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अफसरशाही में जाया न हों इंजीनियर और चिकित्सक

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  11 09, 2021

प्रधानमंत्री ने विविध बिंदुओं वाले एक सुधार कार्यक्रम की बात कही है। इनमें एक बिंदु प्रशासनिक सुधारों का भी है। इस बात ने मुझे कुछ याद दिलाया। कुछ दिन पहले लोकप्रिय टेलीविजन कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन एक युवती से सवाल पूछ रहे थे। उस युवती ने कहा कि वह लगभग पूर्ण प्रशिक्षित चिकित्सक है लेकिन वह अफसरशाही में जाना चाहती है और उसकी प्राथमिकता है भारतीय प्रशासनिक सेवा। इस कथन में उन भारतीयों के लिए गंभीर सवाल छिपे हुए हैं जो अन्यथा राजनेताओं द्वारा राष्ट्रीय संसाधनों को बरबाद किए जाने को लेकर काफी चिंतित रहते हैं: क्या यह अपने आप में सबसे बड़ी बरबादी नहीं है कि एक पूर्ण प्रशिक्षित चिकित्सक अफसरशाह बन जाए? क्या आप एक पूर्ण प्रशिक्षित विमान चालक को उड़ान सहायक बनाएंगे? या किसी परिचारिका को हृदय का शल्य चिकित्सक?

अरविंद केजरीवाल का उदाहरण लीजिए जो आईआईटी से पढ़े हुए इंजीनियर हैं। वह पहले आय कर अधिकारी बने, उसके बाद सामाजिक कार्यकर्ता और आखिरकार राजनेता। क्या वह बिना इंजीनियर बने बाद वाले तीनों काम नहीं कर सकते थे, वह भी एक आईआईटी से?

निश्चित तौर पर हमारा कानून ऐसी कोई मांग नहीं करता कि नेताओं का शिक्षित होना जरूरी हो। यह सवाल उन सभी इंजीनियरों और चिकित्सकोंं से पूछा जाना चाहिए जो इन सेवाओं में शामिल हो रहे हैं। यदि उन्हें ऐसा ही करना था तो आखिरकार वे इंजीनियर या डॉक्टर क्यों बने?

जाहिर है इसका जवाब हर किसी को पता है। उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि हमारे देश में सरकारी सेवाओं के चलते हासिल होने वाली सत्ता और कद की अहमियत बहुत अधिक है। वहीं कुछ लोग इनका चयन इसलिए भी करते हैं क्योंकि सरकारी सेवाएं समृद्धि का रास्ता खोलती हैं।

एक दिलचस्प बात यह है कि कई राज्य और नगर निकाय अपने चिकित्सकों और इंजीनियरों को महीनों तक वेतन नहीं देते हैं लेकिन इसके बावजूद वे सरकार का हिस्सा बनना चाहते हैं। प्रमुख सिविल सेवा में शामिल होने की इच्छा इसलिए भी हो सकती है कि अफसरशाही में वेतन हमेशा समय पर मिलता है इसके अलावा आम जनता पर शासन करने की क्षमता तो रहती ही है। हिंदी में इसे ही 'सोने पे सुहागा' कहा गया है।

मेरे जो मित्र यूपीएससी के साक्षात्कार बोर्ड में रह चुके हैं या अब भी वहां हैं, उनका कहना है कि लिखित परीक्षा पास करने और प्रथम श्रेणी की सेवाओं के लिए साक्षात्कार में शामिल होने वाले प्रत्याशियों में से 50 फीसदी पूरी तरह प्रशिक्षित इंजीनियर या चिकित्सक थे। हो सकता है यह आंकड़ा कुछ ज्यादा हो लेकिन अगर यह इसका आधा हो तो भी सवाल तो बनते हैं। किसी इंजीनियर या चिकित्सक के प्रशिक्षण पर करोड़ों रुपये क्यों खर्च किए जाएं जबकि उसे वही नौकरी करनी है जो 10-15 लाख रुपये खर्च करके पढ़ा व्यक्ति भी पा सकता है। ऐसा इसलिए कि कला तथा बुनियादी विज्ञान विषयों में शिक्षण शुल्क और शिक्षकों का वेतन काफी कम है। सीधी सी बात है जरूरी नहीं कि अफसरशाह इंजीनियर या डॉक्टर हों। उन्हें अलग तरह के बौद्धिक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है जिसे हासिल करने में कुछ लाख रुपये लगते हैं। इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि वे कमतर हैं। बल्कि इससे मदद ही मिलती है।


दूसरा सर्वश्रेष्ठ हल

आदर्श स्थिति में चिकित्सकोंं और इंजीनियरों को केंद्र और राज्य स्तर की अफसरशाही में प्रवेश लेने से प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए क्योंकि बतौर चिकित्सक और इंजीनियर उनकी उपयोगिता कहीं अधिक है। लेकिन संविधान का अनुच्छेद 14 ऐसे किसी आधार पर भेदभाव को वर्जित करता है। ऐसे में प्रतिबंध लगाना संभव नहीं है।

ऐसे में राष्ट्रीय संसाधनों के इस प्रकार दुरुपयोग को रोकने का क्या तरीका हो सकता है? एक बात यह भी है कि राष्ट्रीय संसाधनों को यह क्षति कोई मामूली क्षति नहीं है। केवल इसलिए नहीं कि वे लोग वह काम नहीं करते जिसका उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है बल्कि वे कुछ अन्य लोगों को चिकित्सक या इंजीनियर बनने से रोकते भी हैं।

बगैर संवैधानिक अधिकारों का हनन किए इस बरबादी को रोकने का एक तरीका यह है कि सरकार एक साधारण प्रशासनिक आदेश जारी करे और कहे कि अफसरशाही में जाने वाले सभी चिकित्सक और इंजीनियर किसी अन्य पद के काबिल बनने के पहले 20 वर्ष का समय सरकारी अस्पतालों और लोक निर्माण विभाग में देंगे, तभी उन्हें अन्य पदों की अर्हता मिलेगी। ऐसा करना पूरी तरह सरकार के अधिकार में है।

यदि ऐसा किया गया तो इन चिकित्सकोंं और इंजीनियरों पर खर्च होने वाली राशि का सही उपयोग भी हो सकेगा और लोगों को सत्ता का हिस्सा बनने का संतोष भी हो सकेगा। आखिरकार उनका कद उन तीन अक्षरों से ही तय होता है जो उनकेनाम के बाद लिखे होते हैं। यहां तक कि सेवानिवृत्ति के बाद भी ऐसा ही होता है।


एक और सुधार

एक अन्य सुधार जो लंबे समय से लंबित है वह है प्रारंभिक लिखित परीक्षा का तरीका। इसके साथ समस्या यह है कि इस परीक्षा के जरिये परीक्षार्थी की स्मृति की परीक्षा होती है बस। ऐसे में रोबोटिक कौशल वालों को बढ़त मिलती है जबकि लोक सेवा के लिए जरूरी प्रमुख कौशल मसलन गैर मात्रात्मक चीजों के आकलन की क्षमता का पता नहीं चल पाता। इसके लिए स्वतंत्र आकलन और निर्णय की क्षमता का होना आवश्यक है। यदि सामाजिक न्याय के नाम पर हमें केवल रोबोटिक कौशल ही हासिल हो रहा है तो कृत्रिम मेधा का इस्तेमाल करना ही कौन सा बुरा है? कम से कम रोबोट नागरिकों को प्रताडि़त तो नहीं करते और न ही वे राजनीति करते हैं।

Keyword: अफसरशाही, इंजीनियर, चिकित्सक, टेलीविजन, विमान चालक, राजनेता, आईआईटी,
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