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दूसरी पारी का आधा सफर

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  November 12, 2021

नरेंद्र मोदी ने 30 मई, 2019 को प्रधानमंत्री के रूप में दूसरी बार शपथ ग्रहण की थी और वह अपने दूसरे कार्यकाल की आधी अवधि पूरी करने से एक पखवाड़ा दूर हैं। उन्होंने भारत को बदलने के लिए जो 10 वर्ष चाहे थे उनमें से साढ़े सात वर्ष का समय पूरा होने वाला है। उनके आर्थिक प्रदर्शन का आकलन कैसे किया जाएगा? चूंकि कोविड का असर मार्च 2020 के अंत में महसूस किया गया इसलिए बेहतर होगा कि मोदी के पहले छह वर्ष के कार्यकाल का अलग आकलन हो और बाद की अवधि को अलग से आंका जाए। इससे एक विचित्र संयोग उत्पन्न होता है: आधिकारिक आंकड़े दिखाते हैं कि उनके शुरुआती छह वर्ष के कार्यकाल में जीडीपी वृद्धि करीब उतनी रही जितनी कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल के आखिरी छह वर्षों यानी 2008 से 2014 के बीच थी। मोदी के कार्यकाल में यह 48.6 फीसदी रही जबकि सिंह के कार्यकाल में 48.4 फीसदी थी।

यानी 2019-20 तक मोदी का आर्थिक प्रदर्शन वैसा तबाही भरा नहीं था जैसा मनमोहन सिंह का अनुमान था। लेकिन अर्थव्यवस्था नीति आयोग तथा कुछ अन्य लोगों के अनुमान के मुताबिक दो अंकों में भी वृद्धि नहीं हासिल कर सकी। प्रधानमंत्री के सहयोगियों का यह कहना सही है कि अगर फंसे हुए कर्ज की समस्या विरासत में नहीं मिली होती तो शायद प्रदर्शन बेहतर होता। दूसरी ओर, पद संभालते ही उन्हें तेल कीमतों में भारी गिरावट का फायदा भी मिला क्योंकि इससे उन्हें शुरुआती वर्षों में जीडीपी वृद्धि को गति देने में मदद मिली। इससे मुद्रास्फीति नियंत्रित करने में मदद मिली और व्यापार संतुलन सुधरा।

मोदी के आलोचक कहते हैं कि नोटबंदी और खराब वस्तु एवं सेवा कर ने असंगठित क्षेत्र और रोजगार को भारी नुकसान पहुंचाया। यदि इसकी इंसानी लागत और इनसे उत्पन्न बेरोजगारी को एक पल के लिए किनारे कर दें और विशुद्ध आर्थिक वृद्धि पर नजर डालें तो हालात अव्यवस्थित बने रहे। वह भी तब जब आप आधिकारिक आंकड़ों पर विश्वास करें। ऐसे भी लोग हैं जो इन आंकड़ों पर यकीन नहीं करते और निर्यात में ठहराव तथा 2011 से नजर आ रहे तमाम अन्य संकेतकों मसलन ऋण वृद्धि, कॉर्पोरेट मुनाफे और निवेश में कमी का जिक्र करते हैं।

दो मोर्चों पर मोदी के प्रयासों की छाप साफ नजर आती है। एक है सरकारी कार्यक्रमों को प्रभावी और बेहतर लक्षित बनाने में तकनीक का इस्तेमाल और दूसरा मौजूदा कल्याण योजनाओं का विस्तार। 'उत्पादन' के आंकड़े बहुत प्रभावशाली हैं, फिर चाहे बात नए बनने वाले मकानोंं और शौचालयों की हो, नए बैंक खातों और गैस कनेक्शनों की, नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में तेज क्षमता विस्तार की, चिकित्सा बीमा की या फिर नल जल योजना की। लेकिन 'नतीजों' में जो इजाफा नजर आना चाहिए वह नहीं आता।

उदाहरण के लिए बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा के आंकड़े, गरीबी के आंकड़ों में कमी या वायु प्रदूषण में कमी के क्षेत्र में। बल्कि अगर खपत में ठहराव या गिरावट तथा रोजगार के आंकड़ों को ध्यान में रखा जाए तो कहा जा सकता है कि गरीबी में इजाफा ही हुआ है। हमारे सामने एक नई दोयम व्यवस्था है: लाखों लोगों को रहने की बेहतर व्यवस्था का लाभ पहली बार मिला है लेकिन इसके बावजूद उन्हें बेेहतर वेतन के लिए अच्छे काम यानी वादे के मुताबिक अच्छे दिन का अब भी इंतजार है।

इसके बाद कोविड काल की बात आती है जो गलतियों से सीखने का समय रहा। पहला देशव्यापी लॉकडाउन एक बुनियादी गलती थी। प्रवासी श्रमिकों के कष्ट याद कीजिए। यही वजह है कि दूसरे लॉकडाउन में अलग तरीके से कदम उठाए गए। टीकाकरण कार्यक्रम धीमा और देर से शुरू हुआ लेकिन इसके बाद इसने गति पकड़ी जो एक बार फिर गंवा दी गई। देश कोविड की दूसरी लहर के लिए तैयार नहीं था और महामारी पर समय से पहले जीत की घोषणा कर दी गइ्र्र। परंतु सरकार की राह कठिन बनी रही। मौत का आधिकारिक आंकड़ा करीब पांच लाख हो चुका है लेकिन स्वतंत्र अनुमानों के मुताबिक यह इससे कई गुना अधिक है। 2020-21 में अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा असर हुआ लेकिन सुधार भी उतना ही तेज दिखा। हर मानक पर कुछ देशों ने अच्छा तो अन्य ने खराब प्रदर्शन किया।

इस बीच मोदी के शासन की शैली स्पष्ट रही: बड़े-बड़े वादे करो(मसलन किसानों की आय दोगुनी करना), अधिकारियों को अतिमहत्त्वाकांक्षी कार्यक्रमों के लक्ष्य हासिल करने काम पर लगाना, सफलता पर जोर देना और नाकामियों पर से ध्यान हटाने के लिए नए लक्ष्य तय करना तथा निरंतर छवि चमकाना। यदि उत्पादन और नतीजों का यह दोहरापन बना हुआ है तो इसलिए कि यह सरकार चुनिंदा कार्यक्रमों पर ध्यान देती है और क्षेत्रवार सुधारों पर इसका प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं है। तेज वृद्धि, रोजगार निर्माण और गरीबी कम करने के मामले में तो यह बहुत ही कमजोर है।

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