बिजनेस स्टैंडर्ड - दीर्घ अवधि के निवेश पर निवेशकों में असमंजस
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दीर्घ अवधि के निवेश पर निवेशकों में असमंजस

आकाश प्रकाश /  November 05, 2021

अब हम इस वर्ष की समाप्ति के करीब पहुंच गए हैं। इसे देखते हुए सभी निवेशकों के लिए अपने निवेश निर्णयों और परिसंपत्ति आवंटन पर विचार करने का समय आ गया है। क्या निवेशकों को शेयरों में और अधिक निवेश करना चाहिए? क्या तकनीकी शेयरों पर अधिक दांव खेलना चाहिए? क्या यह वर्ष अमेरिकी परिसंपत्तियों से निवेश निकाल कर तेजी से उभरते बाजारों में लगाने का है? क्या भारत में निवेशक आगामी आरंभिक सार्वजनिक निर्गमों (आईपीओ) के लिए नकदी जुटाएंगे? ये सभी वाजिब प्रश्न हैं और इन सभी पर बहस एवं चर्चा होनी चाहिए।

वैश्विक निवेशकों के दिमाग में भी इसी तरह एक बात घूम रही है कि उन्हें भारत के संदर्भ में क्या रणनीति रखनी चाहिए? पिछले दो वर्षों के दौरान बाजार का प्रदर्शन शानदार रहा है और यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है। जनवरी 2020 के बाद से बाजार 45 प्रतिशत उछल चुका है। इसके मुकाबले अमेरिकी बाजार में 35 प्रतिशत और तेजी से उभरते बाजारों के समूह में 20 प्रतिशत तेजी ही दर्ज हुई है। अकेले इसी वर्ष एमएससीआई इंडिया 26.5 प्रतिशत चढ़ा है जबकि इसकी तुलना में एमएससीआई ईएम (20 सितंबर तक) 1.25 प्रतिशत लुढ़का गया है। भारतीय बाजार महंगे हैं और फॉरवर्ड अर्निंग से 22 गुना अधिक स्तर पर कारोबार कर रहे हैं। तेजी से उभरते बाजारों के समूह की तुलना में भारतीय बाजार 90 प्रतिशत बढ़त के साथ कारोबार कर रहा है। भारत में अधिकांश मूल्यांकन अनुपात दीर्घ अवधि के औसत से अधिक हैं। भारतीय बाजारों में यह तेजी तब देखी जा रही है जब देश की अर्थव्यवस्था कोविड महामारी से पूरी तरह नहीं उबरी है। हम 2021 के अंत के करीब पहुंच चुके हैं और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) कोविड-19 महामारी पूर्व की तुलना में अब भी करीब 5 प्रतिशत कम है। भारत की तुलना में अमेरिका और तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में कोविड से नुकसान की भरपाई इस वर्ष तक पूरी हो जाएगी या कोविड पूर्व के स्तर से थोड़ा ही कम रहेगी।

वैश्विक निवेशकों के सामने अब प्रश्न यह है कि क्या उन्हें बिकवाली कर मुनाफा कमाना चाहिए या लंबे समय तक निवेश बनाए रखना चाहिए? क्या भारतीय शेयर बाजारों का शानदार प्रदर्शन यूं ही जारी रहेगा? बाजार में अनिश्चितता कोई नई बात नहीं है और प्रदर्शन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। अब यह आपकी सोच पर निर्भर करेगा कि इस साल शानदार प्रदर्शन करने के बाद भारतीय बाजार का रुख आने वाले समय में कैसा रहेगा। इस विषय पर दो विपरीत तर्क दिए जा रहे हैं।

ज्यादातर विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं, खासकर विदेश में बैठे लोगों को लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ कुछ गंभीर ढांचागत खामियां हैं। भारत की चाल 2020 से पहले ही मंद होनी शुरू हो गई थी। ढांचागत चुनौतियों से आशय यह है कि मौजूदा तेजी से इतर देश की अर्थव्यवस्था की चाल 5 प्रतिशत या इसके इर्द-गिर्द ही रहेगी। दूसरे चरण में किए गए अपर्याप्त आर्थिक सुधार, सीमित उत्पादन, निवेश की कमी और खस्ताहाल औद्योगिक नीति ढांचा (जिसके तहत निर्यात के बजाय आत्म-निर्भरता को अधिक महत्त्व दिया) इन सभी से भारत आर्थिक वृद्धि दर कमजोर हुई है। इन लोगों का समूह यह तर्क मानने के लिए तैयार नहीं है कि निगमित एवं वित्तीय प्रणाली के बहीखाते साफ-सुथरा करने के कारण भारत की वृद्धि दर्ज कमजोर हुई है। भारत में आय एवं व्यय का आकार सिकुड़ा है और जोखिम कम से कम लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है जिससे आर्थिक वृद्धि दर पर असर हो रहा है। इन लोगों को यह भी नहीं लगता कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), दिवालिया संहिता या उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना, तेज गति से डिजिटलीकरण या वाजिब निजीकरण इनमें किसी भी उपाय से आर्थिक वृद्धि दर और उत्पादकता बढ़ेगी। उन्हें लगता है कि अनौपचारिक क्षेत्र को इतनी तगड़ी चोट पहुंची है कि वह कभी उबर नहीं पाएगा और कोविड महामारी से अमीर और गरीब लोगों के बीच असमानता और बढ़ गई है। कमजोर आर्थिक वृद्धि दर कंपनियों की कमजोर आय का संकेत देती है इसलिए मौजूदा मूल्यांकन को देखते हुए बाजार से मिलने वाला प्रतिफल कमजोर रहेगा और भारत एक बार फिर निराश करेगा। इस सोच से सहमत होने वाले लोगों की कमी नहीं है। एक निवेशक के तौर पर आपको भी लगता है कि भारत अब केवल 5 प्रतिशत दर से आगे बढ़ सकता है तो आपको मुनाफा कमा कर निकल लेना चाहिए। निवेश बनाए रखने का जोखिम किसी भी संभावित बढ़त पर भारी पड़ सकता है।

मगर तेजडिय़े मौजूदा हालात को अलग चश्मे से देखते हैं। ज्यादार तेजडिय़ों को लगता है कि वे 2003-08 की तरह ही कई वर्षों के आर्थिक तेजी के मुहाने पर खड़े हैं। वे मौजूदा हालात को आशवादी नजरिये से देख रहे हैं। तेजडिय़ों के अनुसार भारत आय-व्यय एवं निवेश के असंतुलन बाहर निकल रहा है और कई संरचनात्मक बदलाव भी किए गए हैं जिनका सकारात्मक असर अब दिखने लगा है। उद्योग जगत शायद ही भविष्य को लेकर इतना अधिक आशावादी रहा है। रियल एस्टेट और निजी निवेश का सिलसिला फिर जोड़ पक ड़ता दिख रहा है। आईटी क्षेत्र में भी नियुक्तियां बढ़ रही हैं और स्टार्टअप खंड में भी शानदार चहल-पहल देखी जा रही है। धन सृजन में भी अभूतपूर्व तेजी देखी गई है। उन्हें लगता है कि निर्यात बढ़ रहा है और रोजगार दर भी तेजी से बढऩी चाहिए। औपचारिक ढांचा दिए जाने से सूचीबद्ध कंपनियों की संभावनाएं बढ़ रही है और उद्योग जगत की शीर्ष कंपनियों में क्षमता उपयोगिता 65 प्रतिशत नहीं बल्कि 80 प्रतिशत से अधिक पहुंच चुकी है। तेजडिय़े इस ओर ध्यान दिलाते हैं कि अब भी मुनाफा मार्जिन कम है इसमें बढ़ोतरी की भरपूर संभावनाएं हैं। पिछली तीन तिमाही में आय के आंकड़े भी उम्मीदों से अधिक रहे हैं। शेयरों पर प्रतिफल पहले ही 15 प्रतिशत पार कर चुका है और इसमें तेजी जारी रहेगी। पिछले एक दशक में भारत को लेकर तमाम नकारात्मक सोच के बावजूद भारतीय बाजारों ने 9.19 प्रतिशत शुद्ध प्रतिफल के साथ तेजी से उभरते बाजारों को पीछे छोड़ दिया है।

शेयर बाजार में लोग शेयरों के चयन में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं जिससे सूचकांक में बदलाव आता रहता है। आने वाले वर्षों में कई नई एवं आकर्षक कं पनियां बाजार में आ सकती हैं जिससे बाजार की गहराई और अधिक बढ़ जाएगी। सभी सूचकांकों में भारत का प्रतिनिधित्व वास्तविकता से कम रहा है मगर इनमें अब वाजिब बढ़त दिखने लगेगी। इससे डेट और इक्विटी बाजारों में पूंजी का प्रवाह बढ़ जाएगा। अगर बाजार में अगले कई वर्षों के लिए नई संभावनाएं दिख रही हैं और आय 15-16 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज दर से बढ़ती है तो फिलहाल बाजार से निवेश निकालना फायदे का सौदा नहीं कहा जा सकता। दुनिया में जब वृद्धि दर निचले स्तर पर रहती है तो इस तरह की आय वृद्धि दर आकर्षक संभावनाएं मुहैया कराती हैं निवेशक इनका लाभ लेने से पीछे नहींं रहते हैं। बाजार में मूल्यांकन बढ़ता जाएगा और कई उतार-चढ़ाव के बाद भी अच्छे प्रतिफल की उम्मीदें बनी रहेंगी।

तेल की बढ़ती कीमतें और भारत के शानदार प्रदर्शन को देखते हुए निकट अवधि में बाजार मजबूत हो सकता है मगर बुनियादी बहस इस बात पर हो रही है कि आपको दीर्घ अवधि के लिए निवेश बनाए रखना चाहिए या नहीं। हरेक निवेशक को इस बिंदु पर विचार करना चाहिए और तब निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। इसके बाद ही उन्हें लंबी अवधि के लिए निवेश बनाए रखने या बिकवाली करने का निर्णय लेना चाहिए। हम अधिक सकारात्मक सोच के साथ हैं मगर नकारात्मक बातों को भी जेहन में रख रहे हैं और पूरी तरह सावधान हैं।

(लेखक अमांसा कैपिटल से संबद्ध हैं।)

Keyword: दीर्घ अवधि, निवेश, निवेशक, बिकवाली, आईपीओ, उभरते बाजार, जीडीपी,
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