बिजनेस स्टैंडर्ड - वातावरण में कैसे कम हो कार्बन उत्सर्जन
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वातावरण में कैसे कम हो कार्बन उत्सर्जन

अजय शाह और अक्षय जेटली /  November 07, 2021

वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मौजूदगी कम करने की प्रक्रिया (डिकार्बनाइजेशन) के लिए सरकारें अत्यंत जरूरी हैं। कार्बन डाइऑक्साइड एक प्रदूषक है जहां एक व्यक्ति द्वारा किया गया उत्सर्जन दूसरों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। प्रदूषण फैलाने वालों को बढ़ावा न मिले यह सुनिश्चित करने में राज्य की भूमिका है। जीवाश्म ईंधन आधुनिक अर्थव्यवस्था में इस कदर शामिल हैं कि डिकार्बनाइजेशन का सभी समाजों पर गहरा प्रभाव पडऩा लाजिमी है। ऊर्जा के उत्पादन और खपत के तरीके में बड़ा बदलाव लाने की आवश्यकता है। यदि केंद्रीय स्तर पर योजना बनाई जाए तो न्यूनतम सामाजिक लागत के साथ ऐसा किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन से जुड़ा बड़ा विचार यह है कि कार्बन डाइऑक्साइड प्रदूषक है। कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करने वाला हर व्यक्ति  दुनिया के दूसरे व्यक्ति पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।  यह बाजार की विफलता है: अगर लोगों को उनकी मर्जी पर छोड़ दिया जाए तो हवा में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाएगी। बाजार की इस विफलता से निपटने में बाजार की अहम भूमिका है। इसलिए हमारी निगाहें सीओपी26 जैसी बैठकों की ओर होती हैं जहां दुनिया भर की सरकारें ऐसे समझौतों पर काम करती हैं जिनकी मदद से कार्बन उत्सर्जन में कमी की जा सके।

आधुनिक अर्थव्यवस्था में ऊर्जा और जीवाश्म ईंधन बहुत गहराई से गुथे हुए हैं। देश में हर जगह कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए सर्वाधिक किफायती तरीके को लेकर स्थानीय स्तर पर संतुलन कायम करने का प्रयास किया जा रहा है। उदाहरण के लिए मुंबई में पश्चिमी घाट पर सीढ़ीदार व्यवस्था से पानी को प्राकृतिक और कृत्रिम जलाशयों में भंडारित कर ऊर्जा भंडारण के स्वाभाविक अवसर तैयार होते हैं। नवीकरणीय ऊर्जा और पंप की मदद से भंडारित पनबिजली इन स्थानों पर काफी आकर्षक है। राजस्थान में सूर्य की रोशनी की कमी नहीं है। नेपाल और भूटान से लगने वाली पूरी सीमा पर पनबिजली तैयार करने के प्राकृतिक अवसर हैं। पश्चिम एशिया में सौर ऊर्जा की मदद से हाइड्रोजन तैयार की जा सकती है और देश के तटवर्ती इलाकों में आपूर्ति भी की जा सकती है।

इनमें से हर परिस्थिति में मांग और आपूर्ति को लेकर स्थानीय स्तर पर विचार करना होता है। भारत में जलवायु और ऊर्जा को लेकर होने वाली चर्चा में आपूर्ति क्षेत्र पर काफी जोर दिया जाता है। परंतु मांग क्षेत्र पर भी उतना ही ध्यान देने की आवश्यकता होती है। समायोजन का पूरा बोझ आपूर्ति क्षेत्र पर होगा तो कठिनाई अधिक होगी। आने वाले समय में अधिक ऊर्जा खपत वाले कारखानों के मालिक अपने कारखाने उन जगहों पर लगाएंगे जहां ईंधन सस्ता हो। पर्यावरण, समाजा और संचालन से जुड़े निवेश वाली कंपनियां तथा विकसित देशों में निर्यात करने वाली कंपनियां उन जगहों को प्राथमिकता देंगी जहां वे सस्ती नवीकरणीय ऊर्जा खरीद सकें। केंद्रीय नियोजकों की नई पीढ़ी ऊर्जा, कार्बन तथा वैकल्पिक तकनीक को लेकर नया सोच रखती है और इसीलिए देश में राष्ट्रीय सौर मिशन, राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन, राष्ट्रीय इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन प्लान तथा अन्य की शुरुआत की गई।

भारत में हम केंद्र सरकार द्वारा तय भौतिक लक्ष्यों के मुताबिक चलते हैं और उसके बाद आदेश और नियंत्रण प्रणाली अपनाई जाती है जहां लक्ष्य प्राप्ति के लिए लक्ष्य तय किए जाते हैं। इन योजनाओं के साथ दिक्कत यह है कि किसी को पता नहीं होता कि भविष्य में ऊर्जा व्यवस्था क्या रूप लेगी। इस केंद्रीय नियंत्रण के कारण डिकार्बनाइजेशन की लागत बढ़ी है।

डिकार्बनाइजेशन के लिए खोज, स्वहित और मुनाफे की प्रेरणा की आवश्यकता होती है जो पूरे देश में विक्रेताओं और खरीदारों को निर्देशित करे कि वे अपनी समस्याओं के नवोन्वेषी हल तलाश करे। विभिन्न लोगों के बीच समन्वय की जरूरत बिजली की कीमत के मामले में पड़ेगी जिसे बिजली के बाजार में ही निर्धारित होना चाहिए। विभिन्न क्षेत्रों में समाज के निर्णय लेने वाले लोगों के पास जो प्रचुर सूचनाएं होती हैं केंद्रीय नियोजकों के पास उतनी जानकारी नहीं होती। इसके अलावा केंद्रीय नियोजक राज्य की सीमित क्षमता से भी जूझ रहे हैं।

बाह्य नकारात्मक प्रभाव से निपटने में राज्य सरकार की भूमिका के मामले में कार्बन कर उपयुक्त उपाय है इसके साथ ही डिकार्बनाइजेशन की विस्तृत प्रक्रिया से राज्य क्षमता को खत्म करने का काम हो सकता है। जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन पर कर लगाने का काम केवल केंद्र सरकार कर सकती है। इससे जीवाश्म ईंधन की कीमत बढ़ेगी। हर जगह ऐसा होने के बाद लोग किफायती उपायों की ओर रुख करेंगे। तकनीकी क्षमता बढऩे के कारण आने वाले दिनों में ऐसे तमाम उपाय हमारे सामने होंगे। तलाश की इस प्रक्रिया की मदद से ही हम न्यूनतम लागत पर कार्बन उत्सर्जन में कमी कर सकेंगे।

डिकार्बनाइजेशन के लिए कार्बन कर अपनाने की बात करें तो इसमें पांच बातों की अहम भूमिका है। इसमें आपूर्ति संबंधी प्रतिक्रिया शामिल होगी क्योंकि नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन सुधरेगा। मांग संबंधी प्रतिक्रिया की बात करें तो डेटा सेंटर भारत से उन देशों में स्थानांतरित हो जाएंगे जहां पूंजी की लागत कम और नवीकरणीय ऊर्जा के अवसर ज्यादा हों। यह विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया है जहां स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समस्या निवारण पर विचार किया जाता हो। इसके लिए तकनीकी बदलाव को निरंतर अपनाना होगा और बदलते वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए मांग भी अपने आप को समायोजित करेगी। इस प्रक्रिया में राज्य से जुड़ी कठिनाइयां नहीं आतीं क्योंकि ज्यादातर काम निजी स्तर पर किए जाते हैं। ऐसा करने वाले वे होते हैं जिनका खुद का हित जुड़ा हो। जबकि राज्य के अपने लक्ष्य होते हैं।

राज्य का काम है कार्बन कर का वर्तमान और भविष्य का मूल्य तय करना और उसके बाद डिकार्बनाइजेशन को घटित होते हुए देखना। हर पांच वर्ष में कर दरों की समीक्षा करनी होगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन वांछित स्तर पर रहे। भविष्य की राह निकालने के लिए बौद्धिक विश्लेषण में शामिल रहना अहम है। ऐसा करके ही बड़े रुझानों के बारे में सोचा जा सकता है और निवेश संबंधी निर्णय लिए जा सकते हैं। हमें केंद्रीय नियोजन और राज्य की औद्योगिक नीति में अर्थव्यवस्था के विस्तृत तकनीकी ढांचे को नियंत्रित करने की शक्ति पर नजर रखनी होगी। यदि अर्थव्यवस्था पर व्यापक योजनाएं थोपी गईं तो डिकार्बनाइजेशन की लागत बढ़ेगी। जबकि स्थानीय विश्लेषण, नवाचार, स्थानीय उद्यमिता और स्थानीय स्तर पर जोखिम उठाने से लागत में कमी आएगी।

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