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जलवायु परिवर्तन, भारत और वैश्विक भविष्य

श्याम सरन /  November 08, 2021

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लासगो में जिस पांच बिंदुओं वाली पंचामृत प्रतिज्ञा की बात की, उसके महत्त्व का आकलन करने के पहले जलवायु परिवर्तन को लेकर चल रही मौजूदा बहस के कुछ बिंदुओं को स्पष्ट करना जरूरी है। विभिन्न देशों से कहा जा रहा है कि वे सन 2050 तक विशुद्ध शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करें। 'विशुद्ध शून्य उत्सर्जन' बैलेंस शीट से संबंधित अवधारणा है। वैश्विक उत्सर्जन को सन 2050 तक शून्य करने की आवश्यकता नहीं है। कार्बन उत्सर्जन में इजाफा जारी रह सकता है, बशर्ते कि इस उत्सर्जन के समायोजन के लिए इससे अधिक कार्बन की खपत की जाए। वनों और समुद्र के रूप मेंं प्रकृति ने हमें ऐसे माध्यम दिए हैं जो कार्बन अवशोषण कर सकते हैं। इनमें समुद्र के भीतर और तटीय इलाकों में होने वाले पेड़ पौधे भी शामिल हैं। कार्बन कैप्चर ऐंड स्टोरेज (सीसीएस) और भू-इंजीनियरिंग उपायों जैसे तकनीकी रूप से व्यवहार्य तरीके भी हैं। निकट भविष्य में केवल प्राकृतिक अवशोषण केंद्रों में विस्तार करके ही नकारात्मक उत्सर्जन बढ़ाया जा सकता है लेकिन 2050 तक के लिए जरूरी क्षमता हासिल करने में दिक्कत हो सकती है।

अब एक नजर डालते हैं एक अन्य बहुपक्षीय आयोजन पर जो अक्टूबर के मध्य में कुमिंग में हुआ- यह था जैव विविधता को लेकर विभिन्न देशों का सम्मेलन। इसने हमारा ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि किस तेजी से दुनिया के वन समाप्त हो रहे हैं। इसके लिए लकड़ी के लिए वनों की कटाई, जंगल में लगने वाली आग तथा पर्यावरण के स्तर में गिरावट जवाबदेह हैं। समुद्रों में प्लास्टिक का ढेर लग गया है जबकि खतरनाक कचरे के निपटान से तमाम डेल्टा क्षेत्र मृत क्षेत्रों में तब्दील हो गए जहां समुद्री जीवन संभव नहीं है। बढ़ते तापमान और समुद्रों में प्रदूषण के चलते उनमें भी कार्बन उत्सर्जन की खपत क्षमता कम हुई है। अनुमान है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का एक तिहाई इन प्राकृतिक माध्यमों द्वारा अवशोषित किया जाता रहा है लेकिन यह क्षमता अब छीज रही है। जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता एक ही सिक्केके दो पहलू हैं। आप पृथ्वी की जैव विविधता को नुकसान पहुंचाते हुए जलवायु परिवर्तन से नहीं निपट सकते।

अब तक जो भी तकनीकी उपाय सुझाए गए उनसे कोई उत्साहित करने वाला नतीजा सामने नहीं आया है। सीसीएस तो दो दशक से मौजूद है लेकिन अब तक किसी कोयला आधारित बिजली संयंत्र को इस तकनीक के जरिेये फिल्टर नहीं किया गया। यदि 1,000 मेगावॉट क्षमता वाले ताप बिजली संयंत्र की लागत एक अरब डॉलर आती है तो सीसीएस की स्थापना में भी इतनी ही राशि लगेगी। यह आर्थिक दृष्टि से व्यवहार्य नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2070 तक विशुद्ध शून्य उत्सर्जन लक्ष्य हासिल करने की बात कही है लेकिन इससे दुनिया में जीवों को उत्पन्न खतरे को कम करने में मदद नहीं मिलने वाली। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ग्लासगो में भौतिक रूप से उपस्थित नहीं थे। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी केंद्रीय भूमिका में नजर आए। वह कई वैश्विक नेताओं के साथ मित्रवत चर्चा करते दिखे और यह बात घरेलू स्तर पर कारगर रहने वाली है। उत्सर्जन स्तर में अंतर को देखते हुए भारत का चीन के मात्र 10 वर्ष बाद विशुद्ध शून्य का लक्ष्य हासिल करना उचित और तार्किक नजर आता है। बहरहाल 2070 और 2050 अभी काफी दूर हैं। खासकर दुनिया भर में तेज होते तकनीकी विकास के लिहाज से। हम डेटा संचालित नई दुनिया में हैं और आशावादी लोग मानते हैं कि कृत्रिम मेधा और मशीन की मदद से जलवायु परिवर्तन की समस्या का हल निकलेगा। लेकिन यह खतरनाक दांव है।

अब देशों ने प्रतिज्ञा ली है कि 2030 तक मीथेन उत्सर्जन 30 फीसदी कम किया जाएगा और उसी वर्ष से निर्वनीकरण की प्रक्रिया को भी पलटा जाएगा। मीथेन अल्प आयु वाली ग्रीनहाउस गैस है लेकिन यह कार्बन डाइऑक्साइड को गर्म करने में योगदान करती है। ग्रीनलैंड और साइबेरिया में बर्फ पिघलने से उनके नीचे दबी मीथेन वातावरण में फैल सकती है। वहीं निर्वनीकरण की प्रक्रिया को तब तक नहीं पलटा जा सकता है जब तक कि वृक्षों की कटाई को पौधरोपण पर तवज्जो दी जाती रहेगी।

इस संदर्भ में देखें तो शेष चार अमृत तत्त्व, जिनका उल्लेख प्रधानमंत्री मोदी ने किया था वे अधिक निकट, महत्त्वपूर्ण और अहम हैं। मोदी ने यह प्रतिज्ञा जताई कि 2030 तक भारत की गैर जीवाश्म ईंधन क्षमता 500 गीगावॉट हो जाएगी, पहले 450 गीगावॉट का लक्ष्य तय किया गया था। नवीकरणीय और स्वच्छ ऊर्जा पर जोर दिया जा रहा है जिसके चलते अब से 2030 के बीच अरबों टन कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी। सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली वृद्धि में कार्बन की तीव्रता 2030 तक 45 फीसदी कम होगी जबकि पेरिस में इसके 33-35 फीसदी रहने का लक्ष्य तय किया गया था। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि 2030 तक देश की ऊर्जा का 50 फीसदी हिस्सा गैर जीवाश्म ईंधन से आएगा। बाद में विदेश सचिव ने स्पष्ट किया कि प्रधानामंत्री उस समय तक स्थापित उत्पादन क्षमता का जिक्र कर रहे थे। पहले इसे 40 फीसदी तय किया गया था। हालांकि इसका अर्थ यह भी है कि निकट भविष्य में कोयला आधारित उत्पादन प्रमुखता से बना रहेगा।

ये प्रतिज्ञाएं निश्चित रूप से बढ़ी हुई महत्त्वाकांक्षा दर्शाती हैं और विकसित देशों पर दोबारा ध्यान केंद्रित कर दिया है क्योंकि वे अभी भी अपनी जवाबदेही से भाग रहे हैं और ऊर्जा परिवर्तन का बोझ लगातार विकासशील देशों पर डाल रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी की यह मांग सही थी कि जलवायु को लेकर उचित निर्णय हों और विकसित देश, विकासशील देशों द्वारा जलवायु परिवर्तन के लिए उपयुक्त कदम उठाने को लेकर समुचित वित्तीय और तकनीकी मदद मुहैया कराएं। उन्होंने एक लाख करोड़ डॉलर की राशि का उल्लेख किया लेकिन इसके वितरण के लिए समयावधि का जिक्र नहीं किया था।

अंतरराष्ट्रीय सौर गठजोड़ में भी कुछ खास प्रगति नहीं हुई है। इसकी पहल 2015 में पेरिस में भारत ने ही की थी। 2018 में घोषित एक सूर्य, एक ग्रिड, एक विश्व परियोजना को यूके के साथ मिलकर आगे बढ़ाया गया है लेकिन उसके पास अपनी एक संबद्ध हरित ग्रिड परियोजना है। साझा सीमा पार ग्रिड तैयार करना बहुत कठिन काम है। विश्व स्तर तो छोडि़ए, क्षेत्रीय स्तर पर ऐसी ग्रिड तैयार करना भी आसान नहीं। दुनिया के संवेदनशील हिस्सों में मौसम की अतिरंजित घटनाओं के बढऩे को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कॉलिशन फॉर डिजास्टर रिसाइलेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर के तहत इन्फ्रास्ट्रक्चर फॉर रिसाइलेंट आइलैंड स्टेट्स नामक पहल की घोषणा की। इसके लिए वित्तीय सहायता जुटाना प्रमुख चुनौती है। भले ही इस पर तत्काल ध्यान न दिया जाए लेकिन इससे भारत की पर्यावरण प्रतिबद्धताओंको मजबूती मिलेगी।

(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं)

Keyword: जलवायु परिवर्तन, भारत, ग्लासगो, कार्बन उत्सर्जन, सीसीएस, प्लास्टिक,
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