो जाएगा। बैंक नियमन का पूरा जटिल ढांचा ध्वस्त किया जा सकता है। बैंकों की परिसंपत्ति में कोई बदलाव नहीं आता बस फाइनैंसिंग का तरीका बदल जाता है। ओमारोवा इस बिंदु पर बात नहीं करती हैं लेकिन संभावना यही है कि फेड के फंड जमा की तुलना में महंगे होंगे ताकि बैंकों का विशुद्ध ब्याज मार्जिन कम रहे।

यह फेड की बैलेंस शीट में देनदारी वाला हिस्सा है। ओमारोवा परिसंपत्ति क्षेत्र के जिस बदलाव की बात कर रही हैं उसे लेकर अधिक विवाद है। यदि फेड का देनदारी वाला पक्ष सार्वजनिक तक पहुंच की मदद से विस्तारित होता है तो परिसंपत्ति क्षेत्र में भी भारी विस्तार की आवश्यकता होगी। यह कैसे होगा?

इसका एक तरीका तो फेड के रियायती ऋण के रूप में सामने आता है जिसका जिक्र हम ऊपर कर चुके हैं। दूसरा तरीका प्रस्तावित राष्ट्रीय निवेश प्राधिकरण द्वारा जारी प्रतिभूति खरीद के रूप में सामने आ सकता है। इस प्राधिकरण की परिकल्पना एक सार्वजनिक अधोसंरचना एजेंसी के रूप में की गई है जो बुनियादी परियोजनाओं को वित्तीय मदद देगी। निजी-सार्वजनिक भागीदारी में निजी पूंजी और सार्वजनिक प्रबंधन शामिल होता है। इसके विपरीत यह एजेंसी निजी-सार्वजनिक पूंजी और सार्वजनिक प्रबंधन की बात करती है। इसका मानना है कि अधोसंरचना बुनियादी तौर पर सरकार का दायित्व है।

ओमारोवा की योजना केवल बैंकिंग की स्थिरता या मौद्रिक नीति को प्रभावी बनाने से संबद्ध नहीं है। इसका संबंध आम नागरिकों को फेड की बैलेंस शीट तक पहुंच प्रदान करके वित्तीय तंत्र को लोकतांत्रिक बनाने से भी है। इसका संबंध वित्तीय तंत्र में निजी और सार्वजनिक शक्ति के संतुलन को निर्णायक रूप से निजी के पक्ष में करने से भी है।

कहा नहीं जा सकता कि ओमारोवा नामित होंगी या नहीं। आलोचकों का कहना है कि वह पूर्व सोवियत संघ में पली बढ़ी हैं और उनकी कॉलेज थीसिस कार्ल माक्र्स के बारे में हैं। उन्हें समाजवादी कहकर आलोचना की जा रही है और कहा जा रहा है कि वह केंद्रीय नियोजन की वापसी चाहती हैं।

इन सब बातों के बीच भारत में हमें भी ओमारोवा के विचारों के बारे में सोचना चाहिए। ऐसे समय पर जब हम सरकारी परिसंपत्तियों के मुद्रीकरण की चर्चा कर रहे हैं, अधोसंरचना के सार्वजनिक क्षेत्र की प्राथमिक जिम्मेदारी होने की बात को अमेरिकी राष्ट्रपति का समर्थन मिलना मामूली बात नहीं है। ऐसे में जबकि हम बैंकिंग में निजी क्षेत्र की भूमिका कम करने की राह तलाश रहे हैं, तब मुक्त बाजार की धरती पर निजी क्षेत्र की भूमिका सीमित करने का विचार जोर पकड़ रहा है।

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