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एयर इंडिया की बिक्री और आगे की राह

ए के भट्टाचार्य /  November 11, 2021

मोदी सरकार ने गत महीने एयर इंडिया के निजीकरण का महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया। यह निर्णय मोदी सरकार के निजीकरण कार्यक्रम के महत्त्व को रेखांकित करता है। गत 18 वर्ष में पहली बार किसी सरकारी उपक्रम की सीधी बिक्री हुई है। एयर इंडिया पर भारी भरकम कर्ज को देखते हुए यह सौदा आसान नहीं था। इसमें दो राय नहीं कि इस बिक्री से सरकार को बहुत कम पैसा मिला और उस पर कर्ज भी है जो नई बनी होल्डिंग कंपनी को स्थानांतरित किया गया है। लेकिन दिसंबर में सौदा पूरा होने के बाद सरकार के रोज खर्च होने वाले 20 करोड़ रुपये बचेंगे।

यदि एयर इंडिया अपने पुराने मालिक टाटा समूह के पास जाती है तो सरकार के पास देखरेख के लिए कोई विमानन कंपनी नहीं रहेगी। क्या इसका यह अर्थ नहीं कि निजीकरण के निर्णय के तत्काल बाद नागर विमानन मंत्रालय में कुछ अहम पुनर्गठन किया जाए क्योंकि यह मंत्रालय एयर इंडिया की देखरेख करता रहा है। यदि केंद्र के स्तर पर नागर विमानन मंत्रालय का पुनर्गठन नहीं किया गया तो एयर इंडिया की बिक्री के पूरे लाभ नहीं हासिल होंगे। इस मंत्रालय में सुधार लंबे समय से लंबित हैं और एयर इंडिया की बिक्री से ऐसे निर्णय तेज होने चाहिए।

केंद्रीय नागर विमानन मंत्रालय क्या करता है? मंत्रालय देश में नागर विमानन क्षेत्र से जुड़े कार्यक्रम और नियमन तथा राष्ट्रीय नीतियां तैयार करता है। यह विमान अधिनियम, विमान नियम तथा इस क्षेत्र के कुछ अन्य कानूनों के लिए भी जवाबदेह है। सबसे अहम, मंत्रालय नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए), नागर विमानन सुरक्षा ब्यूरो (बीसीएएस), भारतीय विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण (एइ्र्रआरएआई), रेलवे सुरक्षा आयोग (सीआरएस), विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी), भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) और एयर इंडिया पर नियंत्रण रखता है।

एयर इंडिया की बिक्री के बाद नागर विमानन मंत्रालय के पास जरूर आवश्यकता से अधिक कर्मचारी होंगे। वरिष्ठ अधिकारियों के काम के आवंटन पर नजर डालें तो पता चलता है कि एयर इंडिया का अधिकांश काम तीन वरिष्ठ अधिकारियों करते हैं- एक संयुक्त सचिव, एक निदेशक और एक अवर सचिव। इन अधिकारियों को आसानी से दूसरे मंत्रालयों में भेजा जा सकता है या मंत्रालय में कर्मचारियों की तादाद कम की जा सकती है। मंत्रालय के आकार में कटौती की वजह केवल एयर इंडिया की बिक्री नहीं है। विमानन क्षेत्र के चंद कानूनों और नियामकीय संस्थाओं की निगरानी के लिए 2,300 कर्मचारियों की क्या जरूरत है?

आदर्श स्थिति में डीजीसीए को स्वतंत्र नियामकीय संस्थान बनाया जाना चाहिए। विमानन नियामक को मंत्रालय का विस्तार नहीं होना चाहिए। इसके बजाय इसे स्वतंत्र और उपयुक्त अधिकार संपन्न नियामक होना चाहिए जो विमानन मंत्रालय से प्रभावित न हो। एक नियामक के काम की निगरानी के लिए मंत्रालय में संयुक्त सचिव तथा निदेशक एवं अवर सचिव जैसे अधिकारियों की जरूरत नहीं। इससे नियामक की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। मंत्रालय को नीति बनाकर डीजीसीए को नीति क्रियान्वयन का अधिकार देना चाहिए। यदि डीजीसीए के निर्णयों के खिलाफ विमानन कारोबार शिकायत करना चाहें तो शिकायत निवारण संस्था का गठन किया जाना चाहिए। विवाद निस्तारण का काम मंत्रालय पर नहीं छोडऩा चाहिए।

इसी तरह एईआरएएआई के साथ भी मंत्रालय को ऐसे संस्थान के रूप में व्यवहार नहीं करना चाहिए जिस पर उसका प्रशासनिक नियंत्रण है। कई हवाई अड्डों के स्वामित्व और नियंत्रण को निजी उपक्रमों को सौंपने की योजना के बीच एईआरएआई को भी नागर विमानन मंत्रालय के विस्तार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह धारणा समाप्त करनी होगी कि निजी क्षेत्र के सेवा प्रदाता अपने राजनीतिक संपर्क का इस्तेमाल करके प्रतिद्वंद्वियों पर अनुचित लाभ हासिल करेंगी।

बीसीएएस तथा एएआईबी जैसे संस्थानों का कामकाज नागर विमानन मंत्रालय से स्वतंत्र होना चाहिए। इन संस्थानों के कामकाज और इनकी भूमिका तभी सबसे बेहतर हो सकती है जब वे मंत्रालय के विस्तार के रूप में न काम करें। उनके निर्माण के पीछे इरादा वही था जो डीजीसीए और एईआरएआई के गठन के पीछे यानी सरकार द्वारा तय नीति के व्यापक ढांचे के तहत स्वायत्त काम करना। लेकिन फिलहाल वे मंत्रालय के हिस्से के रूप में काम करते हैं।

सीआरएस कार्यालय को स्वतंत्र निकाय के रूप में नई जगह स्थापित करने को लेकर ज्यादा बहस की गुंजाइश नहीं है। नागर विमानन मंत्रालय के तहत इस कार्यालय का गठन इसलिए किया गया था ताकि इसे जरूरी स्वायत्तता और स्वतंत्रता मिल सके और यह रेल दुर्घटनाओं की निष्पक्ष जांच कर सके तथा सुरक्षा मानकों का प्रवर्तन कर सके। यही कारण है कि इसे नागर विमानन के प्रशासनिक नियंत्रण में रखा गया। अब वक्त आ गया है कि सीआरएस को वाकई में एक स्वतंत्र और अधिकार संपन्न निकाय बनाया जाए जो रेल सुरक्षा और दुर्घटनाओं की जांच करे। इसे नागर विमानन मंत्रालय के अधीन रखने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा।

उपरोक्त कदम उठाने के बाद केवल सरकारी उपक्रम एएआई की निगरानी ही नागरिक उड्डयन मंत्रालय के पास रह जाएगी। ऐसे में सवाल उठेगा कि घटी ही भूमिका के मुताबिक ही मंत्रालय के आकार में भी कटौती क्यों न की जाए? विमानन मंत्रालय में कर्मचारियों की तादाद कम करने से यह अधिक सक्षम होगा। इससे डीजीसीए, एईआरएआई जैसे नियामक संस्थान तथा बीसीएएस तथा एएआईबी सही मायनों में स्वायत्त हो सकेंगे। विमानन मंत्रालय भी इन्हें प्रभावित करने के बजाय नीति निर्माण की अपनी भूमिका पर ध्यान दे सकेगा।

यदि नागर विमानन मंत्रालय में यह पुनर्गठन किया जा सका तो अन्य केंद्रीय मंत्रालयों में भी इस उदाहरण को अपनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि बैंकों का निजीकरण करना है तो वित्तीय सेवा विभाग की भूमिका और प्रासंगिकता पर भी नए सिरे से विचार होना चाहिए। यदि ऐसे सुधार होते हैं तो एयर इंडिया और बैंकों के निजीकरण का लाभ केंद्रीय मंत्रालयों के संचालन ढांचे में छंटनी के रूप में सामने आ सकता है।

सन 1977 में प्रधानमंत्री पद संभालने के तत्काल बाद मोरारजी देसाई ने एक ईमानदार और सक्षम बैंकिंग सचिव से कहा था: 'मैं बैंकिंग विभाग को भंग करना चाहता हूं लेकिन मैं आपको नहीं हटाऊंगा।' हालांकि देसाई बैंकिंग विभाग को केवल एक शाखा में बदल सके। 45 वर्ष बाद एक अन्य गुजराती प्रधानमंत्री के पास अवसर है कि वह किसी मंत्रालय या विभाग को समाप्त करे या उसका आकार छोटा करे। देसाई की तरह संभव है उन्हें भी पूरी सफलता न मिले। लेकिन इस दिशा में आंशिक कदम भी देश के संचालन ढांचे के लिए लाभदायक होगा।

Keyword: एयर इंडिया, बिक्री, निजीकरण, विमानन मंत्रालय, नियामकीय सुधार, टाटा समूह, डीजीसीए,
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